<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450</id><updated>2012-02-16T13:37:25.109+05:30</updated><title type='text'>चौखंबा</title><subtitle type='html'>हक़ की आवाज़</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>60</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-9213756682362095723</id><published>2009-04-02T17:30:00.001+05:30</published><updated>2009-04-02T17:30:56.207+05:30</updated><title type='text'>बिकता है कानून खरीदार चाहिये</title><content type='html'>एक बार फिर साबित हो गया कि देश में कानून और इंसाफ़ जैसे शब्दों की कोई अहमियत नहीं। अगर आपके पैसा और ताकत हो तो घिनौने से घिनौना अपराध करके भी बच सकते हैं। सीबीआई जैसी जांच एजेंसियां आपको बचाने में मदद करेंगी। अगर ऐसा नहीं होता तो १९८४ के दंगों के आरोपी आज जश्न नहीं मना रहे होते। दिल्ली की सड़कों पर सिखों का नरसंहार करने और कराने वालों को सज़ा जरूर मिलती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सीबीआई ने एक बार फिर जगदीश टाइटलर के खिलाफ चल रहे केस को बंद करने की इजाजत मांगी है। सीबीआई की शह पर टाइटलर अब मीडिया को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। टाइटलर के मुताबिक मीडिया ही है जो केस को जिंदा रखना चाहती है, वरना उनकी बेगुनाही कब की साबित हो गई होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा मामला संजय दत्त का है। संजय दत्त ने कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज पर धमकाने का आरोप लगाया है। जिसके जवाब में हंसराज भारद्वाज का कहना है कि संजय दत्त कांग्रेस के अहसान भूल गए। कौन से अहसान? क्या कांग्रेस ने संजय दत्त को बचाने में मदद की है? ऐसा नहीं कि लोगों को ये अहसास नहीं कि संजय दत्त की मदद की गई है। सभी को ये अंदाजा है कि संजय दत्त को बचाया गया है। अगर ऐसा नहीं होता तो अबू सलेम का साथी आज एक बड़ी पार्टी का महासचिव नहीं बन पाता। फिर भी कानून मंत्री को इस खौफनाक सच का इजहार नहीं करना चाहिये। ऐसा करके वो न्यायपालिका और न्यायिक व्यवस्था के चरित्र पर सवाल खड़े कर रहे हैं। साथ ही उन हजारों, लाखों लोगों की उस आखिरी उम्मीद को भी तोड़ रहे हैं जिसके बल पर वो लोग इंसाफ़ की लड़ाई लड़ते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-9213756682362095723?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/9213756682362095723/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=9213756682362095723' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/9213756682362095723'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/9213756682362095723'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='बिकता है कानून खरीदार चाहिये'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-5141871680001700889</id><published>2009-03-31T11:42:00.001+05:30</published><updated>2009-03-31T11:58:06.824+05:30</updated><title type='text'>रोना छोड़ करें भविष्य की पत्रकारिता का स्वागत</title><content type='html'>दैनिक हिंदुस्तान की संपादक मृणाल पांडे ने अपने लेख में कुछ अहम मुद्दे उठाए हैं. पहला मुद्दा पत्रकारिता के गिरते स्तर से जुड़ा है. मृणाल पांडे ने रविवार को अपने कॉलम कसौटी में लिखा है कि “यह एक विडंबना ही है कि जिस वक्त दुनिया के अनेक महत्वपूर्ण अखबारों के जनक और वरिष्ठ पत्रकार, इंटरनेट और अभूतपूर्व आर्थिक मंदी की दोहरी चुनौतियों से जूझते हुए नई राहें खोज रहे हैं, वहीं हमारे देश में (संभवत: पहली बार) लहलहा चले ज्यादातर भाषाई अखबारों को यह गलतफहमी हो गई है कि लोकतंत्र का यह गोवर्धन जो है, उन्हीं की कानी उंगली पर टिका हुआ है। इसलिए वे कानून से भी ऊपर हैं”।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं अखबारों की हकीकत को बयां करने के बाद वो पत्रकारों के एक सच को बड़ी बेबाकी से बयां करती हैं. उनके मुताबिक “ऐसे तमाम उदाहरण आपको वहां मिल जाएंगे, जहां हिन्दी पत्रकारों ने छोटे-बड़े शहरों में मीडिया में खबर देने या छिपाने की अपनी शक्ति के बूते एक माफियानुमा दबदबा बना लिया है”। वो इसे और भी आगे बढ़ाती हैं। वो कहती हैं कि चंद भाषाई पत्रकार दलाली के स्तर पर उतर आए हैं। “वो (पत्रकार) सरकारी नियुक्तियां, तबादलों और प्रोन्नतियों में बिचौलिया बनकर गरीबों से पैसे भी वसूल रहे हैं और भ्रष्ट सत्तारूढ़ नेताओं को मुफ्त में ओबलाइज करके उनसे सस्ते में जमीनी और खदानी पट्टे हासिल कर रहे हैं, इसके भी कई चर्चे हैं”।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साफ है कि मृणाल पांडे ने भाषाई संस्थानों और पत्रकारों पर ये बहुत संगीन आरोप लगाए हैं। लेकिन अपने इस लेख में उन्होंने किसी एक संस्था और पत्रकार का नाम तक नहीं लिया है। ये बहुत ही जनरलाइज्ड स्टेटमेंट है और ऐसे स्टेटमेंट का कोई मतलब नहीं होता। मगर मृणाल पांडे कोई मामूली शख्स नहीं हैं। वो एक अनुभवी पत्रकार हैं। एक बड़े और सम्मानित अखबार की संपादक हैं। कई किताबें लिख चुकी हैं। इसलिए उनके आरोपों को गंभीरता से लेना चाहिये। सोचना चाहिये कि ये स्थिति क्यों हुई है? क्यों पत्रकारों का सम्मान घटा? और क्यों पत्रकार दलाल बन गए? इसे समझना आसान नहीं है मगर ज्यादा मुश्किल भी नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मृणाल के लेख से उठे सवालों का आधा जवाब उनके लेख के पहले हिस्से में हैं। आधा इसलिए कि उन्होंने आधा सच ही लिखा है। शायद पूरा सच लिखने का साहस उनमें नहीं था। मृणाल लिखती हैं कि “पाठकों को सबसे सस्ता अखबार देने की होड़ में अखबार दामी विज्ञापनों के बूते अपनी असली लागत से कहीं कम (लगभग 1/10वीं) कीमत पर बेचे जाते रहे हैं। और इधर बाजार की मंदी के कारण वह विज्ञापनी प्राणवायु लगातार घटती जा रही है”।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां पाठकों को सबसे सस्ता अखबार देने की होड़ नहीं थी। जब टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स में दाम कम करने की होड़ शुरू हुई तो यकीनन उसका मकसद ज्यादा से ज्यादा पाठक बटोरना था। मगर इसलिए नहीं कि ज्यादा अखबार बेच कर ज्यादा मुनाफा कमाएंगे, बल्कि इसलिए कि कंपनियों को ये कहा जा सके कि हमारा अखबार सबसे ज्यादा बिकता है (छपता है) इसलिए आप हमें विज्ञापन ज्यादा दें। इस तरह इन बड़े अखबारों ने पाठकों के पैसे से ज्यादा अहमियत विज्ञापनों को दी। यही वजह है कि आगे चल कर इन्होंने पाठकों से ज्यादा हित कंपनियों का साधा। विज्ञापनों के लिए ये पाठकों के हितों से समझौता करने में गुरेज नहीं करते। कुछ खबरों को दबाने और कुछ खबरों को खेलने का मकसद भी कंपनियों से संबंधों के आधार पर तय होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब इसी सच का दूसरा पहलू। आप सबको मालूम होगा कि कुछ दिन पहले अखबारों के नुमाइंदों ने सरकार के सामने आर्थिक मंदी से उठी मुश्किलों का जिक्र किया था। जिसके बाद सरकारी विज्ञापनों का कोटा बढ़ा दिया गया। प्राणवायु पंप होने लगी। फेंफड़ों में नई जान आ गई। आखिर सरकारी विज्ञापन किसके जरिये मिलते हैं? नेता और अधिकारियों के जरिये। जब नेता और अधिकारियों का अहसान इन अखबारों पर इतना बड़ा हो तो ये उनके खिलाफ कैसे लिखें और कैसे छापे? ये दलाली का एक बड़ा सच है। निचले स्तर पर मौजूद भाषाई पत्रकारों और अखबारों की इतनी औकात नहीं कि वो पत्रकारिता के मुंह पर कालिख पोत सकें... उनकी इतनी हैसियत नहीं कि वो लोकतंत्र का सौदा कर सकें... सच यही है कि ये काम बड़े अखबारों और बड़े पत्रकारों ने किया है। इसलिए भला तो यही होता कि मृणाल पांडे अपना निशाना सबसे पहले उन बड़े दलालों की तरफ साधती। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। फिर भी उन्होंने आधा ही सही एक सच बयां करने का साहस तो किया है। इसके लिए उन्हें साधुवाद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मृणाल का एक और आरोप। उन्होंने ये आरोप इंटरनेट और ब्लॉग जगत के कुछ गिद्धों पर लगाए हैं। मृणाल लिखती हैं कि “इंटरनेट पर कुछेक विवादास्पद पत्रकारों ने ब्लाग जगत की राह जा पकड़ी है, जहां वे जिहादियों की मुद्रा में रोज कीचड़ उछालने वाली ढेरों गैर-जिम्मेदार और अपुष्ट खबरें छाप कर भाषायी पत्रकारिता की नकारात्मक छवि को और भी आगे बढ़ा रहे हैं। ऊंचे पद पर बैठे वे वरिष्ठ पत्रकार या नागरिक उनके प्रिय शिकार हैं, जिन पर हमला बोल कर वे अपने क्षुद्र अहं को तो तुष्ट करते ही हैं, दूसरी ओर पाठकों के आगे सीना ठोंक कर कहते हैं कि उन्होंने खोजी पत्रकार होने के नाते निडरता से बड़े-बड़ों पर हल्ला बोल दिया है। यहां जिन पर लगातार अनर्गल आक्षेप लगाए जा रहे हों, वे दुविधा से भर जोते हैं, कि वे इस इकतरफा स्थिति का क्या करें? क्या घटिया स्तर के आधारहीन तथ्यों पर लंबे प्रतिवाद जारी करना जरूरी या शोभनीय होगा? पर प्रतिकार न किया, तो शालीन मौन के और भी ऊलजलूल अर्थ निकाले तथा प्रचारित किए जाएंगे”। ये मसला बहुत गंभीर है। अगर कोई सिर्फ अपनी क्षुद्र अहम् को तुष्ट करने के लिए और बतौर खोजी पत्रकार स्थापित करने के लिए ऐसा कर रहा है तो उसे दंड मिलना चाहिये। किसी को भी यह हक नहीं कि वो बिना किसी सबूत दूसरों पर कोई आरोप लगाए या फब्तियां कसे। ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिये। केस दर्ज किया जाना चाहिये। लेकिन केस न्याय पाने की मंशा से दर्ज हो तो ठीक है, परेशान करने की मंशा से नहीं। हाल ही में कुछ पत्रकारों ने पत्रकारों पर और कुछ अखबारों ने पत्रकारों पर जो केस दर्ज किये हैं उनमें न्याय पाने की मंशा कम अपनी ताकत के जरिये दूसरों को परेशान करने की मंशा ज्यादा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी से जुड़ी एक और बात। अखबार अगर पत्रकारिता का अतीत और वर्तमान हैं तो इंटरनेट और ब्लॉग भविष्य। एक संवेदनशील शख्स अपने भविष्य को हेय दृष्टि से देखे ये सही नहीं। इंटरनेट और ब्लॉग ने ये सुविधा दी है कि कोई पत्रकार अगर चाहे तो मुफ्त में या फिर चंद पैसों में अपनी बात पाठकों तक पहुंचा सके। वो बात जिसे छापने और दिखाने का साहस ना तो अखबारों में है और ना ही टीवी न्यूज चैनलों में। इस लिहाज से देखें तो ब्लॉग और इंटरनेट ने बहुत से पत्रकारों को अपना कर्म और धर्म पूरा करने की सहूलियत दी है। साथ ही पत्रकारों पर संस्थाओं की तरह से हो रहे अन्याय के विरुद्ध बोलने के मंच दिया है। सूचना के अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी को नया आयाम दिया है। ये बहुत बेहतरीन चीज है और इसलिए जब मृणाल ये कहती हैं कि “क्या आप जानते हें कि आज भी इंटरनेट पर 85 प्रतिशत खबरों का स्रोत प्रिंट मीडिया ही है। वजह यह, कि सर्च इंजिन गूगल हो अथवा याहू, दुनियाभर में अपने मंजे हुए संवाददाताओं की बड़ी फौज तैनात करने की दिशा में अभी किसी इंटरनेट स्रोत ने खर्चा नहीं किया है। और वह करे भी, तो रातोंरात अखबार के कुशल पत्रकारों जैसी टीम वह खड़ी नहीं कर सकेंगे” तो वो गलत कहती हैं। इससे जाहिर होता है कि उन्हें इंटरनेट का “क...ख...ग...” भी नहीं मालूम। यही तो इंटरनेट की खासियत है कि उसे ऐसा कुछ भी करने की जरूरत नहीं। अमेरिका से लेकर भारत के एक छोटे कस्बे में बैठा लेखक अपनी ब्लॉग या साइट पर जो कुछ भी लिख रहा है वो पूरी दुनिया के लिए उपलब्ध है। अगर आपको जरूरत हो तो आप उस खबर या विचार को पढ़ें। उसके बारे में तहकीकात कर लें। एक दो जगहों से उसकी जांच कर लें। अगर वो बात गलत है तो उसे छोड़ दें। अगर सही है तो उसका इस्तेमाल कर लें। घर और दफ्तरों में बैठ कर लिख रहे हजारों, लाखों, करोड़ों की संख्या में ये लोग ही तो इंटरनेट की असली ताकत हैं। ये इंटरनेट के रिपोर्टर, लेखक, विचारक और संपादक... सबकुछ हैं। गूगल तो सर्च इंजन है और इस सर्च इंजन ने इंटरनेट के इन तमाम रिपोर्टरों, लेखकों और विचारकों को एक दूसरे से जोड़ दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आखिरी बात। अगर किसी अखबार में इंटरनेट विंग है तो उस वेब विंग का अपना अलग अस्तित्व है। जिस तरह आप अखबार के मालिक के तमाम कारोबारों को अखबार का कारोबार नहीं मान सकते ठीक उसी तरह वेबसाइट को भी अखबार की मिल्कियत नहीं समझना चाहिये। ये भी नहीं समझना चाहिये कि वेबसाइट पर काम कर रहा पत्रकार किसी मायने में अखबारों के दिग्गज पत्रकारों से कमतर है। हो सकता है कि कम्प्यूटर के सामने बैठ कर ठुक... ठुक करता वही नया पत्रकार भविष्य में पत्रकारिता का नाम रोशन कर जाए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-5141871680001700889?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/5141871680001700889/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=5141871680001700889' title='2 Comments'/><link rel='edit' 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type='html'>ब्लॉग की दुनिया में चार महीने बाद लौट रहा हूं। बीते चार महीनों में मैंने अपने लिये कुछ नहीं लिखा। सिर्फ नौकरी की, लेकिन अब नौकरी से मुक्त हो चुका हूं और वो हर काम कर रहा हूं जिसके लिए मन तरसता था। सुबह देर तक सोता हूं। अख़बार पढ़ता हूं। किताबें पढ़ता हूं। बच्चे के साथ खेलता हूं। गाना सुनता हूं। रात देर तक टीवी देखता हूं। अपने दोस्त गिरिजेश के पास से २९ बेहतरीन फिल्मों की डीवीडी ले आया हूं और हर रोज रात ग्यारह बजे के बाद एक फिल्म देखता हूं। १२ तारीख का रिजर्वेशन है गांव जा रहा हूं। करीब दो हफ्तों के लिए गांव में रहूंगा। आलू की पहली फसल पक चुकी है और अब आलू कोड़ने (जमीन से आलू निकालने) का वक़्त है। वहीं खेत में आलू भून कर खाऊंगा। गंगा किनारे बैठ कर ज़िंदगी को करीब से देखूंगा। अगले दो-तीन महीने तक सिवाये घूमने और सोचने के कुछ और नहीं करना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दौरान मैं सोचना चाहता हूं कि मीडिया में लौटूं या पूरी तरह गांव लौट जाऊं। गांव लौटने के ख्याल का सब विरोध कर रहे हैं। दोस्त और घर के लोग भी। सबका कहना है कि गांव लौटने लायक नहीं रह गए हैं। बात सही है। गांव की हालत बहुत बुरी है। लेकिन क्या मीडिया रहने लायक है। क्या मीडिया में वो बुराइयां नहीं हैं जो गांवों में हैं या फिर इस पूरी व्यवस्था में हैं। जाति की राजनीति मीडिया में भी है। धर्म के ठेकेदार भी हैं। क्षेत्रवाद भी हावी है। दलाली मीडिया के लोग भी करते हैं। चंद अपवादों को छोड़ दें तो जितना बड़ा पत्रकार उतना बड़ा दलाल। साज़िशें यहां भी खूब होती हैं। आप कोई साज़िश मत करिये, लेकिन आपके ख़िलाफ़ साज़िश करने वालों की कमी नहीं होगी। तो फिर मीडिया में क्यों लौटा जाए? क्या सिर्फ़ इसलिये कि यही काम करना आता है और उम्र के इस पड़ाव पर कोई दूसरा काम करना मुमकिन नहीं। रोजी रोटी चलानी है तो मीडिया में किसी तरह बने रहना होगा। जोंक की तरह चिपके रहना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप सोच रहे हैं कि नौकरी छोड़ दिया है तो भाषण दे रहा है। नहीं ऐसा नहीं है। यकीन मानिये मैं ये सब लगातार सोच रहा हूं। बीते तीन साल से मैंने मीडिया के चरित्र, यहां के काम के हालात और लोगों पर बहुत विचार किया है। पिछले ११ साल में पांच मीडिया हाउस में काम कर चुका हूं। तीन चैनल में काम कर चुका हूं। इसलिए मीडिया के हर सच और झूठ को करीब से जानता हूं। कई बड़े रिपोर्टरों को जानता हूं जो सिंडिकेट बना कर सत्ता की दलाली करते हैं। मैं जानता हूं कि कैसे ख़बरें खड़ी की जाती हैं, ख़बरें खरीदी और बेची जाती हैं और ख़बरें दबाई जाती हैं। मैं जानता हूं एक ही तरह की दो ख़बरों पर क्यों चैनल दो नीतियां अपनाते हैं। उन ख़बरों में शामिल चेहरों के आधार से चैनलों की नैतिकता तय होती है। मैं मीडिया में चल रहे इस ख़तरनाक खेल पर एक किताब लिखने की योजना बना रहा हूं। उसमें बीते ग्यारह साल के अपने सफ़र और अनुभवों को दर्ज करूंगा। उसमें मेरठ के ट्रांसपोर्ट नगर में बीताए दिनों का जिक्र होगा, सपने और सच के बीच हुए टकराव की चर्चा होगी। वो टकराव जिसमें पत्रकार धीरे धीरे दम तोड़ता है और एक कॉरपोरेट जर्नलिस्ट जन्म लेता है। वो जर्नलिस्ट जो असल में एक सेल्समैन की भूमिका में है जिसके लिए ख़बर एक उत्पाद है और पत्रकारिता उत्पाद को बेचने का तरीका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीडिया में मैंने सबसे अधिक दिन एनडीटीवी में बिताए हैं। जाहिर सी बात है मेरी उस किताब में एनडीटीवी का जिक्र सबसे अधिक होगा। मैं व्यक्तिगत तौर पर मानता हूं कि एनडीटीवी का ख़बरों के बाज़ार में टिका रहना बेहद जरूरी है। लेकिन जब भी कोई मुझसे कहता है कि एनडीटीवी आइडियल है तो मैं इसका विरोध करता हूं। मैं मानता हूं कि एनडीटीवी की मौत का मतलब एक साफ-सुथरी टीवी पत्रकारिता की मौत होगी। यहां साफ-सुथरी टीवी पत्रकारिता का मतलब सिर्फ इतना है कि बिना किसी अश्लील वीडियो को दिखाए और बिना फूहड़ हुए भी चैनल चलाया जा सकता है। इससे अधिक मतलब निकलना ग़लत होगा। क्योंकि मैं निजी तौर पर ये भी मानता हूं कि एनडीटीवी स्कूल ऑफ जर्नलिज्म किसी भी दिन आज तक स्कूल ऑफ जर्नलिज्म से ज़्यादा घातक है। क्यों, इसे समझाने के लिए सिर्फ एक छोटा किस्सा सुनाना चाहूंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ समय पहले एनडीटीवी ने मनमोहन सरकार के सबसे अच्छे और सबसे खराब मंत्रियों पर एडिटर्स सर्वे कराया था। देश भर के संपादकों की राय ली गई। एक सूची तैयार की गई। रात आठ बजे के बुलेटिन में उसे चलाया गया। लेकिन फिर खराब मंत्रियों की सूची गिरा दी गई। मगर अच्छे मंत्रियों की सूची चलती रही। वो खराब मंत्री कौन थे और एनडीटीवी ने वो सूची क्यों गिराई इस पर विस्तार से चर्चा किताब में होगी। लेकिन इससे आप एनडीटीवी के चरित्र का अंदाजा लगा सकते हैं। जो चैनल सिर्फ हल्के से दबाव में अपने ही सर्वे को तोड़-मरोड़ सकता है उस चैनल में स्टेट के विरुद्ध खड़े होने का कितना हौसला होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही वजह है कि मैं लंबे समय से एनडीटीवी को छोड़ने का मन बना रहा था। मेरे करीबी मेरी उलझन , मेरे द्वंद को जानते हैं। वो जानते हैं कि एनडीटीवी की झूठी नैतिकता में मुझे किस कदर घुटन महसूस हो रही थी। ग्यारह साल तक नौकरी करते करते मेरे भीतर के पत्रकार ने दम तोड़ दिया था और वो एक बड़ी वजह थी कि मैं तमाम घुटन के बावजूद एनडीटीवी की नौकरी छोड़ने का फैसला नहीं ले पा रहा था। मगर हाल ही में एनडीटीवी प्रॉफिट से एनडीटीवी इंडिया में एक्सपोर्ट किये गए नए मैनेजिंग एडिटर अनिंदो चक्रवर्ती ने मुझे ये बड़ा फैसला लेने का बहाना दे दिया। एक झटके में सारी उलझन दूर हो गई और इसके लिए मैं उनका शुक्रगुजार हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समरेंद्र सिंह (०९-१२-०८)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-1150449968913878493?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/1150449968913878493/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=1150449968913878493' title='24 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/1150449968913878493'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/1150449968913878493'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='कुछ दिन ज़िंदगी के नाम'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>24</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-8157504930033327836</id><published>2008-08-08T00:38:00.000+05:30</published><updated>2008-08-08T00:40:11.467+05:30</updated><title type='text'>जब जस्टिस ऐसे हों तो कैसे बचेगा देश?</title><content type='html'>सुप्रीम कोर्ट भी कम हिप्पोक्रेट नहीं. बीते कुछ दिनों में दो अहम मामले सुप्रीम कोर्ट के सामने थे. एक जजों से जुड़ा मामला और दूसरा नेताओं, पत्रकारों और समाज के दूसरे ताक़तवर तबकों से जुड़ा हुआ. दोनों ही मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने जजों के दोहरे चरित्र को सामने ला दिया. पहला मामला &lt;a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/3329505.cms"&gt;सरकारी मकान पर गैर कानूनी कब्जों &lt;/a&gt;से जुड़ा था. ये पांच अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के सामने आया. तब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बी एन अग्रवाल और जस्टिस जी एम सिंघवी की बेंच ने कहा कि “सरकार कानून का पालन नहीं करना ही चाहती. पहले ये कहते थे कि देश को भगवान ही बचा सकता है, मगर अब लगता है कि भगवान भी इस देश की मदद नहीं कर सकता”.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा मामला आज अदालत में पेश हुआ. करोड़ों रुपये के &lt;a href="http://www.centralchronicle.com/20080808/0808002.htm"&gt;प्रोविडेंट फंड घोटाले में जजों की भूमिका&lt;/a&gt; से जुड़ा हुआ. इसमें निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज भी संदेह के घेरे में. उन पर आरोपियों की मदद का शक है. इस घोटाले और जजों की भूमिका की जांच किससे कराई जाए इस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. सुनवाई तीन जजों की बेंच कर रही थी, जिनमें दो जस्टिस बी एन अग्रवाल और जस्टिस जी एम सिंघवी वही थे जिनकी बेंच ने कहा था कि “इस देश को भगवान भी नहीं बचा सकता”. मगर आज जस्टिस बी एन अग्रवाल आपा खो बैठे. हुआ यूं कि सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील और पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री शांति भूषण ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भ्रष्ट जजों को बचाने की कोशिश कर रहा है. जिस पर जस्टिस बी एन अग्रवाल भड़क गए. उन्होंने शांति भूषण से बयान वापस लेने को कहा. लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया और कहा कि चाहें तो मानहानि का मुक़दमा कर दें. थोड़ी रुकावट के बाद सुनवाई आगे बढ़ी तो जस्टिस बी एन अग्रवाल ने कुछ कहा जिस पर शांति भूषण के बेटे प्रशांत भूषण ने कहा कि वो उनके सीनियर के मुंह में अपने शब्द डाल रहे हैं. फिर क्या था जस्टिस बी एन अग्रवाल सुनवाई बीच में छोड़ कर उठ गए. अब मामला सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन पर छोड़ दिया गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जिस देश में सुप्रीम कोर्ट के जज खुद को खुदा समझने लगे हों और कड़ुवे सच को बर्दाश्त करने की हिम्मत भी नहीं रखते हों उस देश का भगवान भला कैसे करे? जस्टिस बी एन अग्रवाल (जो चीफ जस्टिस के बाद दूसरे सबसे सीनियर जज हैं) को सोचना चाहिये था कि उनके इस बर्ताब से अदालत सम्मानित नहीं बल्कि अपमानित होगी. साथ ही कानून और न्यायपालिका पर आम आदमी का यकीन और भी घटेगा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-8157504930033327836?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/8157504930033327836/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=8157504930033327836' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/8157504930033327836'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/8157504930033327836'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/08/blog-post_08.html' title='जब जस्टिस ऐसे हों तो कैसे बचेगा देश?'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-3373445514632218903</id><published>2008-08-04T23:52:00.003+05:30</published><updated>2008-12-09T23:56:14.465+05:30</updated><title type='text'>सुलग रहा है जम्मू, अब खुश होगा गुलाम</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SJdJygcowgI/AAAAAAAAAP0/VFfTUdD8IuY/s1600-h/j&amp;amp;k+vilence+2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5230730624266453506" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SJdJygcowgI/AAAAAAAAAP0/VFfTUdD8IuY/s320/j%26k+vilence+2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;जम्मू सुलग रहा है. एक महीने से ऊपर हो गए हैं, हिंसा थम नहीं रही. कई ज़िंदगियों का अंत हो चुका है. जम्मू की आग कई और ज़िलों में फैल रही है. ये डर मैंने उसी समय जताया था जब गुलाम नबी आज़ाद सरकार ने अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई ज़मीन वापस ली थी. सिर्फ़ मैंने ही क्यों उन तमाम लोगों को इस हिंसा की आशंका थी जो राज्य की धर्मनिरपेक्ष अवधारणा में यकीन रखते हैं. जो राज्य के सांप्रदायिक होने का विरोध करते हैं. अब हमारी वो तमाम आशंकाएं सच हो रही हैं. इसके लिए सिर्फ़ एक व्यक्ति और एक दल का नेतृत्व ज़िम्मेदार है. वो व्यक्ति है गुलाम नबी आज़ाद और दल है कांग्रेस.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां पर हो सकता है कि कुछ लोग मेरी बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखें. लेकिन मैं ये मानता हूं कि आज बीजेपी का उत्थान हुआ है तो इसके लिए काफी हद तक कांग्रेस ज़िम्मेदार है. इस बार भी कांग्रेस के गुलाम नबी आज़ाद ने बीजेपी को अमरनाथ मुद्दे पर राजनीति का मौका दिया. खाद पानी दी. यही नहीं अमरनाथ श्राइन बोर्ड को ज़मीन देने और उस फ़ैसले को वापस लेने के बीच एक लंबा वक़्त था. उस वक़्त में कांग्रेस नेतृत्व ने गुलाम नबी को उनके फ़ैसले से नहीं रोका इसलिए वो भी ज़िम्मेदार है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां बहुत से लोग ये कोशिश कर रहे हैं कि सारा दोष महबूबा मुफ़्ती और जम्मू कश्मीर के दूसरे सांप्रदायिक और अलगाववादी नेताओं पर थोप दिया जाए. ये कुछ वैसी ही कोशिश है कि जो ऐटमी करार के मुद्दे पर हुई है. कांग्रेस नेताओं ने भविष्य में सोनिया को देशद्रोही करार दिया जाने की आशंका को भांप कर ऐटमी करार की ज़िम्मेदारी मनमोहन के कंधों पर डाल दी. सब यही कहते नज़र आए कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ऐटमी डील पर आगे बढ़ना चाहते हैं, ताकि भविष्य में जब इस डील के ख़तरनाक नतीजे सामने आएं तो मनमोहन को गुनहगार ठहराया जाए सोनिया को नहीं. ठीक उसी तरह कहा जा रहा है कि गुलाम नबी आज़ाद ने सियासी मजबूरी में अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई ४० हेक्टयेर ज़मीन वापस ली. लेकिन इस तर्क में कोई भी दम नहीं है. जम्मू कश्मीर में महबूबा मुफ़्ती और उनके जैसे तमाम क्षेत्रीय दल धर्म की राजनीति करते आए हैं और उन्होंने इस बार भी वही किया. लेकिन कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है, उसका एक इतिहास है, गुलाम इस पार्टी के बड़े सिपहसालार थे... फिर वो कैसे क्षेत्रीय राजनीति के शिकार बन गए ... फिर वो कैसे राज्य की मूल अवधारणा को ताक पर रख बैठे?&lt;br /&gt; &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SJdJluRDdlI/AAAAAAAAAPs/M2ikVa-o5vs/s1600-h/jammu+flag.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5230730404637668946" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SJdJluRDdlI/AAAAAAAAAPs/M2ikVa-o5vs/s320/jammu+flag.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सत्ता को कई मौकों पर बहुत निर्मम होना पड़ता है. जब बात मूल अवधारणाओं से जुड़ी हो तो और भी निर्मम. लेकिन हमारे यहां के राजनेता सिर्फ़ वोट की राजनीति जानते हैं. यही वजह है कि कोई जाति की सियासत में माहिर है, कोई धर्म की और कोई मौके के हिसाब से कभी जाति, कभी धर्म यानी हर किसी की सियासत कर लेता है. अगर बीजेपी ने धर्म की राजनीति की है... अगर मुलायम सिंह, मायावती, लालू यादव, रामविलास पासवान जैसे नेताओं ने जाति की सियासत की है तो कांग्रेस ने धर्म और जाति दोनों की राजनीति की है. अयोध्या में राम मंदिर का कपाट खोलना हो, उच्च शिक्षण संस्थाओं ने पिछड़ों को आरक्षण देना हो, मुस्लिमों के आर्थिक सुधार के नाम पर कमेटी का गठन हो, शाह बानो केस हो या फिर सिखों का नरसंहार... ये इतिहास के चंद पन्ने हैं और ऐसे पन्नों की फेहरिस्त काफी लंबी है. ये इतिहास बताता है कि कांग्रेस ने हर बार अपनी सहूलियत और जरूरत के हिसाब से राज्य की धर्मनिरपेक्ष छवि के साथ खिलवाड़ किया है. उसे तोड़ा-मरोड़ा है. ये कांग्रेस की नाकामी ही है जिसकी वजह से आज ऐसे नेताओं की संख्या काफी ज़्यादा है जो जाति, धर्म और क्षेत्र की राजनीति करते हैं. यूं कहें कि ताकतवर राष्ट्र को टुकड़ों में बांट कर अपना उल्लू सीधा करते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार भी अगर गुलाम नबी आज़ाद धर्म की राजनीति में नहीं फंसते और श्रीनगर में हिंसक विरोध पर काबू पाने के लिए थोड़ी सख़्ती कर लेते तो जम्मू में सेना नहीं बुलानी पड़ती. मनमोहन को तैंतीस दिन की हिंसा के बाद बैठक का नाटक नहीं करना पड़ता. बीजेपी को धर्म की सियासत का आधार नहीं मिलता. इसलिए इस हिंसा के लिए तो सिर्फ़ और सिर्फ़ कांग्रेस ज़िम्मेदार है. &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-3373445514632218903?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/3373445514632218903/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=3373445514632218903' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/3373445514632218903'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/3373445514632218903'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='सुलग रहा है जम्मू, अब खुश होगा गुलाम'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SJdJygcowgI/AAAAAAAAAP0/VFfTUdD8IuY/s72-c/j%26k+vilence+2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-9001007535493618463</id><published>2008-07-29T01:34:00.001+05:30</published><updated>2008-07-29T01:35:23.995+05:30</updated><title type='text'>इन्हें धमाकों से क्या ... ये तो खुद मौत के सौदागर हैं</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;बीजेपी और कांग्रेस में कोई फ़र्क नहीं. बीते समय में हम सबने इन दोनों दलों को हिंसा पर सियासत करते देखा है और हिंसा की सियासत करते भी देखा है. १९८४ में सिखों का नरसंहार और २००२ में गुजरात में मुसलमानों का नरसंहार इसके गवाह हैं. ऐसे दंगों की फ़ेहरिस्त काफी लंबी है और इन दोनों दलों की बेशर्मी का इतिहास भी उतना ही लंबा. एक बार फिर देश के ये दोनों सबसे बड़े दल अपनी उसी चाल और चरित्र का इजहार कर रहे हैं. बैंगलोर और अहमदाबाद बम धमाकों पर सियासी रोटियां सेंकने में जुटे हैं. और इसी कोशिश में एक से बढ़ कर एक विभत्स बयान जारी कर रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुरुआत बीजेपी से. मनमोहन सिंह के विश्वास प्रस्ताव पर चल रही गंभीर बहस के बीच लोकसभा के पटल पर नोट बिछाने के भद्दे नाटक के बाद अब धमाकों पर उससे भी भद्दे बयान. बीजेपी की तेज तर्रार नेता सुषमा स्वराज की माने तो ये धमाके कांग्रेस ने कराए हैं. विश्वास मत में हुई सांसदों की खरीदो-फ़रोख़्त से ध्यान हटाने के लिए. ये एक बेहद संगीन आरोप है और बिना आधार इस आरोप का कोई मतलब नहीं. अगर सुषमा ने ये बात गंभीरता से... सोच समझ कर और सबूतों के आधार पर कही हैं तो उन्हें वो आधार जनता के बीच पेश करने चाहिये ताकि कांग्रेस का वो घिनौना सच सामने आ सके. अगर सुषमा की बात में दम है तो कांग्रेस के सिर्फ़ एक नेता पर नहीं बल्कि पूरी पार्टी पर देशद्रोह का मुक़दमा चला कर सभी नेताओं को फांसी पर टांग देना चाहिये. लेकिन अगर सुषमा स्वराज ने ये बात बिना सोचे समझे कही है तो वो बेहद खुद ख़तरनाक हैं. उन्हें सियासत से हमेशा के लिए दूर कर देना चाहिये. आजीवन प्रतिबंध लगाया जाना चाहिये, ताकि लोगों को हमेशा याद रहे कि वोट के लिए समाज में ज़हर घोलना एक संगीन जुर्म है और उसे माफ़ नहीं किया जा सकता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बात बीजेपी के एक और नेता नरेंद्र मोदी की. इनके बारे में तो जितना कहा जाए उतना कम है. बीजेपी के ये सबसे तेज चमकते सितारे हैं और इनकी माने तो केंद्रीय खुफ़िया एजेंसी आईबी सही तरीके से जानकारी नहीं देती है. चलिये मान लीजिये कि आईबी निकम्मी है. और आपने ये बात धमाकों का सारा दोष केंद्र पर मढ़ने के इरादे से नहीं कही. लेकिन यहां सवाल उठता है कि आखिर मोदी साहब आप क्या कर रहे थे? आप तो गुजरात के शहंशाह हैं. आपने वहां की सुरक्षा व्यवस्था क्यों नहीं दुरुस्त रखी? आज एनडीटीवी पर एक रिपोर्ट दिखाई गई. राहुल श्रीवास्तव की रिपोर्ट. उसके मुताबिक अगर अहमदाबाद में सभी १६ बमों की सही-सही जानकारी एक घंटे पहले भी दे दी जाती तो भी पुलिस १४ धमाकों को रोक नहीं पाती. अहमदाबाद पुलिस के बम निरोधी दस्ते में ड्राइवर समेत सिर्फ सात कर्मचारी हैं. एक बम को बेकार करने में कम से ४५ मिनट से एक घंटे का वक़्त लगता है. इस लिहाज से देखें तो ये कर्मचारी मिल कर डेढ़-पौने दो घंटे में अधिक से अधिक दो या तीन बम बेकार कर पाते. यही नहीं पूरे गुजरात में पुलिस महकमे के साठ फ़ीसदी पद खाली पड़े हैं. तो मोदी साहब माना आप मुसलमानों की ज़िंदगी दांव पर लगा कर सियासत करने में माहिर हैं, लेकिन हिंदुओं के हितों के लिए ही सही वहां सुरक्षा व्यवस्था तो दुरुस्त रखिये. धमाकों पर बिना आधार ओछी राजनीति तो मत करिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बात कांग्रेस की. कांग्रेस के एक बड़े नेता हैं श्रीप्रकाश जायसवाल. ये जनता का दुर्भाग्य है कि जायसवाल साहब देश के गृह राज्य मंत्री हैं. इनके बारे में एक बात मशहूर है कि ये किसी भी घटना पर बयान जारी कर सकते हैं, भले ही इन्हें उसके बारे में कोई जानकारी हो या नहीं. लेकिन इस बार तो हमारे गृह राज्य मंत्री जी ने सारी हदें तोड़ दीं. ये पहुंचे एक हवन में शामिल होने के लिए और वहां इन्होंने एक बेतुका बयान जारी कर दिया. श्री श्री १००८ श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा कि इस तरह के हवन होते रहने चाहिये. हवन होते हैं तो हमले नहीं होते. अगर ऐसा है तो जायसवाल साहब को तुरंत मंत्रिमंडल से बर्ख़ास्त कर देना चाहिये. जब भगवान पर ही देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी है तो गृह मंत्रालय की ज़रूरत क्या है?&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;कुल मिला कर ये कहा जाए कि ये धमाके इन्हीं दोनों पार्टियों बीजेपी और कांग्रेस के दोगलेपन की वजह से हुए हैं तो ग़लत नहीं होगा. देश और राज्यों में लंबे समय इन्हीं दोनों दलों का राज रहा है. समाज को बांटने में और आतंकवाद को बढ़ावा देने में इन्हीं दोनों पार्टियों का हाथ है और ऐसे में कई बार लगता है कि ये देश सच में भगवान भरोसे ही चल रहा है. &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-9001007535493618463?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/9001007535493618463/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=9001007535493618463' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/9001007535493618463'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/9001007535493618463'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/07/blog-post_29.html' title='इन्हें धमाकों से क्या ... ये तो खुद मौत के सौदागर हैं'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-5000458102209449022</id><published>2008-07-25T22:07:00.003+05:30</published><updated>2008-12-09T23:56:14.574+05:30</updated><title type='text'>यशोदा बड़ी या देवकी... क्या सच में तय करेगा कानून?</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIoBhzZ_aFI/AAAAAAAAAPk/yFCEPuvDyys/s1600-h/vivek.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5226991997763414098" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIoBhzZ_aFI/AAAAAAAAAPk/yFCEPuvDyys/s320/vivek.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; दो मां. एक मुसलमान और दूसरी हिंदू. बच्चा जो नौ साल पहले मुसलमान मां की कोख से जन्मा, लेकिन छह साल से उसे हिंदू मां पाल रही है. अब सवाल यह कि बच्चा किसका है? छह साल से हर दुख झेल उसे बड़ा करने वाली हिंदू मां का या फिर जन्म देने वाली मुसलमान मां का, जो बीते छह साल से हर पल उसे ढूंढ रही थी. पागलों की तरह इस गली से उस गली... इस छोर से उस छोर. बच्चा मिला तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा, लेकिन ये खुशी उस समय जाती रही जब बच्चे ने पहचानने से इनकार कर दिया. अब फ़ैसला कानून को करना है. जिसमें एक लड़ाई जन्म देने वाली मां हार चुकी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये कोई कहानी नहीं, हक़ीक़त है. गुजरात के एक नौ साल के बच्चे और उसकी दो मांओं की हक़ीक़त. उस बच्चे का नाम है मुज़फ़्फ़र मगर अब वो विवेक बन चुका है. वो अब पूजा करता है. हिंदू त्योहारों पर जश्न मनाता है. गायत्री मंत्र का जाप करता है. उसकी बहनें हैं जो उसे राखी बांधती हैं. वो भूल चुका है कि कभी उसके अब्बा मोहम्मद सलीम शेख़ उसे अंगुली थमा कर मस्जिद ले जाया करते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात २८ फरवरी, २००२ की है. गुजरात में वहशी दरिंदे सड़कों पर इंसानियत का ख़ून कर रहे थे. उन्हीं ख़ौफ़नाक पलों में मोहम्मद शेख़ ने अपने तीन साल के बच्चे मुज़फ़्फ़र, बहन फ़िरोज़ा और मां को अहमदाबाद की गुलबर्गा सोसायटी में पूर्व सांसद जाफ़री के घर पर पहुंचा दिया. इस उम्मीद में कि जाफ़री पूर्व सांसद थे और दंगाई उनके घर तक पहुंचने की हिम्मत नहीं करेंगे. लेकिन जब नरसंहार सत्ता में बैठे लोगों द्वारा प्रायोजित हो तो क्या जाफ़री और क्या शेख़. दंगाइयों ने वहां हमला किया और अगली सुबह शेख़ को हमेशा के लिए मौन हो चुकी मां मिली और बहन और बेटे का पता नहीं चला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके बाद शेख़ और उनकी बीवी ज़ेबुनिस्सा ने मुज़फ़्फ़र और फ़िरोज़ा की तलाश में दिन रात एक कर दिया. एक राहत शिविर से दूसरे राहत शिविर. एक शहर से दूसरे शहर. एक दर से दूसरे दर ... सभी जगह ढूंढा... गुहार लगाई, लेकिन हाथ खाली ही रहे. मुज़फ़्फ़र की याद आते ही मां का कलेजा फट पड़ता... वो मां हर वक़्त रोती रहती, पर करती भी तो क्या करती ... खुद की लाचारी और बदकिस्मती पर... वो कुछ आंसू बहा लेती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन दो हफ़्ते पहले जैसे ज़िंदगी लौट आई. सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ और सुप्रीम कोर्ट की तरफ से गठित एसआईटी की मदद से मुज़फ़्फ़र मिल गया. डीएनए टेस्ट में भी इसकी पुष्टि हो गई. लेकिन अब वो मुज़फ़्फ़र से विवेक विक्रम पटनी बन चुका है. मुसलमान से हिंदू में तब्दील हो गया है. सिर्फ़ धर्म ही नहीं बदला है, वक़्त ने जेहन में बसी असली मां-बाप की यादें मिटा दी हैं. अब वो मीना पटनी को मां मानता है और उसके पिता विक्रम पटनी की चार साल पहले मौत हो चुकी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दफ़्तर में जब ये रिपोर्ट आई तो मेरे चेहरे पर एक साथ कई भाव उतर आए. आंखों में मोदी और वीएचपी के लिए घृणा तो उभरी ही दोनों मांओं और बच्चे की स्थिति के बारे में सोच कर दर्द की लकीर भी खिंच गई. थोड़ी देर सोच में डूबा रहा फिर यही ख़्याल उभरा कि देखिये ज़िंदगी भी क्या गुल खिलाती है... मौत की आंधी में भी कुछ ऐसे दीये जलते हुए छोड़ जाती है जो सदियों तक भटके हुए लोगों को सही राह दिखाती रहें. वरना जिस गुजरात में हिंदुओं ने सत्ता के संरक्षण पर मुसलमानों का नरसंहार किया ... उसी गुजरात में इंसानियत की ये मिसाल क्यों? क्यों एक हिंदू मां ने मुसलमान बच्चे को अपनाया? और क्यों डीएनए टेस्ट के बाद भी वो ये मानने को तैयार नहीं कि ये बच्चा गैर है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेटे की पहचान होने के बाद ज़ेबुनिस्सा ने पटनी परिवार से अपना मुज़फ़्फ़र मांगा तो उन्होंने ये कह इनकार कर दिया कि वो किसी मुज़फ़्फ़र को जानते ही नहीं. उनके बेटे के नाम तो विवेक है. मामला मेट्रोपोलिटन जज के पास पहुंचा. अदालत में बेटे की झलक पाने के बाद ज़ेबुनिस्सा की आंखें छलक आईं, लेकिन बेटा मां के आंसू पहचान नहीं सका. पहचानता भी तो कैसे... जब बिछुड़ते वक़्त वो इतना छोटा था कि स्मृतियों को लंबे वक़्त तक सहेजने की कला सीख नहीं सका था. अदालत ने जब उससे पूछा कि वो किस मां के साथ रहना चाहता है तो उसने मीना की तरफ इशारा कर दिया. अब वो उन्हें ही मां समझता है और मुश्किल के वक़्त उन्हीं की आंचल में सिर छुपाता है. कोर्ट ने भी फ़ैसला मीना के हक़ में दिया. छह साल से जिगर के टुकड़े को तलाश रही ज़ेबुनिस्सा की झोली खाली रह गई. लेकिन इस बार वो बेटा खोना नहीं चाहती, इसलिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो भी मुज़फ़्फ़र से विवेक बन चुके बच्चे और उनकी दोनों मांओं की दास्तान को सुन रहा है उसके मन में पहला सवाल यही कौंधता है कि आखिर किस मां की झोली भरेगी, किसकी खाली रहेगी? कन्हैया यशोदा को मिलेगा या देवकी को? मेरे बहुत से साथियों का ये मत है कि देवकी को त्याग करना चाहिये। कान्हा को यशोदा के पास ही छोड़ देना चाहिये. लेकिन मेरा मत अलग है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं ये मानता हूं कि यशोदा की नियति ही त्याग है... उसे हर जन्म में कान्हा को प्यार देना है... लेकिन इस सोच के साथ कि कान्हा उनका नहीं है. सोचिये यशोदा की झोली खाली थी चंद वर्षों के लिए ही सही कान्हा ने उस झोली को खुशियों से भर दिया ... ज़िंदगी के कई खूबसूरत रंग दिखाए... लेकिन देवकी की झोली भरी थी... और खाली हो गई ... बीते छह साल में इस देवकी के हिस्से सिर्फ़ आंसू आएं हैं ... अगर इस बार भी उसकी झोली खाली रह गई तो ये बड़ा अनर्थ होगा. यशोदा क्या खुद को माफ कर सकेगी.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-5000458102209449022?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/5000458102209449022/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=5000458102209449022' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/5000458102209449022'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/5000458102209449022'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/07/blog-post_25.html' title='यशोदा बड़ी या देवकी... क्या सच में तय करेगा कानून?'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIoBhzZ_aFI/AAAAAAAAAPk/yFCEPuvDyys/s72-c/vivek.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-7041901329859978532</id><published>2008-07-24T18:19:00.002+05:30</published><updated>2008-12-09T23:56:14.722+05:30</updated><title type='text'>बाल हठ के शिकार हो गए हैं सोमनाथ चटर्जी</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIh9KXmAj_I/AAAAAAAAAPc/tTsfXhYfHXc/s1600-h/somnath.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5226564984649060338" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIh9KXmAj_I/AAAAAAAAAPc/tTsfXhYfHXc/s320/somnath.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;उम्र का अपना असर होता है. ये एक ऐसा सत्य है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता. बीते वक़्त में हमने चंद्रशेखर को देखा था और अभी सोमनाथ चटर्जी को देख रहे हैं. बुढ़ापे में व्यक्ति एक छोटे बच्चे की तरह फ़ैसले लेने लगता है. ग़लत होते हुए भी ग़लती मानने को तैयार नहीं होता. उसमें बार बार बाल हठ झलकता है. वो हठ कई बार खुद उसके लिए सही नहीं होता, लेकिन तब इतना विवेक ही कहां कि ग़लत और सही का फ़ैसला कर सके.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोमनाथ चटर्जी को सत्ता के गलियारे में सोमनाथ दा कहा जाता है. सोमनाथ ज़िंदगी भर लाल झंडा उठा कर चले. १९६८ से लेकर २००८ तक. चालीस साल. इन बीते चालीस साल में हमने कई सियासदानों को पथभ्रष्ट होते देखा. सत्ता के लिए कपड़े की तरह दल बदलते देखा.  सोमनाथ इन सबसे दूर अपनी पार्टी के साथ अटल रहे. लेकिन सियासत के आखिरी पड़ाव में बग़ावत पर उतर आए. ये भूल कर कि आज वो जिस मुकाम पर पहुंचे हैं उसमें उनकी काबिलियत तो है मगर लाल झंडे का योगदान ज़्यादा बड़ा है. फिर आज वो खुद को उस झंडे से बड़ा कैसे मान बैठे हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कायदे से होना तो यह चाहिये था कि सोमनाथ विश्वास प्रस्ताव पर बहस के लिए बुलाए गए विशेष सत्र से पहले ही स्पीकर पद से इस्तीफ़ा दे देते. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. जिस पोलित ब्यूरो ने उनकी गुजारिश पर उन्हें स्पीकर बनने के लिए हरी झंडी दिखाई थी. सोमनाथ ने उसी पोलित ब्यूरो की गुजारिश को ठुकरा दिया. बहुत से लोग कहने लगे कि ऐसा करके उन्होंने स्पीकर पद की गरिमा बचाए रखी. मेरा मत ऐसा बिल्कुल नहीं है, फिर भी थोड़ी देर के लिए मैं इस तर्क को मान लेता हूं. तो क्या विश्वास मत के बाद उन्हें पार्टी का मान नहीं रखना चाहिये था?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्वास मत से पहले उन्होंने अपने करीबी सूत्रों के जरिये ये संदेश भिजवाया कि मनमोहन सरकार की किस्मत का फ़ैसला होते ही वो पद से इस्तीफ़ा दे देंगे. साथ ही संसद की सदस्यता से भी. लेकिन अब इस्तीफ़ा देने की बात तो दूर विदेश दौरे की योजना बना रहे हैं. जाहिर है पद का मोह उन पर हावी हो चुका है. वो भी इस कदर कि सीपीएम से निकाले जाने और नैतिक आधार गंवाने के बाद भी वो पद पर बने रहना चाहते हैं. यही नहीं वो कांग्रेस और यूपीए नेताओं से मिल रहे हैं. लेकिन बावजूद इसके अब भी यही उम्मीद है कि धुंधली पड़ चुकी ही सही, एक विचारधारा से चालीस साल की वफादारी को वो गद्दारी से कलंकित नहीं करेंगे. अपना बाल हठ छोड़ कर विवेक से फ़ैसला लेंगे और अगले कुछ दिनों में स्पीकर पद से इस्तीफ़ा दे देंगे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-7041901329859978532?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/7041901329859978532/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=7041901329859978532' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/7041901329859978532'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/7041901329859978532'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/07/blog-post_7308.html' title='बाल हठ के शिकार हो गए हैं सोमनाथ चटर्जी'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIh9KXmAj_I/AAAAAAAAAPc/tTsfXhYfHXc/s72-c/somnath.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-6746094145181565377</id><published>2008-07-24T00:41:00.001+05:30</published><updated>2008-12-09T23:56:15.181+05:30</updated><title type='text'>लो अब चलेगा देश बेचने का खुला खेल</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIeCm-ILaII/AAAAAAAAAPU/h99LZwD0aE0/s1600-h/soniaandManmohan.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5226289498610690178" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIeCm-ILaII/AAAAAAAAAPU/h99LZwD0aE0/s320/soniaandManmohan.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;लेफ़्ट&lt;/span&gt; ने समर्थन वापस ले लिया फिर भी सरकार बच गई. तीन पार्टियों बीजेपी, शिवसेना, बीजेपी और टीडीपी के जयचंदों ने मिल कर सरकार बचा दी. मनमोहन की बांछें खिल गई हैं. उनकी आका सोनिया और कांग्रेस के सारे पंटर भी जश्न मना रहे हैं. जश्न मुंबई में भी मनाया जा रहा है. शेयर बाज़ार के सारे दलाल सक्रिय हो गए हैं. निफ़्टी और सेंसेक्स छलांगे लगा रहा है. एक झटके में अमेरिका की मंदी का असर ख़त्म हो गया है. पहले ही दिन सेंसेक्स ने साढ़े आठ सौ अंकों की छलांग लगाई और निफ़्टी ने करीब ढाई सौ अंक. ये छलांग बताती है अब देश में आर्थिक सुधारों के नाम पर खुला खेल चलेगा. लेफ़्ट की लगाम हट गई है और अब दलालों का राज है. सरकारी कंपनियां बेची जाएंगी, निजी कंपनियों को कई तरह की रियायतें दी जाएंगी. उन रियायतों के लिए चिदंबरम एंड कंपनी को भी तोहफा मिलेगा. अरे हां, अमर सिंह को मत भूलियेगा... वो इस वक़्त का सबसे बड़ा दलाल है, बिल्डरों के हाथ उत्तर प्रदेश के कई शहर बेच चुका है और अब देश बेचने की तैयारी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसको विस्तार से समझने के लिए ज़्यादा जोर देने की ज़रूरत नहीं है. आज जिन कंपनियों के भाव चढ़े हैं उनमें सबसे ऊपर जूनियर अंबानी की कंपनियां हैं. अमर सिंह के दोस्त अनिल अंबानी की कंपनियां. आरएनआरएल जैसी कमजोर कंपनी के भाव सबसे अधिक २२ फ़ीसदी चढ़े. यही नहीं पिछले छह महीने से मार झेल रही रियेलिटी सेक्टर की कंपनियां अब बूम-बूम कर रही हैं. किसी शेयर का भाव नौ फ़ीसदी बढ़ा है तो किसी का दस फ़ीसदी. सेल जैसी सरकारी कंपनी भी नौ फ़ीसदी ऊपर है. ये संकेत है कि अब देश में क्या होने जा रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ पढ़े लिखे लोग तर्क दे रहे हैं कि लेफ़्ट की समर्थन वापसी से देश के विकास में तेजी आएगी, जैसे लेफ़्ट ने विकास की रफ़्तार रोक रखी थी. उनके मुताबिक लेफ़्ट फ्रंट ने बीते चार साल में देश को गर्त में मिला दिया. अरे भाई जरा दिमाग पर जोर दीजिये और बताइये कि आखिर लेफ़्ट फ्रंट ने ऐसे कौन से गुनाह किये जो देश गर्त में मिल गया. सरकारी कंपनियों को बेचने से रोका तो क्या ग़लत किया? पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने पर हंगामा काटा तो क्या ग़लत हुआ? क्या किसानों को दी जा रही सब्सिडी में कटौती का विरोध ग़लत था? क्या गरीबों को सुविधाएं देने की वकालत करना गुनाह है? क्या रोजगार गारंटी योजना के लिए दबाव गुनाह है? आखिर लेफ़्ट ने ऐसा क्या किया जिससे उस पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश की सत्ता के शीर्ष पर बैठे सबसे बड़े पंटर मनमोहन सिंह की माने तो लेफ़्ट ने उनकी सरकार को बंधुआ बना कर रखा था. ये एक बेहद बेहूदा टिप्पणी है. खासकर तब जब आपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम को तोड़ा हो ना कि आपको समर्थन दे रहे लेफ़्ट ने. वैसे मनमोहन के उस बयान पर मैं हैरान नहीं हुआ. ये सिर्फ मनमोहन नहीं बल्कि पूरे कांग्रेस का चरित्र है. ये वही पार्टी है जिसने एक बार नहीं कई कई बार गठबंधन सरकार को सिर्फ अपनी शर्तें नहीं मानने के कारण एक साल के भीतर गिरा दिया. चरण सिंह, देवेगौड़ा, आई के गुजराल और चंद्रशेखर इसके गवाह हैं. आज़ादी बाद के कांग्रेस के इतिहास को देख कर और कांग्रेसी नेताओं के बयान को सुन कर तो यही लगता है कि ऐसी दोगली पार्टी और उसके सबसे बड़े पंटर मनमोहन सिंह की सरकार को चार साल तक समर्थन देते रहने ही लेफ़्ट का सबसे बड़ा गुनाह है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए आज यूपीए की जीत पर जो भी जश्न मना रहे हैं वो कल पछताने के लिए तैयार रहे हैं. क्योंकि ऐसा ही जश्न तब मनाया गया था जब देश में बेरोक-टोक आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई. तब से अब तक विकास तो बहुत हुआ है, लेकिन देश का नहीं अंबानी और टाटा जैसे घरानों का. देश का तो काफी कुछ बिक चुका है और बाकी जो भी बचा है... उसमें से बहुत कुछ अगले छह महीने में बिक जाएगा. तो सोनिया एंड कंपनी तुम देश बेचने का खुला खेल शुरू करो... आज जो तुम्हारी जीत का जश्न मना रहे हैं... कल तो उन्हें पछताना ही है. &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-6746094145181565377?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/6746094145181565377/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=6746094145181565377' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/6746094145181565377'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/6746094145181565377'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/07/blog-post_24.html' title='लो अब चलेगा देश बेचने का खुला खेल'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIeCm-ILaII/AAAAAAAAAPU/h99LZwD0aE0/s72-c/soniaandManmohan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-4058664356312018111</id><published>2008-07-22T23:35:00.002+05:30</published><updated>2008-12-09T23:56:15.560+05:30</updated><title type='text'>जीत ऐसी जो सिर शर्म से झुका दे</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIYiX1SVRkI/AAAAAAAAAO0/aud77VZ2yWI/s1600-h/manmohan+victory.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5225902210446345794" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIYiX1SVRkI/AAAAAAAAAO0/aud77VZ2yWI/s320/manmohan+victory.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;यूपीए&lt;/span&gt; सरकार जीत गई. लोकसभा में मनमोहन सिंह के विश्वास प्रस्ताव पर मतदान के नतीजे उसके पक्ष में गए हैं. लेकिन इस नतीजे पर फख्र महसूस करने का हक़ किसी को नहीं है. ना ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को, ना उनकी आका सोनिया गांधी को, ना ही अमर सिंह और मुलायम सिंह यादव को और ना ही उनके समर्थकों को. इसलिए कि इस विश्वास मत से पहले और उसके दौरान जितनी गंदगी फैली है उसे साफ करने में कई दशक लगेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार के विश्वास मत ने अवसरवाद की नई परिभाषा को जन्म दिया. बताया कि सत्ता के संघर्ष में विचार कहीं नहीं टिकते. सत्ता सर्वोपरी है और उसे हासिल करने के लिए विचारों का वध भी जायज है. यही वजह है कि चार साल तक कांग्रेस से लतियाए जाने के बाद भी मुलायम आखिर में कांग्रेस की गोद में जाकर बैठक गए. जम्मू कश्मीर में चंद दिनों पहले कांग्रेस की सरकार गिराने वाले नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी ने मनमोहन सरकार के समर्थन में वोट दिया. अमेरिका के ख़िलाफ़ नारेबाजी करने वाले ज़्यादातर मुस्लिम सांसद अमेरिका से हुए ऐटमी करार के पक्ष में नज़र आए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्ता बचाने वालों ने पूरी नंगई की तो गिराने वालों ने भी कम गलीचपन नहीं किया. एक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सरकार को गिराने के लिए दक्षिणपंथी और वामपंथी एक मंच पर आ गए. जाति की राजनीति का विरोध करने का दंभ भरने वाले वामपंथी सिर्फ जाति की राजनीति करने वाली मायावती के हाथ से हाथ मिला बैठे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिर्फ वैचारिक धरातल पर ही नहीं मर्यादाएं हर स्तर पर टूटी हैं. पहली मर्तबा नेताओं ने खुल कर एक दूसरे पर खरीदो-फ़रोख़्त के आरोप लगाए. इसकी शुरुआत सीपीआई महासचिव एबी बर्धन के बयान से हुई, फिर इस विवाद को हवा दी मायावती, मुलायम और अमर सिंह और अंत बीजेपी सांसदों ने लोकसभा में रुपयों की नुमाइश से किया. लगता है कुछ और दिन के लिए बहस खिंचती तो ना जाने क्या-क्या हो जाता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं इस दौरान जुबां की तल्खी भी देखने को मिली. तल्खी भी ऐसी जिसे मिटाने में कई पीढ़ियां लग जाएं. संसद के बाहर तो गालीगलौज हुआ ही. भीतर भी नेताओं ने एक दूसरे को बेपर्दा किया. वो भी इतना कि लाइव प्रसारण की आवाज़ बंद कर देनी पड़ी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना सबकुछ होने के बाद जब विश्वास प्रस्ताव पर मतदान के नतीजे आए तो सोनिया गांधी और उनके भांट मनमोहन सिंह का चेहरा खिला हुआ था. उनके खिले चेहरों से ये तो अंदाजा लगाया ही जा सकता है कि बीते साठ साल में हमने कितना कुछ खो दिया है. सिर्फ स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों से गद्दारी नहीं की है बल्कि खुद से भी गद्दारी की है. तभी तो हमारी आंखों का पानी सूख गया है... वर्ना आज एक अरब से ज़्यादा हिंदुस्तानियों की आंख से थोड़ा-थोड़ा पानी भी बहता तो संसद की सारी गंदगी बह जाती. &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-4058664356312018111?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/4058664356312018111/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=4058664356312018111' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/4058664356312018111'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/4058664356312018111'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/07/blog-post_9850.html' title='जीत ऐसी जो सिर शर्म से झुका दे'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIYiX1SVRkI/AAAAAAAAAO0/aud77VZ2yWI/s72-c/manmohan+victory.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-4959932946373270391</id><published>2008-07-22T18:38:00.002+05:30</published><updated>2008-12-09T23:56:15.705+05:30</updated><title type='text'>पूरे देश को नंगा कर दिया</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIXcGZp6SLI/AAAAAAAAAOs/bkgFZcDLVDo/s1600-h/MP+BRIBE.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5225824945157327026" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIXcGZp6SLI/AAAAAAAAAOs/bkgFZcDLVDo/s320/MP+BRIBE.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;आज&lt;/span&gt; संसद में जो कुछ भी हुआ, वह बेहद घिनौना था. बीजेपी के तीन सांसद अशोक अर्गल, फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर भगौड़ा ने लोक सभा के पटल पर नोटों से भरा बैग रखा. उसके बाद बैग से नोटों की गड्डियां निकाल कर कैमरे के सामने दिखाया. फिर पूरे देश और दुनिया को चीख चीख कर समाजवादी पार्टी के महासचिव अमर सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल ने उन्हें खरीदने की कोशिश की. ये एक करोड़ रुपये उन्हें बतौर एडवांस दिये गए हैं ... आठ करोड़ रुपये और बाद में दिये जाने हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीते दस दिन से हम सुनते आ रहे थे कि सांसद खरीदे और बेचे जा रहे हैं, डराए-धमकाए जा रहे हैं. लेकिन अब तो वो नंगापन सबके सामने है. ये सिर्फ हमारे सांसदों का नंगापन नहीं है. बल्कि ये वो चेहरा है जिससे हम हर रोज रू-ब-रू होते हैं और आंख मूंद कर गुजर जाते हैं. इस अंदाज में कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं है. लेकिन आज तो हम पलकें बंद करेंगे तो भी संसद का वो घिनौना दृश्य आंखों में कौंधता रहेगा और वो तस्वीरें हमें बार-बार याद दिलाती रहेंगी कि आज सिर्फ हमारे सांसद और हमारी संसद नंगी नहीं हुई है बल्कि पूरे देश को बेपर्दा कर ... कोठे पर बिठा दिया गया है. और सफेद कपड़े पहने चंद लोग उसकी बोली लगा रहे हैं... कह रहे हैं खरीद सको तो खरीद लो ... ये देश बिकाऊ है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीजेपी सांसदों के आरोपों में कितना दम है. ये जांच का विषय है. अमर सिंह और अहमद पटेल दोषी हैं या फिर ये उन्हें फंसाने की साज़िश है, उस सच से पर्दा उठना बाकी है. लेकिन उस सच से इतर एक सच ये भी है कि देश की संसदीय प्रणाली की आत्मा मर चुकी है. सिर्फ संसदीय प्रणाली ही क्यों हमारे और आपके भीतर भी बहुत कुछ मर चुका है. शायद यही वजह है कि आज इस घटना के बाद भी कहीं कुछ नहीं रुका. ये मुर्दा कौम अपनी रफ्तार से चलती रही. लोग आंसू बहाने की जगह हंसते रहे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-4959932946373270391?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/4959932946373270391/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=4959932946373270391' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/4959932946373270391'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/4959932946373270391'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/07/blog-post_22.html' title='पूरे देश को नंगा कर दिया'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIXcGZp6SLI/AAAAAAAAAOs/bkgFZcDLVDo/s72-c/MP+BRIBE.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-484660664179920224</id><published>2008-07-21T17:33:00.004+05:30</published><updated>2008-12-09T23:56:15.915+05:30</updated><title type='text'>डीलर नहीं लीडर चाहिये</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIR8Et1fSjI/AAAAAAAAAOk/SlLMAExiLyU/s1600-h/manmohan_bush1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5225437888121883186" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIR8Et1fSjI/AAAAAAAAAOk/SlLMAExiLyU/s320/manmohan_bush1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;अभी&lt;/span&gt; लोकसभा में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विश्वास प्रस्ताव पर बहस चल रही है. इस बहस के दौरान सीपीएम सांसद मोहम्मद सलीम ने एक बेहद संजीदा मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि जैसे अमेरिका की कंपनियां भारत में काम आउटसोर्स करती हैं, वैसे ही मनमोहन सरकार ने देश की विदेश नीति अमेरिका को आउटसोर्स कर दी है. वो विदेश नीति जिसे आजादी की लड़ाई लड़ने वाले आज़ाद रखना चाहते थे, उसे अमेरिका का गुलाम बना दिया. सलीम ने ये भी कहा कि लेफ्ट फ्रंट ने न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर यूपीए को समर्थन दिया था, अमेरिका को नहीं. फिर ये डील कहां से आयी और लेफ्ट से उसके समर्थन की उम्मीद क्यों की गई. सलीम ने इसी आक्रामक अंदाज में ये भी कहा कि डील की बात डीलर करते हैं लीडर नहीं. लीडर तो डील से आगे सोचता है. उसका भूत, वर्तमान और भविष्य देखता है. इसलिए देश को डीलर नहीं बल्कि लीडर चाहिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोहम्मद सलीम के इस बयान में भारत-अमेरिका ऐटमी डील की सच्चाई है तो देश के सियासत का ख़तरनाक सच भी. आज हमारे देश में तात्कालिक नफा-नुकसान से ऊपर उठ कर देशहित में फ़ैसले लेने वाले नेता कितने है, अगर गिनने बैठिये तो दोनों हाथों की अंगुलियां कम पड़ जाएंगीं. उनमें भी अगर ऐसे नेता की बात करें जिसका एक बड़ा जनाधार हो तो वैसा नेता एक भी नहीं मिलेगा. जो हैं या तो मनमोहन सिंह की तरह किताबी अर्थशास्त्री हैं. प्रणब मुखर्जी और अर्जुन सिंह की तरह बीते जमाने के धुर्त रणनीतिकार हैं. लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और राम विलास पासवान जैसे पथभ्रष्ट और सत्ता लोलुप समाजवादी हैं. अमर सिंह जैसे दलाल हैं और सूरजभान, शहाबुद्दीन, मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद और राजा भैया जैसे पेशेवर अपराधी हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन नेताओं की फेहरिस्त में एक भी ऐसा नहीं है जिसे गरीबों से कोई वास्ता हो. जिसे किसानों से कोई लेना देना हो. जो स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे गंभीर मुद्दों पर संजीदा होकर सोचता हो. अगर ऐसा होता तो अमेरिका से किसी भी तरह की सौदेबाजी से पहले पानी की समस्या पर विचार किया जाता. देखिये इस साल भी बुंदेलखंड में सूखा है. इस साल भी ना जाने कितने किसान साहूकार का कर्ज चुकाने के लिए खेत बेचेंगे, ना जाने कितने भूख से बीमार पड़ कर दम तोड़ेंगे. ना जाने कितने किसान मालिक से मजदूर बनकर शहरों की फैक्ट्रियों में काम करेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर कोई संजीदा नेता होता तो वो ऐटमी करार से पहले सोचता कि किस तरह दिल्ली से सैकड़ों मील दूर बस्तर और पलामू में भी अच्छे अस्पताल खुलवाएं जाएं. ऐसे अस्पताल जहां गरीबों को उनकी हैसियत में भी अच्छा इलाज मिल सके. उन दूर दराज के इलाकों को छोड़ दें, दिल्ली से साठ किलोमीटर दूर जाने पर भी कोई औसत दर्जे का अस्पताल नहीं मिलता. दिल्ली में भी जो हैं वो अमीरों के लिए हैं. गरीब तो कतार में खड़े होने के लिए और मरने के लिए छोड़ दिये जाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज क्या कोई नेता सोचता है कि देहात में बच्चों को अच्छी शिक्षा दी जाए ताकि वो बड़े होकर अपने लिए एक बेहतर भविष्य तैयार कर रहे हैं. गायक, संगीतकार, चित्रकार, कलाकार या फिर खिलाड़ी बनने जैसे सपनों को पूरा करने की बात छोड़ दीजिये, जरूरतें पूरी करने लायक कमा सकें. नहीं, ऐसा संवेदनशील नेता एक भी नहीं है? यही वजह है कि गांव के बच्चे वैसे सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं जहां टीचर नहीं. टीचर हैं तो उन पर नज़र रखने की व्यवस्था नहीं. बच्चे पढ़ लिख कर आगे बढ़ने की जगह या तो कमाई का आसान रास्ता तलाशते हुए अपराध के दलदल में फंसते हैं या फिर मजदूरी के लिए गांव छोड़ शहरों की ओर भागते हैं. अपनी मिट्टी और परिवार से दूर गुलामों की तरह काम करते हुए चंद पैसे जोड़ कर घर भेजते हैं, ताकि उनके बच्चे पढ़ सकें, लेकिन उन गांव में तो वही व्यवस्था है जिसका वो खुद शिकार हुए. वो व्यवस्था अब भी नहीं बदली है और उम्मीद की रोशनी भी कहीं नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए आज मनमोहन से... माफ कीजियेगा... सोनिया गांधी से पूछा जाना चाहिये कि बीते चार साल और दो महीनों में उन्होंने इस देश के लिए क्या किया? सोनिया से इसलिये कि देश की जनता ने उन्हें चुना था, मनमोहन को नहीं. मनमोहन तो शुरू से डीलर थे, लीडर नहीं. यही वजह है कि वो चार साल तक सत्ता के शीर्ष पर बैठे रहने के बाद भी जनता के बीच जाने का साहस नहीं जुटा सके. लोकसभा का चुनाव कभी लड़ नहीं सके. बस डील के चक्कर में पड़े रहे, डील भी ऐसी कि देश की सम्प्रभुता ही दांव पर लग जाए.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-484660664179920224?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/484660664179920224/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=484660664179920224' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/484660664179920224'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/484660664179920224'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/07/blog-post_21.html' title='डीलर नहीं लीडर चाहिये'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIR8Et1fSjI/AAAAAAAAAOk/SlLMAExiLyU/s72-c/manmohan_bush1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-621568238239718228</id><published>2008-07-20T14:03:00.002+05:30</published><updated>2008-12-09T23:56:16.104+05:30</updated><title type='text'>तो सोनिया इसलिए नहीं बनीं प्रधानमंत्री</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIL5OL_JXrI/AAAAAAAAAOc/I0yw5LgNev0/s1600-h/SoniaGandhi.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5225012539834326706" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIL5OL_JXrI/AAAAAAAAAOc/I0yw5LgNev0/s400/SoniaGandhi.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;बात&lt;/span&gt; २००४ की है. उन दिनों मैं स्टार न्यूज़ में था. आम चुनाव हो चुके थे और सियासी उठापटक के बीच सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से मिलने गए. उस समय हमारे सीनियर प्रोड्यूसर अजित साही पूरे दफ़्तर में घूम-घूम कर पूछ रहे थे कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा? उनके मुताबिक सोनिया प्रधानमंत्री बनने वाली थीं और जो उनके राय से इत्तेफाक रखता वो उसकी तारीफ करते जो नहीं वो उसे पागल घोषित कर देते. उसी क्रम में वो मेरे पास भी आए. मैंने कहा कि कौन बनेगा ये तो नहीं कह सकता लेकिन इतना तय है कि सोनिया गांधी नहीं बनेंगी. अजित साही ने मुझे भी पागल घोषित कर दिया. मैंने उनसे कहा कि सोनिया विदेशी मूल की हैं और अगर उन्होंने प्रधानमंत्री पद कबूल किया तो उनके हर फ़ैसले को देशभक्ति के पैमाने पर तोला जाएगा और एक गलत फ़ैसले पर उन्हें जनता के बीच देशद्रोही घोषित कर दिया जाएगा. ऐसे में मेरा आकलन तो यही कहता है कि उनमें अगर हल्की सी भी सियासी समझ होगी तो वो प्रधानमंत्री नहीं बनेंगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुआ भी ऐसा ही. सोनिया प्रधानमंत्री नहीं बनीं. उन्होंने त्याग का दांव खेला और उनका ये दांव अब तक सही जा रहा है. सोचिये आज सोनिया देश की प्रधानमंत्री होतीं और उनकी अगुवाई में देश अमेरिका से ऐटमी करार करता. तब क्या विरोध के तेवर यही होते?  नहीं. वैसी सूरत में अब तक ये नारा दिया जा चुका होता कि इटली मूल की सोनिया ने भारत की अस्मिता को अमेरिका के हाथों बेच दिया. लेकिन सोनिया और उनके चेलों ने बड़ी चतुराई से विरोध के इस तीखे तेवर को अब तक दूर रखा है. बार बार यही कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ऐटमी करार चाहते हैं. मनमोहन की चाहत और सीपीएम महासचिव प्रकाश करात की जिद की वजह से आज ऐसा सियासी संकट पैदा हुआ है जिसने संसद को बाज़ार बना दिया है और सांसदों की बोली लगाई जा रही है. जबकि हक़ीक़त इसके एकदम उलट है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर किसी कम अक्ल से भी पूछा जाए कि बीते चार साल से सरकार कौन चला रहा था?  सोनिया या मनमोहन? तो सब यही कहेंगे कि सोनिया. यूपीए की चेयरमैन सोनिया के इशारे से मनमोहन सभी काम करते रहे. उनकी भूमिका एक कठपुतली से अधिक नहीं रही. ऐटमी करार भी मनमोहन ने नहीं सोनिया ने किया है. अगर सोनिया नहीं चाहतीं तो मनमोहन की हिम्मत और हैसियत ऐसी नहीं थी कि वो इतना बड़ा फैसला लेते. अपनी उसी जिद को पूरा करने के लिए आज सोनिया गांधी हर हथकंडे अपना रही हैं. प्रधानमंत्री निवास से कहीं ज्यादा गहमागहमी सोनिया के घर यानी दस जनपथ पर है. हर सांसद से सोनिया खुद मिल रही हैं. मनमोहन के भरोसे पर नहीं बल्कि सोनिया से मुलाकात के बाद और उनके भरोसे पर शिबू सोरेन जैसे नेता यूपीए को समर्थन देने को तैयार हो रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए अगर आज के सियासी संकट के लिए कोई जिम्मेदार है तो वो सिर्फ और सिर्फ सोनिया गांधी हैं. देश की अस्मिता को ख़तरे में डालने के लिए भी अगर कोई जिम्मेदार हैं तो वो हैं सोनिया गांधी. बिजली बनाने के नाम पर भारत की सुरक्षा से समझौता करने के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो वो हैं सोनिया गांधी. अगर सरकार बची और करार पर अमल हुआ तो वक़्त इस तथ्य पर छाए धुंधलके को और साफ कर देगा. तब इस देश की जनता सोनिया गांधी से उनकी इस साज़िश का जवाब मांगेगी. तब सोनिया से पूछा जाएगा कि क्या देश को इतना बड़ा धोखा देने के लिए ही आपने त्याग का नाटक खेला था? प्रधानमंत्री का पद ठुकराया था? एक ऐसा धोखा जिससे उबरने के लिए हम लोगों को ना जाने कितना संघर्ष करना होगा. &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-621568238239718228?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/621568238239718228/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=621568238239718228' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/621568238239718228'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/621568238239718228'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/07/blog-post_20.html' title='तो सोनिया इसलिए नहीं बनीं प्रधानमंत्री'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SIL5OL_JXrI/AAAAAAAAAOc/I0yw5LgNev0/s72-c/SoniaGandhi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-738923393120342919</id><published>2008-07-17T11:47:00.001+05:30</published><updated>2008-07-17T11:52:44.400+05:30</updated><title type='text'>सोमनाथ जवाब दो... और कैसे रोका जा सकता है करार?</title><content type='html'>सोमनाथ चटर्जी ने फिर कहा है कि वो बीजेपी के साथ यूपीए सरकार के ख़िलाफ़ मतदान नहीं करेंगे और अपने पुराने रुख़ पर कायम हैं. ये बेहद बचकाना तर्क है. सोमनाथ चटर्जी से पूछा जाना चाहिये कि ऐटमी डील के ख़िलाफ़ हैं या पक्ष में। अगर वो पक्ष में हैं तब तो बहस की दिशा अलग होगी. अगर ख़िलाफ़ हैं तो उनसे ये पूछा जाना चाहिये कि सरकार को अमेरिका से ऐटमी करार से रोकने का क्या उपाय है? क्या सरकार गिराए बगैर ऐटमी डील रोकी जा सकती है? किसी भी औसत विवेक वाले शख़्स से भी ये पूछा जाए तो उसका सीधा जवाब होगा... नहीं. जब सरकार गिराए बगैर ऐटमी डील नहीं रोकी जा सकती तो फिर सोमनाथ से ये भी पूछा जाना चाहिये कि बिना बीजेपी के साथ मतदान किये वो सरकार कैसे गिराएंगे और ऐटमी डील को कैसे रोकेंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां सोमनाथ ये भी बताएं कि विश्वास मत पर मतदान बराबरी पर छूटा तब वो क्या करेंगे? वैसी सूरत में लोकसभा अध्यक्ष को अपना मत देना होता है. तब क्या वो मत बीजेपी के ख़िलाफ़ और यूपीए के पक्ष में देंगे. दरअसल सोमनाथ चटर्जी की कोई भी दलील गले नहीं उतर रही. उनके जैसे सीपीएम के कुछ और सांसद यही राग अलाप रहे हैं. उन सांसदों की सोच पर ताज्जुब होता है. यहां उन तमाम सांसदों को यह भी याद दिलाना चाहिये कि इन्हीं सोमनाथ चटर्जी को जब लोकसभा का अध्यक्ष बनाया जा रहा था तब बीजेपी ने भी उनके नाम का विरोध नहीं किया था. तब क्यों नहीं सोमनाथ चटर्जी ने सामने आकर कहा कि उन्हें बीजेपी के समर्थन की कोई जरूरत नहीं. हालांकि तब बीजेपी के समर्थन या विरोध से उनके चुनाव पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता, फिर भी सोमनाथ को सांकेतिक तौर पर ही सही ये कहना चाहिये था कि उन्हें बीजेपी का समर्थन नहीं, विरोध चाहिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिर्फ इन्हीं सवालों का जवाब क्यों, सोमनाथ को ये भी बताना होगा कि अगर वो सिर्फ एक सांसद होते और सदन में महिला विधेयक पेश किया जाता, बीजेपी उसके समर्थन में वोट देती तो क्या वो उसके ख़िलाफ़ खड़े होते? उन्हें ये भी बताना होगा कि अब तक के अपने संसदीय इतिहास में ऐसे कौन कौन से विधेयक हैं जिनमें उनकी पार्टी ने बीजेपी के साथ मतदान किया और उन्होंने उसके ख़िलाफ़.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच यही है कि आज ये बुजुर्ग सियासतदान या तो पद का लोभी हो चुका है या फिर अमेरिका से ऐटमी करार के समर्थन में है. यही वजह है कि वो अपने बचाव में ऐसी बेतुका दलीलें गढ़ रहा हैं जिन्हें मंजूर नहीं किया जा सकता.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-738923393120342919?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/738923393120342919/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=738923393120342919' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/738923393120342919'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/738923393120342919'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/07/blog-post_17.html' title='सोमनाथ जवाब दो... और कैसे रोका जा सकता है करार?'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-9147192452828043832</id><published>2008-07-16T09:35:00.000+05:30</published><updated>2008-07-16T09:38:52.843+05:30</updated><title type='text'>तो सोमनाथ भी अमेरिकी एजेंट बन गए</title><content type='html'>पथभ्रष्ट होने की कोई उम्र नहीं होती. कोई बचपन में ही राह भटक जाता है तो कोई उम्र की आखिरी दहलीज पर. लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी अस्सी साल की उम्र में अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल करने जा रहे हैं. उन्होंने सीपीएम के आदेश को ठुकराते हुए लोकसभा अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है. ये जानते बूझते कि इस समय सीपीएम ऐतिहासिक लड़ाई लड़ रही है. अगर सरकार बची तो ऐटमी करार पर अमल होगा और भारतीय विदेश नीति की दिशा बदल जाएगी. क्या सोमनाथ चटर्जी नहीं जानते कि इससे भारत की संप्रभुता ख़तरे में पड़ेगी. भारत अमेरिका का पिछलग्गू देश बन कर रह जाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोकतंत्र में एक-एक वोट की बड़ी अहमियत होती है. सोमनाथ चटर्जी से बेहतर शायद ही कम लोग वोट के महत्व को समझते होंगे. उन्होंने भी १९९९ में देखा था कि किस तरह उड़ीसा में मुख्यमंत्री होते हुए भी गिरधर गोमांग ने बतौर सांसद सदन में वोट दिया और वाजपेयी सरकार गिर गई। अगर गोमांग का एक वोट नहीं पड़ा होता तो वाजपेयी सरकार बच जाती. इसलिए एक वोट की ताकत से इनकार नहीं किया जा सकता. फिर भी अगर सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर बने रहने की जिद कर रहे हैं, ये सोच कर हैरानी होती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां सोमनाथ चटर्जी का तर्क है कि वो बीजेपी के साथ वोटिंग के ख़िलाफ़ हैं. इसलिए वो पद नहीं छोड़ेंगे. इस तर्क का कोई मतलब समझ में नहीं आता. संसद में क्या वो किसी बिल का समर्थन ये देख कर करते हैं कि उस पर बीजेपी की राय क्या है? अगर ऐसा है तो सोमनाथ चटर्जी को सांसद बनने का कोई हक नहीं. उन्हें तुरंत बतौर सांसद अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिये. अगर उनके जैसा पढ़ा-लिखा शख़्स अपने फ़ैसले बीजेपी के रुख के आधार पर करता है, मुद्दों के आधार पर नहीं तो ये सोच भारतीय लोकतंत्र की त्रासदी पर हंसा ही जा सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय राजनीति इस वक़्त ऐतिहासिक मोड़ पर है. ख़तरा भीतरी दुश्मन से नहीं बल्कि अमेरिका जैसे बाहरी शत्रु से है जो दोस्त बन कर हमारी पीठ पर छूरा घोंपना चाहता है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमेरिका के एजेंट की तरह बर्ताव कर रहे हैं. अमर सिंह ने हमेशा दलाली की है और इस बार वो अपने आका मुलायम सिंह के साथ बड़ी गोटी सेट करने में जुटे हैं. दिल्ली में कारोबारी भी अड्डा जमा चुके हैं. सांसदों का बाज़ार सज चुका है, खरीद फ़रोख़्त शुरू हो गई है, बोलियां पर बोलियां लग रही हैं. ऐसे अनैतिक तरीके से सरकार बचाने में जुटी यूपीए को अगर सोमनाथ चटर्जी समर्थन कर रहे हैं तो ये ऐतिहासिक भूल है. इसके लिए उन्हें इतिहास कभी माफ नहीं करेगा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-9147192452828043832?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/9147192452828043832/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=9147192452828043832' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/9147192452828043832'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/9147192452828043832'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/07/blog-post_16.html' title='तो सोमनाथ भी अमेरिकी एजेंट बन गए'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-8060653577986033470</id><published>2008-07-15T11:32:00.002+05:30</published><updated>2008-07-15T11:46:49.931+05:30</updated><title type='text'>मैं असद ज़ैदी का गुनहगार नहीं</title><content type='html'>मैं, असद ज़ैदी को सिर्फ एक पाठक की हैसियत से ही जानता हूं. इसलिए अभी तक &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2008/07/blog-post_11.html"&gt;मोहल्ले &lt;/a&gt;पर छिड़ी बहस में नहीं कूद रहा था. इसलिए भी कि किसी गैरजरूरी विवाद में कूदना मेरी आदत नहीं. लेकिन अब इस विवाद को दूसरा रंग दिया जा रहा है. कुछ लोग ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि असद ज़ैदी की बेइज्जती हुई और उनकी धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़े किये गये तो इसके लिए सभी &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2008/07/blog-post_14.html"&gt;“सज्जन” व्यक्ति जिम्मेदार हैं.&lt;/a&gt; इसलिए कि इन भले लोगों ने इस गैर जरूरी बहस में हिस्सा नहीं लिया और ये साबित करने की कोशिश नहीं की कि असद धर्मनिरपेक्ष हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये बड़ी अजीब और हास्यास्पद बात है कि पहले सोची समझी साज़िश के तहत किसी शख़्स को कठघरे में खड़ा करो, उसकी तमाम अच्छाइयों को नज़रअंदाज करते हुए उसकी बेइज्जती का तमाशा देखो. उसके बाद उसी बहाने उन तमाम लोगों को कठघरे में खड़ा करने लगो जो आपकी इस घटिया सोच और साज़िश से इत्तेफ़ाक नहीं रखते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां ये दलील भी दी जा रही है कि मंशा एक सार्थक बहस की थी। बहस किससे और क्यों? बहस का भी एक तकाजा होता है। उसके कुछ कायदे होते हैं. बहस तभी होनी चाहिये जब जरूरत हो. यहां असद ज़ैदी को बज़ार में खड़ा करने की कोई जरूरत नहीं थी. ये किसी को हक़ नहीं था कि वो उन्हें तनाशाही फरमान सुनाने वालों के बीच खड़ा कर उनकी भद्द पिटने का तमाशा देखते रहें. जिन्होंने भी ऐसा किया उनकी नीयत पर सवाल उठने लाजिमी हैं. अगर सवाल उठ रहे हैं तो वो उन सवालों का जवाब दें. इसे बाकी भले लोगों पर थोप कर सवालों से बचने की कोशिश न करें. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां एक बात और। बहस वहीं हो सकती है जहां उसकी गुंजाइश हो और सार्थक नतीजे निकलने की उम्मीद. आप बहस उसी से कर सकते हैं जो मर्यादित ढंग से बहस करने में यकीन रखता हो. जिसका इस अवधारणा में यकीन नहीं उसे बहस का न्योता देना कीचड़ में धंसने की तरह है. वहां आप तो गंदे हो जाएंगे, लेकिन उस शख़्स की सेहत पर फर्क नहीं पड़ेगा. ऐसे लोगों के सबसे सटीक उदाहरण नरेंद्र मोदी और ओसामा बिन लादेन हैं. आपने इन्हें हज़ारों की भीड़ में ज़हर उगलते देखा होगा. आपने इन्हें टीवी चैनलों पर लोगों को भड़काते सुना होगा. लेकिन क्या आपने मोदी और लादेन को कभी किसी खुली बहस में हिस्सा लेते देखा है? हो सकता है कि अविनाश और उनके साथियों ने ऐसा देखा हो, लेकिन मैंने तो नहीं देखा।  इसलिए मेरा मानना है कि असद ज़ैदी को बाज़ार में खड़ा कर उनका मजाक उड़ाया गया है, उनका तमाशा बनाया गया है. इस अपराध के लिए मोहल्ले को असद ज़ैदी से माफी तो मांगनी ही चाहिये।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-8060653577986033470?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/8060653577986033470/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=8060653577986033470' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/8060653577986033470'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/8060653577986033470'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/07/blog-post_15.html' title='मैं असद ज़ैदी का गुनहगार नहीं'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-6553122269151329398</id><published>2008-07-12T11:35:00.005+05:30</published><updated>2008-12-09T23:56:16.285+05:30</updated><title type='text'>जैसा घिनौना समाज, वैसी घिनौनी मीडिया</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SHhLybmUDjI/AAAAAAAAAOE/-5R7sr-BhkI/s1600-h/arushi.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5222007097710087730" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SHhLybmUDjI/AAAAAAAAAOE/-5R7sr-BhkI/s400/arushi.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;आरुषि&lt;/span&gt; हत्याकांड का सच सामने आ गया. गुत्थी सुलझ गई. डॉक्टर तलवार बेकसूर घोषित कर दिये गए. बिना सबूत फ़ैसला सुना दिया गया. हर तरफ सीबीआई की वाहवाही होने लगी. सबने मान लिया कि करीब दो महीने तक चले घिनौने नाटक से पर्दा गिर गया. हर चैनल अपने अपने हिसाब से दावा करने लगा कि उसने तो क़ातिलों को बेनकाब काफी पहले कर दिया था. जिस सच को सीबीआई ने इतने दिन बाद जाहिर किया वो सच तो पहले ही बता दिया था. लेकिन यहां भी सब वही ग़लती कर रहे हैं. सीबीआई के सच को अंतिम सच मान बैठे हैं. ये भूल गए हैं कि सच तो उत्तर प्रदेश पुलिस ने भी बताया था. उसकी थ्योरी अब पलट चुकी है और उसका सच झूठा निकला. ऐसे में क्या गारंटी है कि सीबीआई का खुलासा अंतिम सत्य हो? सबको मालूम है कि पीड़ितों को इंसाफ़ दिलाने में सीबीआई का ट्रैक रिकॉर्ड भी काफी बुरा है, फिर इस पर आंख मूंद कर यकीन की वजह क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां नैतिकता का हवाला भी दिया जा रहा है. टीवी चैनलों को गालियां दी जा रही हैं. अख़बार से लेकर समाज का हर तबका लानत-मलानत करने में जुटा है. कोई मुकदमा करने की धमकी दे रहा है तो कोई दावा कर रहा है कि अब वो न्यूज चैनल ही नहीं देखेगा. यहां सब भूल जाते हैं कि इन्हीं चैनलों ने सवाल उठाए तो जांच उत्तर प्रदेश की पुलिस से छीन कर सीबीआई को दी गई. वरना तो उत्तर प्रदेश पुलिस ने पहले ही दिन केस सुलझा दिया था. हेमराज को कातिल ठहरा दिया था. यही नहीं आज आरुषि का बाप जेल से बाहर निकला है तो उसकी रिहाई में उन चैनलों का हिस्सा है. लोग सीबीआई के जिस आधे-अधूरे सच को सही मान बैठे हैं उसमें भी चैनलों का योगदान है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां यह भी ध्यान रखने की बात है कि नैतिकता हमेशा सापेक्ष होती है. आप और हम एकदम उलट होते हुए भी अपनी-अपनी जगह नैतिक हो सकते हैं. कल जो मीडिया आरुषि के घरवालों के अनैतिक था, वो कृष्णा, विजय और राजकुमार समेत बहुतों के लिए नैतिक था। आज जो मीडिया आरुषि के घरवालों के लिए नैतिक है वो आरुषि के तथाकथित नए क़ातिलों कृष्णा, विजय मंडल और राजकुमार के घरवालों के लिए अनैतिक हो सकता है. इसलिए यहां ये बहस भी ख़त्म नहीं हुई है कि नैतिक कौन है और अनैतिक कौन? ये बहस जारी है और आगे भी जारी रहेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बात और ये भी नैतिकता से जुड़ी हुई. कहते हैं मीडिया समाज का आईना है. वो समाज को उसका चेहरा दिखाता है. सच भी यही है आज मीडिया के जिस चेहरे पर आपको घिन आ रही है, जिस चेहरे से आपको नफरत हो रही है, जिस चेहरे को आप कोस रहे हैं, समाज का चेहरा भी उतना ही घिनौना है. हमारा समाज भी उतना ही अनैतिक है. चाहे वो नैतिकता की दुहाई दे रहे आरुषि के मां-बाप हो या फिर हम और आप. जरा सोचिये बेटी को जो मां-बाप नौकर के भरोसे छोड़ जाते थे, उन्हें नैतिकता की दुहाई देने का कितना हक है? जिस मां-बाप के होते हुए चार शख़्स फ्लैट में घुसते हैं ... इस हद तक शराब पीते हैं कुछ होश ना रहे ... फिर बच्ची के कमरे में घुसते हैं... उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश करते हैं... विरोध करने पर उसके सिर पर चोट कर उसे बेहोश करते हैं... फिर वही चारों छत पर जाते हैं... वहां उनका झगड़ा होता है ... उनमें से तीन मिल कर चौथे का क़त्ल करते हैं ... और दोबारा फ्लैट में दाखिल हो कर बेहोश पड़ी बच्ची का भी खून करते हैं ... भारी नशे की हालत में होते हुए भी सारे सबूत मिटाते हैं और वापस चले जाते हैं ... अगली सुबह तक मां-बाप को इसकी भनक तक नहीं लगती ... वो मां-बाप कितने नैतिक रहे होंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए मीडिया को एकतरफा गाली देने से पहले समाज के घिनौने चेहरे को भी देखियेगा ... ज्यादा नैतिकता का ढोल पीटने से पहले ये भी जरूर सोचियेगा कि कहीं इस चक्कर में आप भी तो अनैतिक तो नहीं हो रहे?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-6553122269151329398?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/6553122269151329398/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=6553122269151329398' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/6553122269151329398'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/6553122269151329398'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/07/blog-post_12.html' title='जैसा घिनौना समाज, वैसी घिनौनी मीडिया'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SHhLybmUDjI/AAAAAAAAAOE/-5R7sr-BhkI/s72-c/arushi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-1280268201660382154</id><published>2008-07-10T11:25:00.002+05:30</published><updated>2008-07-10T11:30:11.054+05:30</updated><title type='text'>ये सरकार नहीं गई तो देश जाएगा</title><content type='html'>एक &lt;a href="http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047"&gt;हिंदुस्तानी&lt;/a&gt; ने अपनी डायरी में लिखा है कि &lt;a href="http://diaryofanindian.blogspot.com/2008/07/blog-post_09.html"&gt;यूपीए सरकार को सांसत से बचाएगा लेफ्ट?&lt;/a&gt; अगर ऐसा हुआ तो ये देश के लिए सबसे बड़े दुर्भाग्य की बात होगी और इस दुर्भाग्य के लिए खुद लेफ्ट जिम्मेदार होगा. इस समय सियासी माहौल काफी ख़तरनाक मोड़ पर है. मनमोहन सरकार ने ऐटमी करार के नाम पर एक बड़ा सौदा किया है और वो इस सौदे को अंजाम तक पहुंचाने के लिए हर ग़लत हथकंडे अपना रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के तौर पर दो दिन पहले विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने बयान दिया कि बिना विश्वासमत हासिल किए सरकार आईएईए में नहीं जाएगी. कायदे से होना भी यही चाहिये. लेफ्ट के समर्थन वापस लेने के बाद यूपीए सरकार अल्पमत में है. उसके बाद २७२ का जादुई आंकड़ा नहीं है. समाजवादी पार्टी के समर्थन के बावजूद ये आंकड़ा २७० तक ही पहुंचता है. ऐसे में नैतिकता का तकाजा यही कहता है कि मनमोहन सरकार पहले संसद का विश्वास हासिल करे और फिर करार पर आगे बढ़े. लेकिन ऐसा करने से पहले कल सरकार ने आईएईए से मसौदे को बोर्ड के सदस्यों के बीच बांटने का अनुरोध किया. भारत सरकार के अनुरोध के बाद वो मसौदा बोर्ड के ३५ सदस्य देशों को बांट दिया गया. ये वही मसौदा है जिसे मनमोहन सिंह ने देशहित में बता कर और गोपनियता का हवाला देकर लेफ्ट को दिखाने से मना कर दिया था. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इस करार पर अमल के लिए सरकार किस तरह जिद पर उतर आई है और उसकी ये जिद संदेह पैदा करती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा भी कई ऐसे कारण हैं जिन्हें ध्यान में रखते हुए इस सरकार का जाना ज़रूरी है. लेफ़्ट के समर्थन खींचने के बाद बाज़ार का व्यवहार काफी संदेहास्पद है. शेयर बाज़ार हर रोज छलांग पर छलांग लगा रहा है. आखिर इसका मतलब क्या है? दरअसल ये संकेत है कि अब सुधार के नाम पर सरकारी कंपनियां बेची जाएंगी... अब तक मुकेश अंबानी चांदी काट रहे थे अब अनिल अंबानी भी चांदी काटेंगे... नए-नए सेज के रास्ते खुलेंगे... किसानों को उनकी ज़मीन से बेदखल किया जाएगा... किसानों को दी जाने वाली सांकेतिक सब्सिडी ख़त्म होगी... विकास के नाम पर रेवड़ियां बांटी जाएंगी... कुल मिला कर कहें तो सारे सफेदपोश लुटेरे मिल कर अगले छह महीने में देश में जो कुछ भी बचा है उसे बेचने की तैयारी कर रहे हैं और सरकार बची तो वो इस पर अमल भी करेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए इस सरकार का जाना बहुत ज़रूरी है. सरकार के गिरने से एक साथ कई नापाक मंसूबों पर पानी फिरेगा. सरकार के गिरने से देश की सत्ता के शीर्ष पर बैठे अमेरिकी एजेंट मनमोहन और कांग्रेस की मुखिया सोनिया गांधी को सबक मिलेगा. सबक कि देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था संसद को धोखे में रख कर कोई भी ऐसा करार नहीं करना चाहिये जिससे देश की दिशा बदल सकती हो. देशहित से जुड़े अहम फैसले आम राय से लिये जाते हैं .. एकतरफा नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार के गिरने से एक और फायदा होगा। भारत से लेकर अमेरिका तक के दलालों को झटका लगेगा. खासकर अमर सिंह जैसे लोगों को. अमर सिंह ऐसा शख्स है जिसने उत्तर प्रदेश को गर्त में ढकेल दिया. हजारों हेक्टयर जमीन बिल्डरों के हाथ बिकवा दी. रोजगार के नए अवसर नहीं पनपने दिये. सियासत के नाम पर बॉलीवुड से भांटों को लखनऊ बुला कर सुब्रत राय के दरबार में मुजरा कराया है. अमिताभ बच्चन को लटकन बना कर कभी काशी तो कभी विंध्याचल घुमाया है. ऐसे दलालों के मंसूबों पर पानी फिरना बेहद जरूरी है. ऐसा नहीं हुआ तो उनके हौसले और बुलंद होंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार के गिरने से तीसरा सबक कारोबारियों को मिलेगा. उन्हें अहसास होगा कि देश में अब भी कुछ ऐसा है जो वो मैनेज नहीं कर सकते. इससे संसद की थोड़ी लाज बची रहेगी और लोकतंत्र की भी. वरना तो गुलाम मानसिकता के मनमोहन और उनके चेले पूरी नंगई पर उतर आए हैं और इस नंगई के लिए भी काफी हद तक लेफ्ट फ्रंट ही जिम्मेदार है. उसने शुरू से जरा सख्ती से चाबी भरी होती तो ऐसे दिन नहीं देखने पड़ते. वैसे भी पुरानी कहावत है बिल्ली पहली ही रात को मारी जाती है, बाद में नहीं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-1280268201660382154?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/1280268201660382154/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=1280268201660382154' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/1280268201660382154'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/1280268201660382154'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/07/blog-post_10.html' title='ये सरकार नहीं गई तो देश जाएगा'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-8942740964162959403</id><published>2008-07-08T09:50:00.005+05:30</published><updated>2008-12-09T23:56:16.304+05:30</updated><title type='text'>चले गए गुलाम, सादिक को सलाम</title><content type='html'>गुलाम नबी आज़ाद की विदाई हो ही गई. अमरनाथ श्राइन बोर्ड से ज़मीन वापस लेने के फ़ैसले के बाद भी उनकी सरकार को जीवन दान नहीं मिला. उनका ये दांव भी सहयोगी पीडीपी &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SHLstCNcFaI/AAAAAAAAAN0/chVOsA_JoCo/s1600-h/fire.bmp"&gt;&lt;/a&gt;को रिझा नहीं सका और ना ही विरोधियों की दिल पसीजा. मजबूरन इस्तीफ़ा देना पड़ा. लेकिन इस्तीफ़ा देते वक़्त भी गुलाम ने ढोंग का दामन नहीं छोड़ा. वो कहते रहे कि दूसरी पार्टियों में मौजूद दोस्तों को मुसीबत में नहीं डालना चाहते थे, इसलिए पद त्याग रहे हैं. सच में सियासतदान बड़े ढोंगी होते हैं, उनमें भी गुलाम नबी आज़ाद कई हाथ आगे निकले. आदर्श और नैतिकता की दुहाई देते वक़्त उन्हें अपने काले कारनामे का जरा भी ख़याल नहीं आया. वो कारनामा जो लंबे समय तक देश की लोकतांत्रिक सियासत में एक काले अध्याय के तौर पर याद किया जाएगा. राज्य की सत्ता के शीर्ष पर रहते हुए उन्होंने तो पूरी व्यवस्था को ही सांप्रदायिक रंग में रंग दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सांप्रदायिकता हर स्तर पर घातक होती है. चाहे वह किसी व्यक्ति में हो, किसी समुदाय में हो, किसी सामाजिक संस्था में हो या फिर किसी सियासी दल में. लेकिन सबसे ज़्यादा खतरनाक किसी संवैधानिक संस्था का सांप्रदायिक होना है ... किसी सरकार का सांप्रदायिक होना है. जब सरकारें किसी धर्म विशेष के हितों को ध्यान में रख कर काम करने लगती हैं तो प्रशासन भी उसी आधार पर काम करता है और जब प्रशासन सांप्रदायिक होता है तो अल्पसंख्यकों की जान ख़तरे में रहती है. वो घुट-घुट कर जीते हैं. जम्मू कश्मीर के हुक्मरानों पर हमेशा वहां के मुसलमानों के हितों को पोषित करने का आरोप लगता रहा है. इस्लामिक कट्टरपंथियों के ख़िलाफ़ उनके ढुलमुल रवैये के कारण ही हिंदुओं को बड़े पैमाने पर पलायन करना पड़ा. हुर्रियत कांफ्रेंस और पीडीपी से इससे अधिक की उम्मीद नहीं की जा सकती. लेकिन इस बार झटका राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस ने दिया है. वो पार्टी जिसकी मूल अवधारणा ही धर्मनिरपेक्षता रही है. गुलाम नबी आजाद ने अमरनाथ श्राइन बोर्ड से ज़मीन वापस लेकर ये साबित किया है कि जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस हो या फिर कोई और वहां की सत्ता सांप्रदायिक है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्ता के सांप्रदायिक होने के मुद्दे पर चर्चा करते हुए कुछ लोग ये दलील दे रहे हैं कि अगर जम्मू कश्मीर सरकार ये फ़ैसला वापस नहीं लेती तो बहुत ख़ून बहता. उन लोगों का ये तर्क भी बहुत सतही लगता है. ऐसा कहते वक़्त वो भूल जाते हैं कि धर्मनिरपेक्षता को कायम रखने के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है. बहुसंख्यकों की तानाशाही प्रवृति का दमन करना पड़ता है. इसके लिए सत्ता के शीर्ष पर बैठे हुक्मरानों को कभी कभी क्रूर होना पड़ता है. अगर आज़ादी के वक़्त हमारी सरकार सस्ते राह पर चलती और नेहरू हिंदू कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक देते तो क्या भारत के मुसलमान कभी चैन से जी पाते? विभाजन के वक़्त जब दिल्ली से लेकर बंगाल तक चारों तरफ मार-काट मची थी तो गांधी, नेहरू और पटेल ने घूम-घूम कर लोगों को हथियार डालने के मजबूर किया. गांधी कई-कई दिन तक अनशन पर बैठे रहे. आज उन लोगों के त्याग से कायम हुई धर्मनिरपेक्षता ख़तरे में है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोचिये आज़ाद भारत के सभी सूबे के हुक्मरान वहां के बहुसंख्यकों के हिसाब से काम करने लगें तो क्या अल्पसंख्यक ख़ौफ़ के साये में जीने को मजबूर नहीं होंगे? या फिर वो पलायन नहीं करेंगे? जम्मू कश्मीर में यही हुआ है और कांग्रेस से लेकर सभी सियासी दल इस साज़िश में भागीदार रहे हैं. गुलाम नबी आज़ाद ने इसी भागीदारी को जाहिर किया है. ये भारत की धर्मनिरपेक्ष अवधारणा को करारा झटका है और इस गुनाह के लिए कांग्रेस और उसके गुलाम को वक़्त कभी माफ़ नहीं करेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;((आखिर में एक और बात. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना कल्बे सादिक ने गुलाम नबी आज़ाद के फ़ैसले का विरोध किया है. उनका कहना है कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी ज़मीन वापस नहीं ली जानी चाहिये थी. कल्बे सादिक के मुताबिक ये हमारी परंपरा और सभ्यता दोनों के हिसाब से ग़लत फ़ैसला है. कल्बे सादिक ने ऐसा कह बड़ी हिम्मत का परिचय दिया है. मैं उनके इस हौसले को सलाम करता हूं.))&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-8942740964162959403?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/8942740964162959403/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=8942740964162959403' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/8942740964162959403'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/8942740964162959403'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/07/blog-post_08.html' title='चले गए गुलाम, सादिक को सलाम'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-6863246640414413573</id><published>2008-07-06T11:12:00.005+05:30</published><updated>2008-12-09T23:56:16.522+05:30</updated><title type='text'>भारत फिर क्यों ना बने हिंदू राष्ट्र?</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SHBdTc1oc9I/AAAAAAAAANg/kLjmDDSkazI/s1600-h/j&amp;amp;k+vilence+2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5219774556862444498" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SHBdTc1oc9I/AAAAAAAAANg/kLjmDDSkazI/s400/j%26k+vilence+2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;इंदौर में हिंसा के लिए आखिर जिम्मेदार कौन हैं? क्या सिर्फ बीजेपी या धर्म के नाम पर ख़ूनी सियासत करने वाले उसके जैसे तमाम दल? या फिर हमारा समाज जिसमें धर्म की बात उठते ही सोचने समझने की ताक़त ख़त्म हो जाती है? या फिर कोई और भी तबका इसके लिए जिम्मेदार है? पिछले दो तीन दिन से मैं अख़बार पर अख़बार पलट रहा था इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए। अभी तक मैं किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका हूं, लेकिन कुछ सवाल जरूर कौंध रहे हैं कि आखिर अमरनाथ श्राइन बोर्ड से ज़मीन वापस लिये जाने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ मुस्लिम समुदाय से विरोध के तीखे स्वर क्यों नहीं उठे? आखिर क्यों मुस्लिम बुद्धिजीवी फिर ख़ामोश रह गए? क्या वो इसके गंभीर नतीजों से वाकिफ नहीं थे? या फिर वो फ़ैसले पर जश्न मना रहे थे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सोचने लायक बात है। जब किसी भी लोकतांत्रिक देश में किसी राज्य के शासक धर्म विशेष के हितों और मर्जी को ध्यान में रख कर फ़ैसले लेंगे तो फिर धर्मनिरपेक्षता का पाखंड किस लिए? पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती समेत जम्मू कश्मीर के तमाम कठमुल्लों की इस ओछी सियासत के आगे गुलाम सरकार के घुटने टेकने से धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को झटका लगा है। इस पर मुस्लिम बुद्धिजीवियों की ख़ामोशी और परेशान करने वाली है। अगर वो इसी तरह ख़ामोश तमाशा देखते रहे तो नफ़रत की सियासत में माहिर बीजेपी को मौका मिलेगा ही। फिर उसे दोष क्यों देना? वो तो जिस राजनीति में माहिर है और जिसके लिए बदनाम है वही कर रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब जानते हैं कि जम्मू-कश्मीर में मुसलमान बहुसंख्यक हैं और हिंदू अल्पसंख्यक। ऐसे में अमरनाथ श्राइन बोर्ड से ज़मीन वापस लेने के फैसले को सीधे तौर पर माना जा सकता है कि बहुसंख्यक के दबाव में अल्पसंख्यकों के हितों की अनदेखी की गई है। उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाई गई है। फिर क्या ग़लत है अगर गुजरात में नरेंद्र मोदी बहुसंख्यक हिंदू के हितों को ध्यान में रख कर फ़ैसले लेते हैं? फिर क्या ग़लत होगा अगर इस देश के बहुसंख्यक हिंदुओं की आस्था को ध्यान में रख कर अयोध्या में राम मंदिर बनवा दिया जाए? अगर बहुसंख्यकों की इच्छा और हित ही किसी राज्य और राष्ट्र के लिए सर्वोपरी हैं तो फिर क्यों ना भारत को हिंदू राष्ट्र बना दिया जाए?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-6863246640414413573?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/6863246640414413573/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=6863246640414413573' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/6863246640414413573'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/6863246640414413573'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/07/blog-post_06.html' title='भारत फिर क्यों ना बने हिंदू राष्ट्र?'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SHBdTc1oc9I/AAAAAAAAANg/kLjmDDSkazI/s72-c/j%26k+vilence+2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-5208215832849527362</id><published>2008-07-05T18:29:00.003+05:30</published><updated>2008-12-09T23:56:16.788+05:30</updated><title type='text'>जिसका डर था वही हुआ</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जिसका डर था वही हुआ। अमरनाथ के नाम पर नफ़रत का खेल शुरू हो गया। शुरुआत &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SG9xQflKXUI/AAAAAAAAANY/SCNwYjgzQv4/s1600-h/fire.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5219515021314907458" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SG9xQflKXUI/AAAAAAAAANY/SCNwYjgzQv4/s400/fire.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;श्रीनगर से हुई और अब पूरे देश में हिंसा फैल रही है। फिलहाल सबसे ज़्यादा असर मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ है। वहां छह लोगों की मौत हो चुकी है और दो दिन से कर्फ़्यू जारी है। हिंसा मध्य प्रदेश के कुछ अन्य शहरों में भी हुई है और देश के कुछ अन्य राज्यों में भी। इस हिंसा के लिए दो सियासी दल जिम्मेदार हैं। कांग्रेस और बीजेपी। जम्मू कश्मीर के कांग्रेसी मुख्यमंत्री गुलाम नबी आज़ाद के ग़लत फ़ैसले के कारण तनाव फैला और बीजेपी जैसी घोर सांप्रदायिक पार्टी को घटिया और घिनौनी सियासत का मौका मिला। ये दोनों ही पार्टियां सीधे तौर पर लोगों की मौत के लिए और सरकारी संपत्ति के नुकसान के लिए जिम्मेदार हैं। इन दोनों ही पार्टियों के ख़िलाफ़ राष्ट्रद्रोह और क़त्ल का मुक़दमा चलाना &lt;span class=""&gt;चाहिये।&lt;/span&gt; जब तक ऐसे मामलों में सियासी दलों और नेताओं के ख़िलाफ़ सामूहिक क़त्ल और देशद्रोह का मुक़दमा दायर नहीं होगा... भावनाओं को भड़का कर अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की प्रवृति बनी रहेगी।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-5208215832849527362?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/5208215832849527362/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=5208215832849527362' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/5208215832849527362'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/5208215832849527362'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/07/blog-post_05.html' title='जिसका डर था वही हुआ'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/SG9xQflKXUI/AAAAAAAAANY/SCNwYjgzQv4/s72-c/fire.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-8776248265713407823</id><published>2008-07-01T19:53:00.001+05:30</published><updated>2008-07-01T19:53:47.239+05:30</updated><title type='text'>ये गुलाम तो मूर्ख निकला</title><content type='html'>सियासत में मूर्खों की कमी नहीं है और सत्ता में ताकतवर ओहदों पर बैठे ये मूर्ख बहुत घातक होते हैं। ऐसे ही एक मूर्ख हैं गुलाम नबी आजाद। बेहद संवेदनशील राज्य जम्मू कश्मीर में उनकी सरकार ने कुछ दिन पहले अमरनाथ श्राइन बोर्ड को १०० एकड़ जमीन देने का संवेदनशील फैसला लिया। इस फैसले के तुरंत बाद हंगामा शुरू हो गया। पूरे राज्य में हिंसा भड़क उठी। श्रीनगर सुलगने लगा। एक हफ्ते तक चली हिंसा में चार लोग मारे गए, सैकड़ों घायल हुए। पीडीपी ने सियासी दांव फेंका कहा फैसला वापस नहीं लिया गया तो वो सरकार से समर्थन वापस ले लेगी। आखिर गुलाम को भी झुकना पड़ा और उन्होंने अपना फैसला वापस ले लिया। अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन अब पर्यटन विभाग के नाम होगी। श्रद्धालुओं को सुविधा मुहैया कराने का जिम्मा सरकार संभालेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली नज़र में लगता है कि बात जहां से शुरू हुई थी अब वहीं पहुंच चुकी है। जम्मू कश्मीर में आया उबाल थम जाएगा। हिंसा का दौर खत्म हो जाएगा। सबकुछ पहले जैसा होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। गुलाम सरकार के उस फैसले ने काफी कुछ बदल दिया है। इसने पहले से ही जूझ रही कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं ... धर्मनिरपेक्ष ताकतों को कमजोर कर दिया है और बीजेपी को बैठे बिठाए एक बड़ा मुद्दा दे दिया है। ऐसा मुद्दा जिस पर वो नफ़रत की सियासत को विस्तार दे सकेगी। यकीन मानिये उसके नेता इस ओछी सियासत में माहिर हैं। एक बार फिर उन्होंने इसकी तैयारी शुरू कर दी है और जम्मू कश्मीर के बाद अब पूरे देश को मूर्ख गुलाम के फैसले के दंश भोगने के लिए तैयार रहना चाहिये।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-8776248265713407823?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/8776248265713407823/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=8776248265713407823' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/8776248265713407823'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/8776248265713407823'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='ये गुलाम तो मूर्ख निकला'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-1584713493684846200</id><published>2008-06-22T17:41:00.001+05:30</published><updated>2008-06-22T17:43:29.577+05:30</updated><title type='text'>ये बरसात भी यूं ही खर्च हो गई!</title><content type='html'>&lt;p&gt;ये बरसात भी यूं ही निकल जाएगी। इस बरसात भी गांव जाना नहीं हो सकेगा। मन तो काफी चाहता है लेकिन गांव जाने की भूमिका तैयार नहीं हो रही। मतलब इस बरसात भी मैं झिझरी नहीं खेल सकूंगा। गांव से सटी मगई नदी के किनारे नहीं बैठ सकूंगा। बारिश में कुछ चिकनी और मुलायम हुई परती की रेत पर चीका नहीं खेल सकूंगा। वो रेत जो कूदने पर भुरभुरा जाती, बिखर जाती मगर हमें चोट नहीं लगने देती। ये बरसात भी बीते कई साल की तरह यादों के सहारे काटनी होंगी। रोजी रोटी के नाम पर इस बरसात को भी खर्च करना होगा। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;शेष यहां&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt; पढ़ें...&lt;/span&gt; &lt;a href="http://dreamndesire.blogspot.com/2008/06/blog-post_22.html"&gt;http://dreamndesire.blogspot.com/2008/06/blog-post_22.html&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-1584713493684846200?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/1584713493684846200/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=1584713493684846200' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/1584713493684846200'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/1584713493684846200'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/06/blog-post_22.html' title='ये बरसात भी यूं ही खर्च हो गई!'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-8984089328399924569</id><published>2008-06-21T01:15:00.006+05:30</published><updated>2008-06-21T01:30:32.575+05:30</updated><title type='text'>उच्च वर्ग का औजार है मीडिया</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://chaukhamba.blogspot.com/2008/06/blog-post_18.html"&gt;अच्छा हुआ मैं एसपी सिंह से नहीं मिला&lt;/a&gt;&lt;a href="http://chaukhamba.blogspot.com/2008/06/blog-post_21.html"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;से आगे.... &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;दो दिन पहले ख़बर आई। आधी रात को लखनऊ में सहारा सिटी में मायावती सरकार ने बुलडोज़र चला दिया। इमारतें तोड़ दी गईं। दीवार ढहा दी गई। ख़बर बड़ी थी और तेजी से फैली भी। लेकिन सिर्फ एनडीटीवी और ऐसे ही एक दो संस्थानों ने इस ख़बर को दिखाने का साहस किया। सच और झूठ को सामने रखने का हौसला दिखाया। इन्हें छोड़े दें तो ज्यादातर जगहों से ख़बर गायब कर दी गई। किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो ख़बर को प्रसारित या प्रकाशित करता। आखिर क्यों? ये सवाल बड़ा है और इससे मीडिया की चाल-चलन का अंदाजा लगाया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने अब तक के अपने सफ़र में बहुत कुछ देखा, सुना और भोगा है। उस आधार पर मैं ये बड़ी आसानी से कह सकता हूं कि बड़े पैमाने पर मीडिया सत्ता का एक औजार भर है। वरना सहारा जैसी कंपनी जो गरीब लोगों का पैसा डकार रही हो, गलत तरीकों से संपत्ति जमा कर रही हो। उस पर हुई कार्रवाई को ना दिखाने की कोई वजह नहीं। हालांकि अभी ये मसला कोर्ट में है। लखनऊ विकास प्राधिकरण या यूं कहें कि मायावती सरकार का बुलडोज़र चलाने का फ़ैसला कितना सही और ग़लत है ये पता चलना बाकी है। फिर भी प्रशासनिक कार्रवाई तो हुई ही थी और उसे नहीं दिखाना बहुत कुछ बयां कर जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पूरे वाकये से मुझे रूस की एक कहानी याद आ गई। मैंने बचपन में ये कहानी पढ़ी थी। जार के शासन काल से जुड़ी कहानी। जार ने वहां अखबार शुरू किया था। तब पूरे रूस से सैकड़ों खबरें आतीं, लेकिन उन ख़बरों को लेकर जार का अपना नज़रिया था। जार का साफ कहना था कि देश में तरक्की की ख़बरें प्रकाशित करो। कोई भी बुरी ख़बर नहीं। हत्या, खुदकुशी, बलात्कार, भ्रष्टाचार जैसी बुरी ख़बरों से समाज में गलत संदेश जाता है। बुराई फैलती है। इसलिए हमेशा वही खबरें दो जिनसे आक्रोश बढ़े नहीं बल्कि कम हो। जार के वो अख़बार और आज के मीडिया का चरित्र एक सा ही है। जार शाही में भी सत्ता पर काबिज लोगों के खिलाफ कुछ नहीं छपता था और आज के लोकतंत्र में भी बहुत कुछ नहीं छपता है। ऐसा इसलिए कि समय के साथ सत्ता बदली है, व्यवस्था का रूप बदला है, शासकों के चेहरे बदले हैं। अगर कुछ नहीं बदला है तो वह शासकों का चरित्र और इसकी अपनी ठोस वजह है। सत्ता की बागडोर हमेशा उच्च वर्ग के हाथ में रही है और शासन करने में मध्य वर्ग के प्रभावशाली लोगों ने उसका हमेशा साथ दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उच्च वर्ग की साज़िशों में साथ देने वाले मध्य वर्ग में दो तरह के लोग हैं। एक बेहद महात्वाकांक्षी लोग जो हर कीमत पर उच्च वर्ग में शामिल होना चाहता हैं। ऐसे लोग आगे बढ़ने के लिए भौतिक सुखों को इकट्ठा करने के लिए हर साजिश में शामिल हो सकते हैं। वो खुद को उच्च वर्ग के सबसे बड़े हितैषी के रूप में पेश करते हैं और अपने मकसद के लिए उससे भी कहीं अधिक क्रूर हो सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्य वर्ग में दूसरा तबका है ऐसे लोगों का है जो मजबूर हैं। ये लोग अपने घरवालों से बहुत प्यार करते हैं। उन्हें मझधार में छोड़ कर समाज को बदलने की जद्दोजेहद में शामिल होने का साहस नहीं जुटा पाते। इनकी स्थिति पेड़ से कटे उस साख की तरह है जो अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करता है। अपनी मिट्टी और देस से उखड़े हुए उस पौधे की तरह है जो परायी जमीन में जड़े जमाने की कोशिश में है। आज की बाज़ारवादी व्यवस्था में नौकरी करना इस तबके की मजबूरी है। उसकी इसी मजबूरी का फायदा उच्च वर्ग उठाता है। मध्य वर्ग के इस तबके में मैं भी शामिल हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां मैं साफ कर दूं कि उच्च वर्ग में शामिल नहीं होना मेरा मकसद नहीं है। फिर भी मेरी नियति यही है कि मैं उच्च वर्ग के हितों को पोषित करूं। आप मेरी इस नियति पर हंस सकते हैं। मेरा मजाक उड़ा सकते हैं। मुझे गाली दे सकते हैं। लेकिन यकीन मानिये समाज और वतन से जुड़ी तमाम संवेदनाओं के बावजूद मेरे पास कोई और विकल्प नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीडिया में पहला कदम रखते वक्त मेरे जैसे लोगों की संख्या ज़्यादा रहती है। ये लोग समाज को बदलने का सपना लिये इस पेशे में आते हैं। इन लोगों के जेहन में न्याय की अवधारणा काफी मजबूत रहती है और ये लोग ज़्यादती के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना चाहते हैं। लेकिन आगे बढ़ने पर दूसरा तबका हावी होने लगता है। ऐसा इसलिए कि शासकों का जाल बहुत घना और मायावी है। इसमें अगर आप धीमे पड़े तो हाशिये पर ढकेल दिये जाएंगे। रोज़ी-रोटी का इंतजाम मुश्किल हो जाएगा। तेज दौड़े तो प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी.. प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी तो धीरे धीरे आपका चरित्र भी मध्य वर्ग के महात्वाकांक्षी तबके जैसा हो जाएगा। आप भी उसी तरह क्रूर हो जाएंगे। मैं चरित्र के इस बदलाव को महसूस कर सकता हूं... शायद इसलिए हर वक़्त खुद को इससे दूर रखने की कोशिश करता हूं। लेकिन ये भी अहसास है कि वो घड़ी नज़दीक आ रही है जब या तो मैं हाशिये पर ढकेल दिया जाऊंगा ... या फिर मुझे भी क्रूर होना पड़ेगा। यहां बीच का रास्ता नहीं है ... कहीं और हो तो हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आप मीडिया के चरित्र का अंदाजा लगा सकते हैं। मीडिया जिस पर कब्जा उच्च वर्ग है और जिसे चलता मध्य वर्ग है। अब सवाल उठता है कि क्या ये मीडिया सत्ता के ख़िलाफ़ और जन साधारण के साथ खड़े होने का साहस दिखा सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;((जारी है... ))&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-8984089328399924569?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/8984089328399924569/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=8984089328399924569' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/8984089328399924569'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/8984089328399924569'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/06/blog-post_21.html' title='उच्च वर्ग का औजार है मीडिया'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-7488828197528782900</id><published>2008-06-18T18:23:00.003+05:30</published><updated>2008-06-18T21:24:38.099+05:30</updated><title type='text'>अच्छा हुआ मैं एसपी सिंह से नहीं मिला</title><content type='html'>फिर वही जून। फिर वही एसपी सिंह और फिर वही रोना धोना। एसपी होते तो ऐसा होता, एसपी होते तो वैसा होता। कुछ का दावा तो यहां तक कि एसपी होते तो टीवी पत्रकारिता का रूप ही कुछ और होता। इस रोने-धोने और एसपी के बहाने मीडिया को गरियाने में वही सबसे आगे हैं जो खुद मीडिया में ताकतवर ओहदों पर बैठे हैं। ये भी मीडिया के उसी जाने-पहचाने सिद्धांत को ज़ाहिर करता है कि ख़बरें उन्हीं की जो ख़बरों में बने हुए हैं। एसपी के जिन साथियों की टीआरपी गिर गई, जो वक़्त के साथ ताल से ताल नहीं मिला सके... हाथिये पर ढकेल दिये गए उनके लेख कम छपते हैं। उनकी बातें कभी कभार ही सुनाई देती हैं। ये अजीब त्रासदी है और उम्मीद की किरण बहुत धुंधली है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नब्बे के दशक के बाद से टीवी मीडिया को एसपी के साथियों ने ही दिशा दी है। आज इस मीडिया का विभत्स चेहरा उन्हीं लोगों का बनाया हुआ है। वो आज भी कई चैनलों के कर्ताधर्ता हैं। लेकिन उनमें से ज़्यादातर में ऐसा हौसला नहीं कि ख़बरों का खोया सम्मान वापस लौटा सके। वो कभी मल्लिका सेहरावत तो कभी राखी सावंत के बहाने जिस्म की नुमाइश में लगे हैं। अपराध को मसाला बना कर परोस रहे हैं। कभी जासूस बन कर इंचीटेप से क़ातिल के कदम नापने लगते हैं, तो कभी पहलवान के साथ रिंग में उतर कर कुश्ती की नौटंकी करते हैं। वो झूठ को सच बना कर बाज़ार में परोसते हैं और सच को झूठ बनाने का कारोबार करते हैं। वो बलात्कार और क़त्ल की ख़बरों को दिलचस्प बता कर पेश करते हैं। जब ऐसी कोई ख़बर नहीं होती जिसमें तड़का लगा सकें तो लोगों को डराना शुरू कर देते हैं। वैज्ञानिकों की जगह ज्योतिषियों को बिठा कर बात-बात पर कहते हैं कि दुनिया तबाह होने वाली है ... ज़िंदगी देने वाला सूरज खुद ही धरती को निगल लेगा... कलयुग है ... घोर कलयुग।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच कहूं तो ख़बरों के लिहाज से ये कलयुग ही है और सतयुगी एसपी के ज़्यादातर साथी इस कलयुगी दौर के महानायक हैं। मैंने इसी कलयुग की शुरुआत में मीडिया में कदम रखा है। मैंने १९९७ में आईआईएमसी में दाखिला लिया। ये वही साल है जब एसपी ने दुनिया को अलविदा कहा था। उनके गुजरने की ख़बर सुनकर मुझे ना जाने क्यों ऐसा लगा कि मेरी किस्मत ख़राब है। इतने बड़े पत्रकार के साथ काम करना तो दूर मिल भी नहीं सका। लेकिन आज उनके ज़्यादातर साथियों को देख कर ऐसा नहीं लगता। जब भी मैं एसपी के नाम पर उनके साथियों को घड़ियाली आंसू बहाते देखता हूं तो लगता है कि झूठ का कारोबार करते करते अब ये एसपी को भी बेच रहे हैं। उनके इस चरित्र को देख कर एसपी से नहीं मिल सकने पर अब ज़रा भी अफ़सोस नहीं रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बल्कि ये कहूं कि मैं खुद को खुशकिस्मत मानता हूं तो भी ग़लत नहीं होगा। लगता है कि चलो मैंने बाज़ारवाद के दौर में मीडिया में कदम रखा है। कम से कम मुझे ये भ्रम तो नहीं कि मैं या मेरा कोई गुरू महामानव की तरह बाज़ार की घातक गति को रोक देगा। मुझे ये भ्रम भी नहीं है कि मैं निरंकुश बाज़ार की धारा को मोड़ कर मीडिया को जनहित का हथियार बना दूंगा। मुझे ये मुलागता भी नहीं कि बिना किसी साझे प्रयास के मैं व्यवस्था में कोई मूलचूल परिवर्तन कर दूंगा। मैं जानता हूं कि जब तक मैं नौकर रहूंगा मुझे कंपनी का हित सबसे पहले साधना है। ये भी जानता हूं कि कंपनियों के पैसे से क्रांति नहीं होती और ये भी कि उधार की ज़िंदगी में लड़ने का हौसला नहीं होता। मैं जानता हूं कि आज मेरे पेशे में समाज के लिए बहुत थोड़ा स्पेस है और दिन ब दिन वो स्पेस सिकुड़ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के दौर में हम कोई ख़बर दिखा कर किसी गरीब को किसी अमीर से चंदा दिला दें तो बहुत है। एयरकंडिशन्ड दफ़्तर और गाड़ियों से ऊबने के बाद बेबस किसानों की बात कर लें तो बहुत है। भूख से बिलबिलाते बच्चों का ख़याल आ जाए तो सोने पर सुहागा। कभी कभार हम ये रस्मअदायगी कर लेते हैं, शायद हम पत्रकार होने के झूठे भ्रम को जिंदा रखना चाहते हैं। ऐसा इसलिए कि पुरानी कहावत है जो अपनी नज़रों में गिर गया समझो वो मर गया। हम कलयुगी दौर के पत्रकार हर रोज मर कर भी मरने से डरते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर में इतना ही कहूंगा कि एसपी सिंह के साथ जुड़े रहने के बाद भी, अगर यही सब करना था तो अच्छा हुआ कि मैं उनसे नहीं मिला। अगर मिला होता तो उनके तमाम साथियों की तरह उस बोझ को उठाए जी रहा होता कि एसपी हम आपको सच्ची श्रद्धांजलि नहीं दे सके। आप ने तो २७ जून, १९९७ को दुनिया को अलविदा कह दिया था, लेकिन हम तो आपको हर रोज मार रहे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-7488828197528782900?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/7488828197528782900/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=7488828197528782900' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/7488828197528782900'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/7488828197528782900'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/06/blog-post_18.html' title='अच्छा हुआ मैं एसपी सिंह से नहीं मिला'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-5551491369851689747</id><published>2008-06-14T14:48:00.002+05:30</published><updated>2008-06-14T14:50:23.314+05:30</updated><title type='text'>ब्लॉग की दुनिया के गिद्ध</title><content type='html'>दिलीप जी ने मुझे गिद्धों से आगाह किया है। ब्लॉग की दुनिया के गिद्धों से आगाह। आपने कुछ लिखा नहीं कि ये गिद्ध जुटने लगते हैं। ठीक वैसे ही जैसे किसी शख्स के घायल होने पर गर्म खून की गंध सूंघ कर गिद्ध उसे घेर लेते हैं। सिर पर मंडराने लगते हैं। आतंकित करने लगते हैं। तब तक, जब तक कि उसकी आखिरी सांस नहीं निकल जाती। वो दम नहीं तोड़ देता। उसके बाद गिद्ध उसे नोच कर खा जाते हैं। शेष रह जाता है, हड्डियों का एक ढांचा जिसे देखने पर कोई भी सिहर उठे। जहां तक ब्लॉग की दुनिया के गिद्धों का सवाल है, वो संजीदा लेखकों को लड़ाने-भिड़ाने का काम करते हैं। कोई बात नहीं हो तो भी भड़काने और उकसाने का काम करते हैं। ये उस बात में यकीन रखते हैं कि बार बार एक ही झूठ उस वक्त तक बोलो कि वो सच लगने लगे। उसके बाद ब्लॉग पर छिड़ी जंग को देखो और ठहाके लगाओ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लॉग की दुनिया के इन गिद्धों का एक खास चरित्र है। पहला चरित्र तो ये कि ये गिद्ध आपको हर जगह नज़र आएंगे। चाहे बहस मीडिया पर हो, समाजिक और आर्थिक मुद्दों पर हो या फिर विज्ञान और धर्म पर हो। गिद्ध हर जगह मौजूद हैं। गिद्धों का काम है शीर्षक देख कर एक कमेंट चिपका देना। पोस्ट को बिना पढ़े, शब्दों और पंक्तियों के बीच के अर्थ को बिना समझे ये टिप्पणी दे आते हैं। ऐसे ही कुछ गिद्धों ने मेरे पोस्ट &lt;a href="http://chaukhamba.blogspot.com/2008/06/blog-post_5697.html"&gt;दिलीप जी और विनीत मुझे माफ कर दें, प्लीज&lt;/a&gt; पर भी कमेंट किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मसलन, एक शख्स कहते हैं कि तुमने माफी क्यों मांगी? इससे व्यक्ति का लिजलिजापन झलकता है। अरे जनाब, आपने सही से पढ़ा नहीं। मैंने अपने विचारों के लिए माफी नहीं मांगी। माफी मांगी कि शायद मैं बेहतर नहीं लिख सका और बात का गलत अर्थ निकाला गया। अगर एक लेखक के तौर पर मुझसे चूक हुई, तो मुझे माफी मांगनी ही चाहिये। अगर चूक नहीं हुई है तो जिन्होंने उसका गलत मतलब निकाला वो सुधार करेंगे। कुल मिलाकर मैंने बहस को गलत राह पर मुड़ने से बचाने के लिए माफी मांगी है और ये मैंने दो जगह पर साफ शब्दों में लिखा। लेकिन गिद्ध की नज़र उन पंक्तियों पर पड़ी ही नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सिर्फ उदाहरण भर है। ऐसे कई गिद्ध हैं जिन्होंने मेरे और दिलीप जी के लिखे पर ऐसी ही टिप्पणियां की हैं। कुछ तल्खी की वजह पूछते हैं? पूछते हैं कि कहीं ये निजी झगड़ा तो नहीं? उन गिद्धों को मैं साफ कर दूं कि कहीं कोई तल्खी नहीं। कहीं कोई झगड़ा नहीं। मैं अब भी दिलीप जी के दफ्तर में जाता हूं तो उनसे लंबी बात होती है। सामाजिक मुद्दों के साथ मीडिया और करियर से जुड़े मुद्दों पर भी। हम दोनों इस राय में इस्तेफाक रखते हैं कि दो लिखने वालों के बीच इतना स्पेस जरूर होना चाहिये कि वो अपने विचारों को बेबाक अंदाज में पेश कर सकें। मतभेद गहरे होने पर मर्यादित भाषा में एक दूसरे के तर्कों को काट सकें। दिलीप जी ने इसका जिक्र भी किया है। लेकिन गिद्धों की नज़र उस पर नहीं पड़ी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर में, मैं यही कहूंगा कि ब्लॉग की दुनिया में मैं बहुत पुराना न सही, बहुत नया भी नहीं हूं। बीते एक साल में अनियमित तौर पर ही सही ब्लॉग से जुड़े रहने पर, मैं भी इन गिद्धों को पहचानने लगा हूं। इसलिए दिलीप जी, आप ज़रा भी परेशान मत हों, यहां इन गिद्धों को दाल नहीं गलेगी। हमें एक दूसरे के सामने शर्मिंदा होना पड़े, ऐसी नौबत नहीं आएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(( मैं अभय तिवारी जी का बहुत शुक्रगुजार हूं। मैं जो कहना चाहता था, उसे उन्होंने अपनी टिप्पणी में और साफ कर दिया। सच भी यही है, मैं पूरब और पश्चिम की बहस को खत्म करना नहीं चाहता। वैसे भी मेरे खत्म करने से शदियों से चली आ रही ये बहस खत्म नहीं होगी। इसलिए अच्छा यही रहेगा कि हम पूरब और पश्चिम की अच्छाइयों और बुराइयों पर छिड़ी बहस को जारी रखें। इसी बहाने हम समाज में हो रहे कुछ तेज बदलावों से एक दूसरे को अवगत कराएंगे।)) &lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-5551491369851689747?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/5551491369851689747/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=5551491369851689747' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/5551491369851689747'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/5551491369851689747'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/06/blog-post_8184.html' title='ब्लॉग की दुनिया के गिद्ध'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-8150567175199078831</id><published>2008-06-14T03:54:00.000+05:30</published><updated>2008-06-14T03:56:03.706+05:30</updated><title type='text'>क्या एक छात्रा की हत्या दिलचस्प हो सकती है?</title><content type='html'>मैं आज आप सभी से ये जानना चाहता हूं कि क्या किसी छात्रा की हत्या दिलचस्प हो सकती है? क्या हत्या की वजह दिलचस्प हो सकती है? क्या उस वजह पर बहस दिलचप्स हो सकती है? अगर हां तो क्यों और ना तो क्यों? आप सभी अपनी राय दें। क्योंकि आज मैंने कुछ सम्मानित लोगों को इस दिलचस्प बहस को पेश करते देखा है। हत्या और हत्या की मंशा पर चटखारे लेते देखा है। तभी से मेरे मन में ये दोनों सवाल कौंध रहे हैं। आप सभी से मैं इन सवालों पर राय मांगता हूं। हो सके तो चंद मिनट ही सही रुक कर अपनी राय जरूर दें। आपकी राय मुझे किसी नतीजे पर पहुंचने में मदद करेगी।&lt;br /&gt;धन्यवाद,&lt;br /&gt;समरेंद्र&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-8150567175199078831?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/8150567175199078831/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=8150567175199078831' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/8150567175199078831'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/8150567175199078831'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/06/blog-post_14.html' title='क्या एक छात्रा की हत्या दिलचस्प हो सकती है?'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-3335026569754669621</id><published>2008-06-13T14:54:00.003+05:30</published><updated>2008-06-14T03:28:56.609+05:30</updated><title type='text'>दिलीप जी और विनीत मुझे माफ कर दें, प्लीज</title><content type='html'>ये बात पुरानी है लेकिन उतनी ही सही भी। अगर कोई शख्स कुछ कहता है और लोग उसका गलत मतलब निकालते हैं तो ये गलती लोगों की नहीं बल्कि कहने वाले की है। लगता है कि ये गलती मुझसे हो गई है। अगर ऐसा नहीं होता तो दो पढ़े-लिखे, काबिल और बौद्धिक स्तर पर मुझसे ज्यादा संपन्न लोग – दिलीप जी और विनीत मेरी बात का गलत अर्थ नहीं निकालते। मोहल्ला पर &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2008/06/blog-post_13.html"&gt;पश्चिम से क्यों सीखे सभ्यता की आदि भूमि&lt;/a&gt; में दिलीप जी मुझसे ये नहीं कहते कि मैं आंखें मूंदे हुए हूं और उस पर अपनी टिप्पणी में विनीत ये नहीं कहते कि मुझे अपनी &lt;a href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=2225656928131671963&amp;amp;postID=7462940501436008596"&gt;संस्कृति को महान बताने की लत&lt;/a&gt; है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन दोनों लोगों ने मेरी बातों को एकदम दूसरा ही मोड़ दे दिया है। मैंने दिलीप जी के नाम लिखे खुले खत में कहा कि पूरब को गरियाने के चक्कर में &lt;a href="http://chaukhamba.blogspot.com/2008/06/blog-post_13.html"&gt;पश्चिम के ढोंग का गुणगान ना करें&lt;/a&gt;। यहां मैंने गुणगान शब्द का सोच समझ कर इस्तेमाल किया था। क्योंकि हम बीते जमाने में निराद सी चौधरी जैसे जैंटलमैन देख चुके हैं जिन्हें भारत में बुराई ही बुराई नज़र आती थी, अच्छाई नहीं। मेरे कहने का आशय इतना ही था कि हम पूरब में ढोंग और पाखंड की निंदा करें, उन्हें मिटाने की मुहिम चलाएं, लेकिन उस चक्कर में पश्चिम की बुराइयों को आत्मसात ना कर लें। लेकिन मेरी बातों का उन्होंने ये मतलब निकाल लिया कि मैं पूरब के ढोंग का समर्थक हूं और पश्चिम की अच्छाइयों का धुर्र विरोधी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये मतलब उन्होंने निकाला तो इसकी तीन वजहें हो सकती हैं।&lt;br /&gt;१) मैं उन्हें समझा नहीं सका या यूं कहें कि मैं अपनी बात सही तरीके से नहीं रख सका।&lt;br /&gt;२) वो इतने नासमझ हैं कि मेरे लिखे का सही मतलब नहीं समझ सके।&lt;br /&gt;३) या फिर उन्होंने सोची समझी साज़िश के तहत बहस को गलत मोड़ दिया है। (साज़िश शब्द का इस्तेमाल इसलिए कर रहा हूं कि पिछले ग्यारह साल से मैं भी इसे पेशे में हूं। मुझे मालूम है कि एक अच्छे आदमी को यहां किस साज़िश के तहत बुरा साबित किया जाता है। मैं ये भी जानता हूं कि एक प्रगतिशील शख्स को भी लोग अपने निजी स्वार्थ के लिए दकियानूसी, जातिवादी और सांप्रदायिक करार दे देते हैं।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुरुआत तीसरी वजह से करता हूं। दिलीप जी को मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं। वो मेरे सीनियर हैं और मैंने उनके मातहत काम भी किया है। इसलिए ये दावे से कह सकता हूं कि वो मुझे दकियानूसी और सुधार विरोधी घोषित करने की साज़िश नहीं रच रहे। अगर खुद दिलीप जी मुझसे कहेंगे कि वो मेरे खिलाफ साज़िश रच रहे हैं तो भी मैं नहीं मानूंगा। रही बात विनीत की तो मैं उन्हें जानता ही नहीं और जिसे नहीं जानता उसे हमेशा अच्छा मान कर चलता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब दूसरी वजह। दिलीप जी एक बेहद प्रगतिशील विचारक किस्म के आदमी हैं। मुझसे ज्यादा पढ़े लिखे और समझदार हैं। अनुभव भी मुझसे ज्यादा है। इसलिए मैं ये मान ही नहीं सकता कि वो मेरे लिखे का सही मतलब नहीं समझ सकें। जहां तक विनीत का सवाल है उनके लिखने के तौर तरीके से ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो भी समझदार किस्म के शख्स हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब ये दोनों वजहें गलत हैं तो बाकी बस एक ही वजह बचती है और वो सही ही होगी। इसलिए मैं दिलीप जी और विनीत दोनों से माफी मांगता हूं और प्रार्थना करता हूं कि मुझे दकियानूसी और सुधार विरोधी घोषित ना करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समरेंद्र&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-3335026569754669621?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/3335026569754669621/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=3335026569754669621' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/3335026569754669621'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/3335026569754669621'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/06/blog-post_5697.html' title='दिलीप जी और विनीत मुझे माफ कर दें, प्लीज'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-5968644615136439856</id><published>2008-06-13T03:32:00.002+05:30</published><updated>2008-06-13T03:35:51.509+05:30</updated><title type='text'>पश्चिम के ढोंग का गुणगान ना करें</title><content type='html'>&lt;em&gt;आज दिलीप मंडल जी ने &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/"&gt;मोहल्ला &lt;/a&gt;में एक लेख लिखा है। &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2008/06/blog-post_12.html"&gt;पश्चिम के ब्लॉग में पूरब का मोटापा&lt;/a&gt;। इसमें उन्होंने पूरब के ढोंग की निंदा की है और पश्चिम से सीखने की जरूरत पर बल दिया है। उनके इस लेख के कुछ मुद्दों पर मेरी सहमति है और कुछ पर अहमति। उनके नाम इस खुले ख़त के ज़रिये ... मैं सहमति और असहमति – दोनों जतला रहा हूं।&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;--------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिलीप जी,&lt;br /&gt; ये सही है कि हमारे यहां पूरी व्यवस्था हिप्पोक्रेट है। आम आदमी से लेकर देश की ज्यादातर सम्मानित और ताकतवर संस्थाएं ढोंग और पाखंड में एक दूसरे से होड़ करती हैं। इस देश में न्यायपालिका के ढोंग के कई बड़े उदाहरण हैं। ये वही न्यायपालिका है जो पर्यावरण को ताक पर रख कर नर्मदा बांध परियोजना को हरी झंडी दिखाती है। लेकिन उसी पर्यावरण का हवाला देकर दिल्ली से उद्योगों को बाहर निकाल देती है। यही नहीं हमारे देश में सर्वोच्च न्यायालय ... कार्यपालिका से लेकर विधायिका में फैले भ्रष्टाचार पर खुल कर टिप्पणी करता है। भ्रष्ट अफसरों और नेताओं की किस्मत का फैसला करता है, लेकिन न्यायपालिका में मौजूद भ्रष्ट जजों को राष्ट्रपति की इच्छा के खिलाफ जाकर उच्च पदों पर बहाल भी करता है। सीधे कहूं तो जो न्यायपालिका हर रोज न्याय की अवधारणा का मजाक उड़ाती हो उससे कुछ बेहतर की उम्मीद नहीं करनी चाहिये। ऐसे में अगर दिल्ली हाई कोर्ट के सदा सम्मानित जजों ने एयरहोस्टेज के लिए खास वजन तय कर दिया तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं। वो ऐसे बेतुके फैसले करते आए हैं। कर सकते हैं और करते रहेंगे। संविधान ने हमारे देश में जजों को ये ताकत दी है और वो इस ताकत का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते आए हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके गलत फैसलों का विरोध नहीं होना चाहिये। हमारा दायित्व है कि उन गलत फैसलों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं। उन पर बहस छेड़ें और इस दायित्व को निभाने के लिए आपको साधुवाद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन आपके लेख के कुछ मुद्दों पर मेरा विरोध भी है। गलत फैसले पर सवाल खड़े करते वक्त आपने भी कुछ गलतियां कर दी हैं। आपने पश्चिम की जिस सभ्यता की दिल खोल कर तारीफ की है, वो व्यवस्था उतनी उदार नहीं है। सबसे पहली बात हिलेरी पर ओबामा की जीत की। आपने कहा कि राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की दौड़ में अश्वेत ओबामा की जीत में श्वेत लोगों का भी हाथ है। बात सही है। लेकिन यहां ध्यान देने वाला एक और पहलू है। ये मुकाबला श्वेत और अश्वेत के बीच होने के साथ एक महिला और अश्वेत के बीच भी था। जिस तरह अमेरिका में आज तक कोई अश्वेत राष्ट्रपति नहीं हुआ है ठीक उसी तरह वहां आज तक कोई महिला भी राष्ट्रपति नहीं चुनी गई है। इस लिहाज से दोनों की स्थिति भारत में दलितों की तरह ही है और एक दलित पर दूसरे दलित की जीत को सामाजिक न्याय का उत्तम उदाहरण तो नहीं माना जा सकता। कम से कम इसे अमेरिकी लोगों की मानसिक महानता और उदारता तो नहीं ही कहना चाहिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपकी दूसरी गलती चीयरलीडर्स में रंगभेद को लेकर है। यहां आप भूल गए कि चीयरलीडर्स के कॉन्सेप्ट की मूल बुनियाद क्या थी? क्या आपने कभी किसी ज्यादा वजन और उम्र वाली महिला को चीयरलीडर की भूमिका निभाते देखा है? हो सकता है कि आपने देखा हो, लेकिन मैंने नहीं देखा। ना तो फिल्मों में और ना ही टीवी पर किसी मुकाबले के लाइव टेलीकास्ट के दौरान। सच यही है कि चीयरलीडर्स का पेशा उसी पुरुषवादी सोच का नतीजा है जिसके तहत हवाई जहाजों में एयरहोस्टेज के पेशे की नींव रखी गई। शुरू में दोनों ही जगह महिलाओं को पुरुष ग्राहकों और दर्शकों को लुभाने के लिए एक आइटम के तौर पर पेश किया गया। आज के आधुनिक दौर में भले ही ये दोनों प्रोफेशन सम्मानित हो गए हों, लेकिन उनकी बुनियादी अवधारणा ही शोषण की रही है। शोषण की ये मानसिकता पूरब से लेकर पश्चिम आज भी हर जगह मौजूद है। कहीं कम तो कहीं ज्यादा। फिर शोषण की इस व्यवस्था में रंगभेद एक और पहलू मात्र है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिलीप जी, मैं विदेश कभी नहीं गया, इसलिए आपके दोस्तों की तरह वहां के उदार चरित्र का गवाह नहीं बन सका। लेकिन खबरों से जुड़े रहने के कारण इतना जरूर जानता हूं वहां भी लोग और संस्थाएं कम ढोंगी नहीं हैं। आखिर में बस इतना ही कहना चाहता हूं कि हम सबको अपने पूरब में फैले ढोंग, पाखंड और भेदभाव का जोरदार विरोध करना चाहिये, लेकिन इस चक्कर में पश्चिम के ढोंग के गुणगान से बचना भी चाहिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धन्यवाद,&lt;br /&gt;समरेंद्र&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-5968644615136439856?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/5968644615136439856/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=5968644615136439856' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/5968644615136439856'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/5968644615136439856'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/06/blog-post_13.html' title='पश्चिम के ढोंग का गुणगान ना करें'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-7992134898326175681</id><published>2008-06-08T01:17:00.002+05:30</published><updated>2008-06-08T01:37:22.794+05:30</updated><title type='text'>गलती करे जोलहा, मार खाये गदहा</title><content type='html'>&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;लेखक - विचित्र मणि &lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोडे असमंजस, थोड़ी ना-नुकूर और थोड़ी फुसफुसाहट के साथ ही सरकार ने पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोत्तरी कर ही दी। कितना किया, अब उस दुखती रग को छेड़ने से क्या फायदा। लेकिन सरकार के फैसले ने विपक्ष को तो छेड़ ही दिया। सरकार को समर्थन देने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां उस लैला की तरह हो गयीं, जो जमाने के आगे तो मजनूं को भला बुरा कहती है लेकिन दुनिया की आड़ में उनका प्रेमालाप बदस्तूर जारी रहता है। आखिर क्या करें, खुद को जब कम्युनिस्ट कहना है तो जनवादी तो दिखना ही पड़ेगा। हों या ना हों, इसके क्या फर्क पड़ता है। इसे लोकतंत्र की बदनसीबी ही कहेंगे कि यहां कुछ करने से कुछ कर दिखाने का ढिंढोरा ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। बेचारी कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी कोलकाता में बंद रखकर ये मान लिया कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ोत्तरी पर उसने अपना कर्तव्य निबाह लिया। उन्हें ये नहीं दिखता कि पेट्रोलियम पदार्थों पर आंध्र प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा बिक्री कर पश्चिम बंगाल सरकार ही लगाती है, जहां लाल क्रांति वाले कम्युनिस्टों का परचम बीते ३१ साल से लहरा रहा है। लेकिन सबसे नाटकीय और अमानवीय विरोध रहा भारतीय जनता पार्टी का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाजपा नेता वेंकैय्या नायडू ने बैलगाड़ी की सवारी की तो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने मंत्रियों के साथ साइकिल पर चलते दिखे। हद तो भाजपा की एक व्यापारिक शाखा ने कर दी। उसने मारुति ८०० कार को दो गधों से जोत दिया। बेचारे गधे तथाकथित इंसानों के बीच हक्के बक्के कार को खींच रहे थे। वो मन में सोच रहे होंगे कि गलती तो मनमोहन सिंह और मुरली देवड़ा की है, खामियाजा हम भुगत रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर उन गधों की गलती क्या थी? आपको कार पर चलना है या नहीं चलना है, उससे गधों और बैलों का क्या लेना-देना ?  सरकार के पेट्रोल डीजल की कीमतें बढ़ाने से आप कार से उतरकर बस या पैदल हो गये, उसमें उन निरीह पशुओं की क्या गलती  है? गधे और बैल तो सही मायने में श्रम के प्रतीक हैं। इस खेती प्रधान देश में उनकी बड़ी जरूरत है। निश्छलता, कर्मठता और स्वामिभक्ति की उनकी प्रवृति का आदर किया जाना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि देश-भक्ति की ढोल पीटने वाली बीजेपी उन महान मूल्यों की कीमत नहीं जानती। वक्त के मुताबिक एक प्रचलित कहावत को बदलकर कहें तो गलती तो जोलहा ने किया, मार बेचारा गदहा खा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वजह साफ है कि उस हवा हवाई पार्टी में जमीन का दुख-दर्द समझने वाला कोई नहीं है। कायदे से तो उम्र के आखिरी पड़ाव पर ही सही, बीजेपी के प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी को चाहिए कि खेती-बाड़ी वाले इस देश को ठीक से जानने की कोशिश करें और हो सके तो वेंकैय्या नायडू और दूसरे अपने नेताओं को भी ये नेक सलाह दें। वैसे एक बात और जोड़ दूं कि ये बात कांग्रेस पर भी लागू होती है। आखिर भाजपा कांग्रेस का ही तो विस्तार है। कैसे? इसकी चर्चा बाद में होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-7992134898326175681?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/7992134898326175681/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=7992134898326175681' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/7992134898326175681'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/7992134898326175681'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/06/blog-post.html' title='गलती करे जोलहा, मार खाये गदहा'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-5072789927171484133</id><published>2008-05-31T10:19:00.002+05:30</published><updated>2008-05-31T10:54:15.557+05:30</updated><title type='text'>राम मिलाई जोड़ी</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन पहले मित्र अमिय मोहन और मैंने एक बार फिर ख़्वाजा के दरबार में हाजिरी बजाने का मन बनाया। हम वहां पिछले साल गए थे। जून के ही महीने में। तब मेरे घर दो नन्ही परियों ने जन्म लिया था। ख्वाजा से मैंने दुआ मांगी थी और वादा किया था कि जल्दी ही सजदा करने दोबारा आऊंगा। लेकिन एक साल होने को है, मैं लाख कोशिशों के बाद भी वहां जा नहीं सका हूं। कभी कुछ तो कभी कुछ। हर बार जाने का कार्यक्रम टालना पड़ा। इस बार फ़ैसला किया था कि कार्यक्रम नहीं टालूंगा। अमिय से बात हुई तो वो भी तैयार हो गए। वैसे वो अजमेर जाने के नाम पर हमेशा तैयार रहते हैं। कई बार जा चुके हैं। पिछले साल मैं भी उन्हीं के साथ ही गया था। उसके बाद भी वो एक चक्कर लगा आएं। तय कार्यक्रम के मुताबिक हम लोग रविवार को अजमेर पहुंचने वाले थे. लेकिन उससे पहले गुर्जर आंदोलन शुरू हो गया। घरवाले अजमेर जाने की खबर सुन कर भड़क गए। अमिय मोहन ने भी कहा कि कुछ दिन रुक ही जाते हैं। कार्यक्रम फिर टालना पड़ा और नौ दिन बीत चुके हैं हम दोनों अब भी राजस्थान में अमन का इंतज़ार कर रहे हैं। आखिर हमारा इंतज़ार क्यों बढ़ता जा रहा है? नौ दिन बीतने के बाद भी वहां हिंसा क्यों नहीं थम रही? और क्या कभी इसका हल निकलेगा या नहीं?&lt;br /&gt;दरअसल ये पूरा मसला इतना उलझा हुआ है कि हल निकालने की गारंटी कोई नहीं दे सकता। गुर्जरों ने मांग ही कुछ ऐसी रख दी है कि किसी भी सरकार के लिए किसी नतीजे पर जल्दी पहुंचना मुमकिन नहीं। अगर राज्य सरकार उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की सिफारिश करने को तैयार हो जाए तो राजस्थान में एक नया सियासी संकट पैदा होगा। वो सियासी संकट उस श्रेणी में पहले से मौजूद जातियों के विरोध के कारण पैदा होगा। उस सूरत में इसकी भी आशंका है कि उन जातियों और गुर्जरों के बीच कोई झगड़ा ना शुरू हो जाए। इस ख़तरे का अहसास बीजेपी के साथ कांग्रेस को भी है। यही वजह है कि कोई भी सियासी दल गुर्जरों को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में डालने का सीधा वादा नहीं कर रहा।&lt;br /&gt;मांग बड़ी होने के साथ गुर्जर नेतृत्व ने गलती भी की है। फौज छोड़ कर सियासत में कदम रख रहे कर्नल बैंसला अपनी नादानी के कारण अपने ही जाल में उलझ गए हैं। उन्हें अगर अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग पर आंदोलन करना था तो ये आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से होना चाहिये था। लेकिन वो अपने लोगों को काबू में नहीं रख सके। यही नहीं सियासत में दो कदम आगे बढ़ा कर एक कदम पीछे हटाना पड़ता है। कर्नल बैंसला कदम आगे बढ़ाना तो जानते हैं लेकिन वक्त पर पीछे हटाना नहीं जानते। वो भूल गए हैं कि किसी भी रस्सी को एक सीमा तक ही खींचा जा सकता है। उसके बाद जोर देने पर रस्सी टूट जाती है। फिलहाल कर्नल बैंसला रस्सी को उसी हद तक खींचने की कोशिश कर रहे हैं।&lt;br /&gt;यहां एक गलती राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से भी हुई है। अब बीजेपी को भी वसुंधरा राजे को नेतृत्व सौंपने की गलती का अहसास हो रहा होगा। वसुंधरा राजे किसी भी लिहाज से जनता की सेवक होने की हकदार नहीं। वो निजी स्वार्थों में डूबी एक ऐसी नेता हैं जिन्हें जनता से ज्यादा फैशन और पार्टियों से मोहब्बत है। यही वजह है कि उन्होंने अपने राज्य की पुलिस को जनता से व्यवहार का तरीका नहीं सिखाया। उनके राज में पुलिस इतनी मदहोश है कि वो बात बात पर लोगों पर गोलियों की बौछार कर देती है। चाहे वो गंगानगर में पानी के लिए किसानों का प्रदर्शन हो या फिर अनुसूचित जनजाति का दर्जा मांग रहे गुर्जरों का प्रदर्शन।&lt;br /&gt;ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब दोनों ही तरफ से अदूरदर्शी और अविवेकशील नेतृत्व हो तो किसी समस्या का हल निकले भी तो कैसे? &lt;/p&gt;&lt;p&gt;तारीख - ३१-०५-०८&lt;/p&gt;&lt;p&gt;समय - १०.२०&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;ये लेख यहां भी है....&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="http://dreamndesire.blogspot.com/2008/05/blog-post_31.html"&gt;http://dreamndesire.blogspot.com/2008/05/blog-post_31.html&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-5072789927171484133?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/5072789927171484133/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=5072789927171484133' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/5072789927171484133'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/5072789927171484133'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/05/blog-post_31.html' title='राम मिलाई जोड़ी'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-7206386678190988289</id><published>2008-05-30T23:43:00.001+05:30</published><updated>2008-05-30T23:47:53.552+05:30</updated><title type='text'>कप्तान ने हरा दिया</title><content type='html'>मेरी टीम मैच हार गई। दिल्ली डेयरडेविल्स पर मैंने काफी दांव लगाया था। रुपये पैसे का नहीं बल्कि जुबानी दांव। ऑफिस और घर पर जो कोई मुझते पूछता की कौन सी टीम खिताब जीतेगी मेरे मुंह से दिल्ली का नाम निकल जाता। इसकी दो बड़ी वजहें थी। पहली वजह कि मैं दिल्ली में रह रहा हूं और मेरे गांव से बाकी टूसरे शहरों की टीमों की तुलना में दिल्ली नजदीक भी है। दूसरी वजह कि सचिन तेंदुलकर के बाद वीरेंद्र सहवाग को ही बतौर बल्लेबाज मैं सबसे अधिक पसंद करता हूं। मुझे ये हमेशा लगता रहा कि धोनी को कप्तान बना कर सहवाग के साथ ज्यादती की गई है। मैं यहा साफ कर दूं कि ये बिल्कुल मेरी निजी राय है और इससे किसी को सहमत होने की जरूरत नहीं है। मगर अब मेरी राय बिल्कुल बदल गई है।&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;शेष यहां पढ़ें ...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;a href="http://dreamndesire.blogspot.com/2008/05/blog-post_1232.html"&gt;http://dreamndesire.blogspot.com/2008/05/blog-post_1232.html&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-7206386678190988289?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/7206386678190988289/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=7206386678190988289' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/7206386678190988289'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/7206386678190988289'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/05/blog-post_901.html' title='कप्तान ने हरा दिया'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-1333485755824373572</id><published>2008-05-30T12:40:00.001+05:30</published><updated>2008-05-30T12:43:41.731+05:30</updated><title type='text'>क्या हम सड़क पर चलना नहीं जानते?</title><content type='html'>&lt;p&gt;दफ्तर से लौटते वक्त लगा कि गाड़ी भिड़ जाएगी। ग्रेटर कैलाश से आईटीओ की तरफ बढ़ने पर ओबेरॉय होटल के पास से बायीं तरफ इंडिया गेट के लिए रास्ता निकलता है। मैं इंडिकेटर देते हुए धीरे धीरे उधर मुड़ने लगा। लेकिन तभी एक तेज रफ्तार कार पॉवर हॉर्न बजाते हुए वायें से निकलने लगी। अगर मैंने जोर से ब्रेक नहीं दबाया होता तो हादसा तय था। ये पहली बार नहीं है। दिल्ली की सड़क पर गाड़ी चलाते हुए कुछ अधिक सतर्क रहना पड़ता है। यहां ज्यादातर लोग बेतरतीब ढंग से गाड़ी चलाते हैं। कोई साठ की लेन में तीस की रफ्तार से चलता है तो कोई चालीस की लेन में अस्सी की रफ्तार से। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;शेष यहां पढ़ें...&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="http://dreamndesire.blogspot.com/2008/05/blog-post_30.html"&gt;http://dreamndesire।blogspot.com/2008/05/blog-post_30.html&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-1333485755824373572?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/1333485755824373572/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=1333485755824373572' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/1333485755824373572'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/1333485755824373572'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/05/blog-post_30.html' title='क्या हम सड़क पर चलना नहीं जानते?'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-562271727490668926</id><published>2008-05-30T10:31:00.002+05:30</published><updated>2008-05-30T11:48:55.222+05:30</updated><title type='text'>वतन को फिक्र कहां?</title><content type='html'>आज एक ख़बर आई। अमेरिका के न्यू आर्सलेंस प्रांत से। भारतीय मजदूरों की बेबसी से जुड़ी हुई। वहां पर एक कंट्रक्शन कंपनी ने पांच सौ से ज्यादा भारतीय मजदूरों पर कहर बरपाया है। इन मजदूरों को भारत के ही एक दलाल ने रहने और खाने के अच्छे इंतजाम और अच्छी तनख्वाह का लालच देकर अमेरिका पहुंचाया। लेकिन अब वहां पर उनके साथ बंधुआ मजदूरों जैसा बर्ताब हो रहा है। तीन सौ वर्ग फुट के कमरे में २५-२५ मजदूर रहने को मजबूर हैं। खाने-पीने का बंदोबस्त भी बुरा। यही नहीं विरोध करने पर कंपनी के गुंडे उनकी पिटाई भी करते हैं और पुलिस तमाशा देखती रहती है। न्याय के लिए वो मजदूर पिछले १६ दिन से भूख हड़ताल पर बैठे हैं। मानवाधिकार संगठनों के जरिये उन्होंने भारत के हुक्मरानों तक भी अपनी बात पहुंचाने की कोशिश की है। लेकिन हमारी सरकार खामोश हैं। मनमोहन सिंह चुप हैं। सोनिया गांधी भी चुप हैं।&lt;br /&gt;कुछ दिनों पहले सूडान में चार भारतीयों के अपहरण की खबर आई थी। तब एक साथी ने कहा कि ऐसी ख़बरें दिखाने की क्या ज़रूरत है? लोग पैसे के लालच में वतन छोड़ कर चले जाएं और मुसीबत में फंसे तो सरकार मदद करे? ये भी कोई तुक है? पहली नज़र में सवाल सही लगते हैं। लेकिन सही हैं नहीं। दरअसल किसी भी देश से दो तबके के लोग नौकरी के लिए विदेश जाते हैं। एक तबका इंजीनियर, डॉक्टर, मैनेजर, वैज्ञानिक जैसे पढ़े लिखे लोगों का है और दूसरा मजदूरों का तबका। पहला तबका अपने सपनों को, महात्वाकांक्षाओं को नया आयाम देने के लिए जाता है। दूसरा रोजी रोटी की तलाश में, अपना और परिवार की जरूरतों को पूरा करने की कोशिश में।&lt;br /&gt;हम अपने लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरी करने लायक गुंजाइश भी पैदा नहीं कर सके हैं, तो ये हमारे देश, हमारे हुक्मरानों और हमारी व्यवस्था की कमजोरी है। एक ऐसी कमजोरी जो किसी भी सम्प्रभु राष्ट्र के लिए शर्म की बात है। ऐसे में अगर लोग रोजी रोटी की तलाश में विदेश जाते हैं और वहां उनके साथ कुछ बुरा होता है तब खामोश रह कर हम सम्प्रभु राष्ट्र होने की एक और शर्त पर खरे नहीं उतरेंगे। ये अपने लोगों के साथ दोहरा विश्वासघात होगा। फिलहाल हमारी सरकार चुप रह कर अमेरिका में न्याय के लिए लड़ रहे अपने उन पांच सौ से ज्यादा नागरिकों और उनके घरवालों के साथ यही दोहरा विश्वासघात कर रही है।&lt;br /&gt;तारीख - ३० मई, २००८&lt;br /&gt;वक़्त - १०.30&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-562271727490668926?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/562271727490668926/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=562271727490668926' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/562271727490668926'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/562271727490668926'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/05/blog-post_29.html' title='वतन को फिक्र कहां?'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-6336508683348451347</id><published>2008-05-29T12:28:00.000+05:30</published><updated>2008-05-29T12:29:22.365+05:30</updated><title type='text'>अंकों का बोझ</title><content type='html'>&lt;p&gt;आज सुबह आठ बजे दसवीं के नतीजे आए। उस समय मैं दफ्तर में था और वहां से नौ बजे के करीब घर पहुंचा। तब तक मेरा भाई अपना नतीजा जानने के लिए कई फोन कर चुका था। परीक्षा के बाद वो छुट्टियां बिताने के लिए गांव चला गया। मेरी तरह उसे भी गांव काफी पसंद है। बलिया जिले का चौरा कथरिया गांव। सड़क के शोर से एक कोस दूर। बस से उतरने के बाद खड़ींजा पर गांव की तरफ बढ़ते हुए पहले खेत पड़ते हैं... फिर बगीचे और उसके बाद आबादी। बगीचे और आबादी के बीच करीब दो सौ मीटर की परती है। परती में कुछ बड़े गड्ढे और उन गड्ढों के बीच में पतली पतली पगडंडियां। उन्हों पगडंडियों से होकर हम लोग करीब पंद्रह फुट की ऊंचाई पर बसे गांव में दाखिल होते हैं। हमारा घर गांव के बाहरी छोर पर है। इसलिए दुआर से आबादी नहीं परती, बगीचे और खेल खलिहान नज़र आते हैं। वो खेत खलिहान और बगीचे जिन्हें देखने के लिए आंखें हर वक्त तरसती रहती हैं। अरे ये क्या? मैं लिखने बैठा था दसवीं के नतीजों पर और गांव का ब्योरा देने लगा।घर पहुंचते ही कंप्यूटर ऑन किया, लेकिन इंटरनेट ने धोखा दे दिया। फिर दोस्त विचित्र मणि को फोन किया और भाई का रोल नंबर नोट कराया। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;em&gt;शेष यहां पढ़ें &lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="http://dreamndesire.blogspot.com/2008/05/blog-post_29.html"&gt;http://dreamndesire.blogspot.com/2008/05/blog-post_29.html&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-6336508683348451347?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/6336508683348451347/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=6336508683348451347' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/6336508683348451347'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/6336508683348451347'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/05/blog-post_28.html' title='अंकों का बोझ'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-6726419515547015614</id><published>2008-05-28T11:43:00.000+05:30</published><updated>2008-05-28T13:05:26.115+05:30</updated><title type='text'>मेरे सपने, मेरी तमन्ना</title><content type='html'>जमाना बीत गया है अपने लिये कुछ लीखे हुए। दफ़्तर में तो हर रोज कई पन्ने टाइप कर लेता हूं, लेकिन अपनी ज़िंदगी को पन्नों पर दर्ज करने के लिए या यूं कहें कि अपने लिये लिखने की फुर्सत ही नहीं मिलती। खाली होने पर खालीपन का अहसास इतना गहरा हो जाता है कि कुछ भी करने का जी नहीं करता। जब से शराब और सिगरेट छोड़ दी है, कई दोस्तों से मिलने का बहाना भी छूट गया है। इसलिए ज्यादातर वक्त अब घर में कटता है। टीवी देखते, सोते और ये सोचते हुए कि ज़िंदगी के मायने क्या है। क्या यूं ही अंतहीन... अंधेरे सफ़र पर चलते जाना मेरी नियति है? क्या जीवन का सिर्फ़ इतना ही लक्ष्य है कि अपना और परिवार का पेट पाल लें? छोटे भाई-बहनों को पढ़ा लें? बच्चों के लिए कुछ जमा कर दें?&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt;शेष यहां पढ़ें &lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;a href="http://dreamndesire.blogspot.com/2008/05/blog-post.html"&gt;http://dreamndesire.blogspot.com/2008/05/blog-post.html&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-6726419515547015614?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/6726419515547015614/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=6726419515547015614' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/6726419515547015614'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/6726419515547015614'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2008/05/blog-post.html' title='मेरे सपने, मेरी तमन्ना'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-2686440251911731759</id><published>2007-10-05T13:27:00.000+05:30</published><updated>2007-10-05T13:34:31.515+05:30</updated><title type='text'>गांधी को इतना मत छलो</title><content type='html'>एक थे देवीलाल। वीपी सिंह जैसे तेजतर्रार और चंद्रशेखर जैसे बेबाक प्रधानमंत्रियों के तहत उप प्रधानमंत्री थे। १९८९ में जब वीपी सिंह की अगुवाई वाली सरकार में उप प्रधानमंत्री बनने से पहले वो हरियाणा के मुख्यमंत्री थे। लेकिन जब केंद्रीय राजनीति में आए, तो अपने लाडले ओम प्रकाश चौटाला को सूबे की कमान दे दी। जब हो हंगामा मचा, तो बड़े तपाक के साथ कह दिया- जब लोहार का बेटा लोहार, सोनार का बेटा सोनार, किसान का बेटा किसान तो मुख्यमंत्री का बेटा मुख्यमंत्री क्यों नहीं हो सकता। क्या मासूम तर्क था! देवीलाल ने इस तर्क के साये में अपनी भ्रष्टता, वंशवाद और पुत्र मोह को ढंकने की कोशिश तो कर ली लेकिन शायद ही कोई होगा, जिसे देवीलाल के इस तर्क में तार्किकता नजर आई हो। आखिर किसान के दर्द और मुख्यमंत्री की रईसी में आकाश पाताल का फर्क होता है। देवीलाल वाकई सीधे सादे इंसान थे। वो गांव देहात की धूल धक्कड़ से निकलकर सियासी आसमान पर चमके थे। पुत्रमोह ने उन्हें वंशवाद का पोषक बना दिया लेकिन गांव वाली सादगी उन्हें सियासी धूर्तता से जोड़ नहीं पाती थी। दूसरे होते तो कहते कि नहीं, जनता ने ही मेरे बेटे या बेटी को सेवा करने के लिए भेजा है। हम तो जनता के जन्मजात सेवक हैं। यकीन ना हो तो कांग्रेस और भाजपा की तरफ देख लीजिए।&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;पूरा लेख यहाँ पढ़ें&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; ((&lt;a href="http://alaaw.blogspot.com/2007/10/blog-post.html"&gt;http://alaaw.blogspot.com/2007/10/blog-post.html&lt;/a&gt;))&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-2686440251911731759?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/2686440251911731759/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=2686440251911731759' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/2686440251911731759'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/2686440251911731759'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2007/10/blog-post.html' title='गांधी को इतना मत छलो'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-7725953681100636085</id><published>2007-07-10T01:28:00.000+05:30</published><updated>2007-07-10T02:06:46.793+05:30</updated><title type='text'>खामोश हुई संसद की सबसे मुखर आवाज</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;(चंद्रशेखर जी देश के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री बाद में थे, हमारे सांसद पहले थे। उन्होंने देश की राजनीति में अपने स्वभाव और विचारधारा के बूते लीक से हटकर जगह बनायी। उनके निधन के बाद बेशक राजनीति में एक शून्य पैदा हुआ, लेकिन राजनीति को बदलने का जो माद्दा उनमें था, उसका भरपूर इस्तेमाल उन्होंने नहीं किया। उनकी मृत्यु के बाद उनके राजनीतिक उत्कर्ष और गिरावट को रेखांकित करता पेश है &lt;span class=""&gt;हमारे साथी &lt;span style="color:#993300;"&gt;विचित्रमणि&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; का ये लेख।)&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;चंद्रशेखर जी ने अपनी जेल डायरी में लिखा है कि जुलाई का महीना उनकी जिंदगी में हमेशा नयापन लेकर आया। उसी महीने में गांव से बाहर पढ़ने के लिए गये, उसी महीने में सियासत की राह पर उनके मजबूत कदम बढ़े, उसी महीने में जिंदगी की नई अनुभूतियों से दो चार होना पडा। लेकिन नियति का खेल देखिए कि उसी जुलाई महीने में वो एक ऐसी यात्रा पर निकल पडे, जिसका कोई आदि-अंत नहीं है। हर जन्म की सरहद मौत से मिलती है। चंद्रशेखर ने भी अस्सी साल की उम्र होते होते इस दुनिया को राम राम कह दिया। और जाते जाते छोड़ गये वो सवाल, जो संसद से लेकर सड़क तक हर मंच पर वो हुक्मरानों से पूछते रहे। पीछे छोड़ गये वो यादें, जिनमें गरीबी और बेबसी से मोर्चा लेती जन्मजात विद्रोही वाली उनकी छवि बैठी है। पीछे छोड़ गये वो संकल्प, जो याद दिलाता है कि सत्ता ही सब कुछ नहीं होती। बल्कि सत्ता के गलियारों के बीच सिद्धांतों और मूल्यों की कीमत कहीं ज्यादा होती है। ये दूसरी बात है कि सत्ता की गूंज में सिद्धांतों की आवाज अक्सर दब जाती है।&lt;br /&gt;पिछले ढाई साल से चंद्रशेखर बीमार चल रहे थे और बीमारी भी ऐसी वैसी नहीं, बल्कि शरीर के अंग अंग को तोड़ देने वाला असाध्य रोग कैंसर। उस कष्ट और पीड़ा से जितनी निश्छल मुक्ति मौत दिला सकती थी, उतनी और कोई दवा नहीं। चंद्रशेखर जी तो मुक्त हो गये लेकिन समाज के आखिरी आदमी की जो आवाज वो उठाते रहे, वो अब कौन उठाएगा। जिस विपदा और वेदना की चक्की में देश का किसान और खेतिहर मजदूर समाज पिसता रहा, उस समाज को अन्याय से कौन मुक्ति दिलाएगा। ये कोई अरण्यरोदन नहीं है और ना ही मृत्यु के बाद लिखा गया महज एक श्रद्धांजलि लेख। ये उन सवालों से टकराने की कोशिश है, जो चंद्रशेखर के जाने के बाद पैदा हुए शून्य से उपजे हैं।&lt;br /&gt;बेहद सामान्य परिवार में पैदा हुए चंद्रशेखर का बचपन अभाव में गुजरा था। जवानी उस अभाव की बेचैनी को पूरे समाज के कैनवास पर ढालने में गुजरी और उसी संघर्ष, द्वंद्व और जद्दोजहद के बीच से निकला वो चंद्रशेखर, जो समाजवादी समाज बनाने का सपना देखता था। ३५ साल की उम्र में संसद की दहलीज पर पहली बार कदम रखने वाले उस चंद्रशेखर में ठेठ देसी दृढ़ता थी, समाजवादी आंदोलन के शिखर पुरुष आचार्य नरेंद्र देव का शिष्यत्व था, गांधी की मान्यताओं से पैदा हुई गहरी दृढ़ता थी और अन्याय के खिलाफ मोर्चाबंदी के लिए मार्क्स जैसी तीखी चिंतन शैली। उसी भरोसे के बूते चंद्रशेखर ने चीन युद्ध के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु को राज्यसभा में कटघरे में खड़ा कर दिया। संघर्ष से पैदा हुए साहस का ही नतीजा था कि कांग्रेस में शामिल होने के बावजूद चंद्रशेखर कभी कांग्रेसी नहीं बन पाए। कांग्रेसी यानी जो आलाकमान कहे, वो सर माथे पर रखने वाली मानसिकता। बैंकों के राष्ट्रीयकरण से लेकर राजा महाराजाओं को दी जाने वाली सुविधाएं खत्म करने तक हर समाजवादी फैसले पर इंदिरा गांधी का साथ दिया लेकिन जब गरीबी हटाओ का नारा देकर सत्ता में लौटीं इंदिरा गांधी ने अपने वादों को भुला दिया तो चंद्रशेखर आदि विद्रोही भाव से अपने समय की सबसे शक्तिशाली नेता के सामने चट्टान की तरह खडे हो गये। उस सबसे ताकतवर महिला के खिलाफ, जिसे किसी ने दुर्गा बताया तो किसी ने भारत का पर्यायवाची। ये वो दौर था, जब चंद्रशेखर चाहते तो उनका एक बयान उन्हें इंदिरा गांधी सरकार में माननीय कैबिनेट मंत्री बना सकता था। लेकिन आपातकाल के साये में जब लोकतंत्र पर ही ग्रहण लगा तो चंद्रशेखर के पास दो विकल्प थे। या तो वे इंदिरा गांधी की जयजयकार करके सत्ता का सुख भोगते या फिर लोकशाही की हिफाजत के लिए जेल जाते। चंद्रशेखर ने दूसरा रास्ता चुना। १९ महीने के लिए उनकी ही पार्टी की सरकार ने उन्हें जेल में डाल दिया। और यही से उस चंद्रशेखर का जन्म हुआ, जो अपने सैद्धांतिक मान्यताओं और आचरण में आजादी के आंदोलन के तपे तपाए नेताओं पर भी भारी पड़ता था। जिसके बारे में ये धारणा लोगों के जेहन में बैठ गयी कि चंद्रशेखर जी के लिए तो किसी पद का महत्व उनके चप्पल के टूटे धागे से ज्यादा नहीं है।&lt;br /&gt;लोगों के जुड़ने की उसी कड़ी में जब १९८३ में उन्होंने अपने पैरों से पूरे देश को नाप दिया, तब लोगों को ये आस बंधी कि राजनीतिक अंधेरे के बीच एक नेता ऐसा है, जो उम्मीदों का चिराग जलाए घूम रहा है। चंद्रशेखर भी बेहद आशान्वित थे। जन समर्थन और लोगों के प्यार के उसी प्रवाह में वे कह गये कि प्रधानमंत्री पद के वे सबसे योग्य उम्मीदवार हैं और भारत को वे इंदिरा गांधी या किसी दूसरे नेता से कहीं ज्यादा बेहतर समझते हैं। लेकिन डेढ़ साल बीतते बीतते जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद लोकसभा के चुनाव हुए तो चक्र बीच हल लिए हुए उनका किसान दम तोड़ चुका था। पार्टी तो बुरी तरह हारी ही, खुद चंद्रशेखर भी बलिया से चुनाव हार गये।&lt;br /&gt;उस करारी हार के बाद ही चंद्रशेखर की राजनीति में निर्णायक मोड़ आया। हमेशा सिद्धांतों के ऊंचे टीले पर खड़े रहने वाले चंद्रशेखर जोड़ तोड़ की राजनीति के कीचड़ में फंसने लगे। उस कीचड़ में ही प्रधानमंत्री पद का एक कमल उनकी जिंदगी में चार महीने के लिए खिला। लेकिन सत्ता के शिखर पर पहुंचने के लिए चंद्रशेखर ने अपनी उच्च राजनीति को रसातल में मिला दिया। चंद्रशेखर जल्द ही पूर्व प्रधानमंत्री कहलाने लगे। एसपीजी सुरक्षा का तामझाम मिल गया। जनता का नेता अब नेताओं का नेता हो गया। आम लोगों से उनकी दूरी बढ़ती गयी और संसद में कभी कभार भाषण देने तक ही उनकी राजनीति सिमट कर रह गयी। दिल्ली के रेशमी माहौल में वो चंद्रशेखर गुम गया, जो गांव देहात और उसकी खारी खट्टी मिट्टी से जुड़ा था। इसीलिए उनके अंतिम संस्कार में ज्यादातर नेताओं और कमतर आम लोगों की मौजूदगी ही बता गयी कि वो चंद्रशेखर अभी मरे नहीं हैं, जिन्हें इस देश की उपेक्षित-वंचित जनता अपना नेता मानती रही है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लेखक- &lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;em&gt;विचित्रमणि&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-7725953681100636085?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/7725953681100636085/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=7725953681100636085' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/7725953681100636085'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/7725953681100636085'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2007/07/blog-post_09.html' title='खामोश हुई संसद की सबसे मुखर आवाज'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-6847519451495423078</id><published>2007-07-07T01:15:00.000+05:30</published><updated>2007-07-07T17:18:08.751+05:30</updated><title type='text'>देश को बीमार बनाती सरकार</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;em&gt;देश के दो क्षेत्र सबसे अधिक उपेक्षित रहे हैं। पहला शिक्षा और दूसरा स्वास्थ्य। हर साल न जाने कितने लोग धीमे धीमे मौत की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। खराब सेहत और इलाज नहीं मिलने से। लेकिन सत्ता में बैठे लोगों का हाल ये है कि उन्हें आम लोगों की सेहत को लेकर कोई फिक्र नहीं। वैसे भी हमारे देश के हुक्मरान आम जनता के ख्याल से नीतियां नहीं बनाते बल्कि चंद खास लोगों को ध्यान में रख कर काम करते हैं।  स्वास्थ्य सेवा को लेकर सरकारी उदासीनता पर हमारे साथी &lt;span style="color:#660000;"&gt;विचित्रमणि &lt;/span&gt;ने नई रोशनी डाली है।&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डिजरायली ने कभी कहा था कि झूठ तीन तरह के होते हैं- एक सामान्य झूठ, दूसरा सफेद झूठ और तीसरा सांख्यिकी। इसलिए दुनिया की एक महाशक्ति बनने को उतावले या मरे जा रहे इस देश में बीमारी की मार से दुर्बल होते लोगों की संख्या पर बात करनी बेमानी है। सरकारी आंकड़े तो सरकार की सुविधा के हिसाब से होते हैं और दूसरे आंकडों को सरकार मानती नहीं। इसलिए इस देश में स्वास्थ्य के तीखे सवालों का जवाब आंकडों के आधार पर नहीं, बल्कि अनुभव की बिनाह पर खोजे जाने चाहिए। कंप्यूटर पर इस लेख को पढते हुए आप अपने जेहन को खंगाल लीजिए कि अगर मोटी रकम खर्च करने को आप तैयार ना हुए हों तो सुविधा से अपनी या किसी अपने की इसी अस्पताल में आप ठीक ठाक इलाज करा पाए हों। नहीं ना।&lt;br /&gt;इस सिलसिले में कुछ समय पहले एक जाने माने सर्वे संस्था ने आम लोगों से ये जानने की कोशिश की थी कि देश में स्वास्थ्य सेवा की हालत कैसी है। आपको यकीन नहीं होगा कि लोगों ने पुलिस के बाद सबसे ज्यादा भ्रष्ट स्वास्थ्य से जुड़े कर्मचारियों और डॉक्टरों को बताया। उसमें भी डॉक्टरों के बारे में पूछा गया तो ७७ फीसदी लोगों ने माना कि डॉक्टर बेहद भ्रष्ट और संवेदनहीन हो गये हैं जबकि मेडिकल स्टाफ के बारे में ६७ फीसदी लोगों की राय थी कि वो रोगियों का खयाल नहीं रखते।&lt;br /&gt;यकीकन आप भी इससे पूरा इत्तफाक रखते होंगे कि जिस डॉक्टर को आप भगवान के बराबर मानते हैं, वो आपको इंसान भी नहीं समझते। लेकिन सच पूछिए तो क्या देश को बीमार बनाने या बीमार देश को इलाज दे पाने की नाकामी का ठीकरा सिर्फ डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफों के सिर पर ही फोड़ा जा सकता है। बिल्कुल नहीं, क्योंकि आपके सपनों की सरकार भी आपके स्वास्थ्य को लेकर थोडा भी संवेदनशील नहीं है। अगर होती तो महान मनमोहन सिंह के अतिमहान वित्त मंत्री पी चिदंबरम के बजट में स्वास्थ्य और खासकर ग्रामीण और पिछड़े इलाकों की हालत पर फोकस किया गया होता। लेकिन ऐसा था नहीं। हर भारतीय पर स्वास्थ्य के लिए सालाना करीब १०५० रुपये खर्च किये जाते हैं लेकिन उनमें सरकार की हिस्सेदारी महज १८४ रूपये है। यानी करीब साढ़े सत्रह फीसदी। सरकार के इस योगदान के औसत में आम आदमी की हिस्सेदारी इसलिए कम हो जाती है कि तमाम वीवीआईपी और वीआईपी के इलाज का खर्चा भी इसमें जुडा हुआ है। जिस तरह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जीडीपी और ग्रोथ की बोली बोलते हैं, उस लिहाज से भी टोटल मिलाएंगे तो आप पाएंगे कि स्वास्थ्य पर सरकार कुल सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का एक फीसदी से भी कम खर्चा करती है।&lt;br /&gt;कई बार इच्छा होती है कि आपके प्रधानमंत्री की मीठी बातों पर यकीन कर लिया जाए लेकिन क्या करें। जमीनी सच्चाई ही बेचारे मनमोहन सिंह के झूठे सच की चुगली कर देते हैं। यही मनमोहन सिंह जब वित्तमंत्री बने तो स्वास्थ्य सेवाओं में भारी कटौती शुरु हुई और आज आलम ये है कि जिन ग्रामीण इलाकों में ७० फीसदी लोग वास करते हैं वहां सरकारी स्वास्थ्य सेवा का सिर्फ २५ फीसदी हिस्सा पहुंचा है। उन सत्तर फीसदी लोगों में से भी ८३ फीसदी लोगों को टूटे फूटे अस्पतालों में भी इलाज कराना नसीब नहीं होता। नतीजा ये होता है कि नीम हकीम या ओझाओं के चक्कर में पड़कर लोग बेमौत मारे जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक सालाना एक लाख ३७ हजार महिलाएं प्रसव के दौरान दम तोड़ देती हैं। ये हालत भी छोटे मोटे रोगों को लेकर है। कैंसर जैसे लोगों के इलाज के बारे में सोचना भी वहां पाप है। जहां बीमारी गरीब का गला दबाती है, वहां दैव योग को निहारने के सिवाय चारा भी क्या बचता है।&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि सरकार गरीबों की सेहत को लेकर फिक्रमंद नहीं दिखती। बिल्कुल दिखती है। उसी का नतीजा है कि बेबस, लाचार लोगों के इलाज के नाम पर बड़े बड़े निजी अस्पतालों को सरकार कौडियों के भाव करोडों की कीमत की जमीन दे देती है। लेकिन उन अस्पतालों में किसी गरीब का नहीं बल्कि लक्ष्मीपुत्रों का इलाज होता है। ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं, जब प्राइवेट अस्पतालों ने मोटी रकम के लिए लाश तक को अपने कब्जे में कर लिया है। उन खबरों को पढ़कर आप जरूर व्यग्र हो जाते होंगे लेकिन वो नहीं होते, जिन्हें चुनकर आपने संसद और विधानसभा तक भेजा है।&lt;br /&gt;ऐसे ही माहौल में याद आते हैं वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज। मनमोहन सिंह से तुलना कीजिएगा तो विद्वता और अर्थशास्त्र के ज्ञान के मामले में चावेज कहीं नहीं टिकते। लेकिन उस चावेज ने पहले तो आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक का सारा कर्जा चुकाया और फिर ऐलान कर दिया कि आर्थिक दासता में फांसने वाले और अमेरिका के इशारे पर चलने वाले आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक से वो कभी कर्ज नहीं लेंगे। और अब उसी चावेज ने अपने देश के प्राइवेट अस्पतालों को दो टूक कह दिया है कि अगर आम आदमी के इलाज में कोई भी एं-बें हुआ तो उन बैंकों का राष्ट्रीयकरण करते उन्हें देर नहीं लगेगी। लेकिन ऐसा लगता नहीं कि चावेज से मनमोहन कभी प्रेरणा लेंगे। ले भी कैसे सकते हैं। मनमोहन सिंह की आत्मा पर वर्ल्ड बैंक की पुरानी नौकरी और सोनिया गांधी के प्रति दासत्व का बोझ है, जबकि चावेज की नजरों में समाजवाद का सपना पल रहा है। उस समाजवाद का, जो सिर्फ आखिरी आदमी की लड़ाई ही नहीं लड़ता, बल्कि दुनिया के दादा बने फिरने वाले अमेरिका की आंखों में आंखें डालकर बात करता है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;लेखक- &lt;span style="color:#009900;"&gt;विचित्रमणि&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-6847519451495423078?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/6847519451495423078/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=6847519451495423078' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/6847519451495423078'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/6847519451495423078'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2007/07/blog-post_06.html' title='देश को बीमार बनाती सरकार'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-7816763514916760856</id><published>2007-07-06T02:38:00.000+05:30</published><updated>2008-12-09T23:56:18.211+05:30</updated><title type='text'>खेती के लिए कर्ज या कर्ज की खेती?</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;em&gt;((एमटीएनएल ने धोखा दे दिया, ब्रॉडबैंड ठप हो गया और तीन दिन तक मैं ब्लॉग की दुनिया से अछूता रहा। इसलिए साथी &lt;span style="color:#660000;"&gt;मणीष &lt;/span&gt;के लेख (&lt;a href="http://chaukhamba.blogspot.com/2007/07/blog-post.html"&gt;किसानों के खून से काली कमाई&lt;/a&gt;) का अगला हिस्सा पोस्ट करने में थोड़ी देर हो गई। इस हिस्से में &lt;span style="color:#660000;"&gt;मणीष &lt;/span&gt;ने उदाहरण के साथ समझाया है कि कैसे दलालों की मदद से सरकारी बैंकों के घूसखोर अफसर किसानों का खून चूस रहे हैं। ये एक ऐसा जाल है जिसमें जो भी फंसता है और फंसता चला जाता है।))&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Ro1eLvUU58I/AAAAAAAAAK4/QTwSHMhuVc0/s1600-h/farmers_suicide.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5083823110144452546" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Ro1eLvUU58I/AAAAAAAAAK4/QTwSHMhuVc0/s200/farmers_suicide.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;कृषि&lt;/span&gt; में फेस्टिव सीजन के अकाल को जानने के लिए एक वैसा ही उदाहरण देते हैं जिसकी थोड़ी चर्चा पिछले लेख में की गई थी। भारत में ट्रैक्टर का कारोबार। ट्रैक्टर के कारोबार से जिस कदर काली कमाई होती है वो हैरान कर देती है।&lt;br /&gt;भारत में ट्रैक्टर बनाने वाली 14 कंपनियां हैं। इनमें देसी के साथ विदेशी भी शामिल हैं। देश में जो सबसे कम दाम का ट्रैक्टर मिलता है वो देसी तकनीक से बना बेहद छोटी श्रेणी का ट्रैक्टर “अंगद” है। इसकी कीमत एक लाख रुपये के करीब है। मगर इसकी बिक्री बेहद कम होती है। ऐसा इसलिए कि ये ट्रैक्टर यहां के आम किसानों की जरूरत के हिसाब से बेहद छोटा है। ये चर्चा पहले ही की जा चुकी है कि किसानों के लिए सबसे मुफीद ट्रैक्टर 35-40 हॉर्स पॉवर की श्रेणी के होते हैं। बाजार में इनकी कीमत इस आधार पर तय होती है कि आप नकद खरीदेंगे या फिर कर्ज लेकर। नकद और कर्ज की खरीद में 70 हजार से लेकर एक लाख रुपये का अंतर होता है। यानी अगर आप 35-40 हॉर्स पॉवर का ट्रैक्टर नकद खरीदेंगे तो उसकी कीमत तीन से सवा तीन लाख रुपये होगी। लेकिन कर्ज लेकर खरीदने पर आपको चार से सवा चार लाख रुपये चुकाने होंगे।&lt;br /&gt;दाम में यह फर्क क्यों? इस फर्क से ट्रैक्टर की गुणवत्ता में कोई अंतर नहीं आता है। उसकी यह कीमत कर्ज की कीमत के तौर पर वसूली जाती है, गुणवत्ता में बढ़ोत्तरी के लिए नहीं। यहां आप कहेंगे कि कर्ज की कीमत तो उस पर वसूला जाने वाला ब्याज होता है, फिर यह कौन सी कीमत है? आपको बताएं कि यह कीमत उन लोगों के द्वारा ब्याज के अतिरिक्त वसूली जाती है, जो किसानों को कर्ज देते और दिलवाते हैं।&lt;br /&gt;दरअसल कर्ज लेने की शुरुआत ट्रैक्टर कंपनी का दलाल करता है। उसकी बैंकों से सांठगांठ होती है। इस दलाल का काम ट्रैक्टर कंपनी के लिए ग्राहक ढूंढ कर उसके लिए बैंक से कर्ज की व्यवस्था करवाना होता है। यह बेहद जटिल और उल्टी प्रक्रिया है। मसलन अगर आपको कार खरीदनी हो तो सबसे पहले आप कार की कंपनी और उसके मॉडल को चुनते हैं। फिर डीलर के पास जाकर अपनी जमा पूंजी बताते हैं। जो रकम बच जाती है उसके लिए ऐसा बैंक तलाशते हैं जो सबसे कम ब्याज दर पर कर्ज मुहैया कराए। ऐसा अक्सर होता है कि कार कंपनी का डीलर ही अपने किसी विशेष ऑफर के तहत बैंक से आपके लिए न्यूनतम दर पर कर्ज की व्यवस्था करवा दे। पर भारत में ट्रैक्टर की बिक्री ऐसे नहीं होती।&lt;br /&gt;इस सौदे में होता यह है कि ट्रैक्टर कंपनी के दलाल किसानों को बताते हैं कि वो किस बैंक से कितने कर्ज की व्यवस्था करवाएगा। ट्रैक्टर कंपनी के दलाल की इलाके के जिस बैंक के अधिकारियों से गहरी सांठगांठ होती है वह उस बैंक से कर्ज की व्यवस्था ज्यादा आसनी से करवा देता है। इस प्रक्रिया में किसानों के पास से चुनने की वह आजादी जाती रहती है जो कार खरीदते समय हम और आप जैसे शहरी ग्राहकों के पास होती है। उसे उसी कंपनी का ट्रैक्टर खरीदना पड़ता है जिस कंपनी का दलाल उसके लिए कर्ज का बंदोबस्त करता है।&lt;br /&gt;बात तय हो जाने पर किसान के साथ वह दलाल बैंक पहुंचता है। अधिकारियों और किसान की मुलाकात होती है और मोटे तौर पर किसान को यह बता दिया जाता है चार लाख ट्रैक्टर के साथ आपको तीन और कृषि उपकरण भी लेने होंगे। ऐसा इसलिए कि ट्रैक्टर अपने आप में कोई उत्पादक वाहन नहीं होता। वह किसी अन्य उपकरण के साथ ही उपयोगी होता है जैसे ट्रेलर, कल्टिवेटर, थ्रेसर वगैरह वगैरह। भारत सरकार की यह नीतिगत मान्यता है कि बिना तीन यंत्र के कोई भी किसान ट्रैक्टर से इतनी आमदनी नहीं कर सकता कि कर्ज को ब्याज समेत चुकता कर दे। यहां यह भी याद रखिये कि कर्ज के एवज में ट्रैक्टर व अन्य उपकरण समेत छह से सात एकड़ सिंचाई योग्य जमीन भी गिरवी रख ली जाती है। ऐसी जमीन जिसकी बाजार में कीमत कम से कम 12-15 लाख रुपये होती है।&lt;br /&gt;किसानों की बेबसी का अंदाजा इसी से लगाइये कि अगर वो तीन अतिरिक्त उपकरण बाजार से खरीदना चाहे तो उसे ऐसा करने नहीं दिया जाता। दलाल और बैंक अधिकारी ही यह तय करते हैं कि जो उपकरण खरीदे जाने हैं वो कहां से खरीदे जाएंगे और उनकी कीमत क्या होगी। इसकी एक बड़ी वजह है। खुले बाजार में अगर तीनों उपकरण (ट्रेलर-35 हजार, कल्टिवेटर – 10 हजार और थ्रेसर – 35 हजार रुपये) खरीदे जाएं तो उनकी कीमत 80 हजार रुपये के करीब बैठेगी। वहीं बैंक अधिकारियों और दलाल के दबाव में किसान उन उपकरणों के लिए 1 लाख 25 हजार रुपये (ट्रेलर 55 हजार, कल्टिवेटर 15 हजार और थ्रेसर 55 हजार) चुकाता है। इस प्रकार किसान से ट्रैक्टर के लिए 70 हजार ज्यादा (नकद की तुलना में) और तीन उपकरणों के लिए 50 हजार रुपये ज्यादा वसूले जाते हैं।&lt;br /&gt;ऐसा नहीं करने पर किसान को कर्ज नहीं मिलता। चूंकि कर्ज मंजूर करना बैंक अधिकारियों का विवेकाधिकार होता है, इसलिए एक सचेत और पढ़ा लिखा किसान भी कुछ नहीं कर सकता। उसे यह भी नहीं बताया जाता है कि कर्ज नहीं देने के क्या कारण हैं। जनता की जमा पूंजी पर ये बैंक अधिकारी ऐसे नागकुंडली मार कर बैठे हैं, जैसे ये उनका खानदानी अर्जित धन हो।&lt;br /&gt;इस गोरखधंधे के बाद शुरू होता है काली कमाई का बंटरबांट। ट्रैक्टर कंपनी और उपकरण निर्माता कंपनी की तरफ से कोट की गई रकम का भुगतान बैंक की तरफ से ड्राफ्ट के जरिये कर दिया जाता है। अधिकारी इसका पूरा ख्याल रखते हैं कि कागजी कार्रवाई में कोई चूक नहीं हो जाए। यही वजह है कि ज्यादातर लोगों को कागजात पर नजर डालने के बाद कुछ भी गलत नहीं लगता। लेकिन कागजी काम पुख्ता करने के तुरंत बाद दलाल ट्रैक्टर कंपनी के डीलर से अतिरिक्त 70 हजार रुपये और उपकरण निर्माता कंपनी से अतिरिक्त 50 हजार रुपये नकद वसूल लाता है। यह सब पिछले दरवाजे से होता है। वसूली गई रकम में से बैंक के अधिकारी अपने हिस्से का 30-40 हजार रुपये वसूल लेते हैं। यह न्यूनतम राशि होती है, अधिकांश समय यह राशि इससे ज्यादा ही होती है। बचे हुए पैसे नीचे पटवारी से लेकर ऊपर जमीन के जिलापंजीयक (रजिस्ट्रार) के बीच बंटते हैं। पटवारी बैंक को गिरवी रखी जमीन की उपज का ब्योरा सत्यापित (अटेस्ट) करके देता है और पंजीयक (रजिस्ट्रार) जमीन को गिरवी रखने संबंधित काम निपटाता है। हम सब जानते हैं कि इस देश में जिस तरह भ्रष्टाचार फैला हुआ है उसमें इनमें से किसी से भी मुफ्त में काम करने की उम्मीद बेमानी है। आखिर में पांच से दस हजार रुपये दलाल के हाथ लगते हैं।&lt;br /&gt;यह जानिये कि इस देश में सालाना 4 लाख ट्रैक्टरों की बिक्री होती है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा उत्तर भारत के मैदानी इलाकों का होता है। यही नहीं 90 फीसदी से ज्यादा ट्रैक्टरों की बिक्री बैंकों के कर्ज पर आधारित है। यानी कर्ज लेकर खरीदे गए ट्रैक्टरों की संख्या 3.6 लाख सालाना से ज्यादा होती है। कुछ मामलों को अपवाद मान कर छोड़ भी दें तो भी 3 लाख ट्रैक्टरों की बिक्री के मामले में पैसे की उगाही दलालों के जरिये ही की जाती है।&lt;br /&gt;अब आप इसका गणित देखें। कम से कम एक लाख (ऊपर के हिसाब से 1 लाख 20 हजार रुपये दिखाई गई है) की दर से सालाना तीन लाख ट्रैक्टर के लिए वसूली गई अतिरिक्त व बेजा राशि तीन हजार करोड़ रुपये बैठती है। प्रति वर्ष यह राशि चुकाता है यहां का किसान। इसमें शामिल है वह रकम जो 30 हजार रुपये (कम से कम) प्रति ट्रैक्टर की दर से बैंक अधिकारियों की जेब में जाता है। यानी 900 करोड़ रुपया। आपको मालूम हो कि भारत में कार्यरत लगभग 260 बैंकों में से 90 प्रतिशत का सालाना लाभ इस रकम तक नहीं पहुंचता।&lt;br /&gt;सरकार कहती है कि वह बैंकों के माध्यम से किसानों को कर्ज उपलब्ध कराने को प्रतिबद्ध है। यानी मरीज को खून की उपलब्धता हमेशा रहेगी। क्या आपको लगता है कि खून के इस कारोबारी बाजार में मरीज के लिए कभी कोई फेस्टिव सीजन आएगा?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt; (जारी...) &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-7816763514916760856?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/7816763514916760856/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=7816763514916760856' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/7816763514916760856'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/7816763514916760856'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2007/07/blog-post_05.html' title='खेती के लिए कर्ज या कर्ज की खेती?'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Ro1eLvUU58I/AAAAAAAAAK4/QTwSHMhuVc0/s72-c/farmers_suicide.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-5229239282820422874</id><published>2007-07-03T20:19:00.000+05:30</published><updated>2007-07-03T20:51:12.032+05:30</updated><title type='text'>किसानों के खून से काली कमाई</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;em&gt;((हमारे साथी और बैंक में मैनेजर &lt;font color="#660000"&gt;मणीष&lt;/font&gt; ने एक वादा किया और उसे निभाया भी। उन्होंने किसानों की हालत पर अपना नया लेख भेजा है। इस लेख को पढ़ कर मैं हैरान परेशान रह गया। किसानों के साथ नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के विश्वासघात से हम सब परिचित हैं। लेकिन हममें से बहुत कम जानते हैं कि कृषि कलपुर्जे बनाने कंपनियों और बैंकों के अफसर साजिश के तहत किसानों के खून पसीने से काली कमाई तैयार करते हैं। यह एक ऐसा जाल है जिसमें फंस कर किसान दम तोड़ता है, मगर टुकड़ों टुकड़ों में।)) &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;फेस्टिव सीजन के बारे में हम लोगों ने बहुत सुना है। आए दिन हर संभव माध्यम पर ये प्रचार आता रहता है कि खरीदारी के इस उत्सवी माहौल का फायदा उठाएं। यह उत्सवी माहौल दिवाली के कारण हो सकता है या फिर ईद के कारण। कभी दूर्गापूजा तो कभी क्रिसमस पर बाजार का फेस्टिव सीजन। कभी समर फेस्टिवल तो कभी मानसून हंगामा। सालभर हम और आप ऐसे उत्सवी माहौल में दिये जा रहे अभूतपूर्व छूट का फायदा उठाने के लिए ललचाए जाते हैं। और वे चीजें क्या होती हैं जिन पर ये छूट दी जाती है? कपड़े, खाने का सामान, रोजमर्रा की चीजें व व्यक्तिगत वाहन, मसलन कार, स्कूटर, मोटरसाइकिल। ये सब उपभोक्ता चीजें हैं। उत्पादकता से इनका संबंध नहीं होता है।&lt;br /&gt;पर कभी आपने ऐसा देखा है कि इस देश में जो सबसे बड़ा वर्ग खेतिहर लोगों का है उसके लिए कभी, कोई ऐसा फेस्टिव सीजन आता है? जिन चीजों की किसानों को जरूरत होती है उन पर कभी किसी प्रकार की छूट दी जाती है? खाद, बीज, ट्रैक्टर, पंपसेट आदि की खरीद पर दिये जाने वाले छूट के बारे में क्या आपने कभी कुछ भी सुना है? कोई तो वजह होगी कि खेती से संबंधित चीजों का धंधा कर रही कंपनियां ग्राहकों के लिए मारामारी नहीं करती हैं? आखिर छूट तो ग्राहकों को रिझाने की ही एक विद्या है। फिर ये विद्या खेती के कारोबार से जुड़ी कंपनियां क्यों नहीं आजमाती?&lt;br /&gt;ऐसा भी नहीं है कि कंपनियां इतने कम लाभ पर काम करती हैं कि छूट जैसी चीज का सवाल ही नहीं उठता। या किसी एक कंपनी का वर्चस्व है कि वह जिस दाम पर चाहे उस दाम पर चीजों को बेचे। जहां इंडोगल्फ, चंबल फर्टिलाइजर्स, हिंदुस्तान फर्टिलाइजर्स, फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन, पारादीप फास्फेट जैसी बड़ी कंपनियां और ढेरों छोटी कंपनियां रासायनिक खाद के बाजार में हैं वहीं पायोनियर, महिको, आदर्श सीड्स, पंतनगर, कारगिल जैसी बड़ी समेत सैकड़ों छोटी कंपनियां यहां के किसानों को बीज बेचने का धंधा कर रही हैं। ट्रैक्टर की 14 कंपनियां हैं तो पंपसेट की कम से कम दस। इसके अतिरिक्त उन छोटी इकाइयों की गिनती ही नहीं है जो अन्य कृषि यंत्र बनाती हैं। इन सारी कंपनियों के ग्राहक इस देश के किसान हैं।&lt;br /&gt;दरअसल इन कंपनियों के लिए मामला फायदे का नहीं है। फायदे को लेकर ये पूरी तरह बेफिक्र रहती हैं। ग्राहक वर्ग इतना बड़ा है कि उसमें हिस्सेदारी के लिए बेतरह मारामारी नहीं है। यहां बात आती है उस लूट की जिसमें ये सभी कंपनियां सहभागी होती हैं। इसी लूट से निकलता है ऐसा कालाधन, जिसमें यहां के किसानों का गाढ़ा खून शामिल होता है। यह किस्सा है एक ऐसी प्रक्रिया का जिसके तहत इस देश की कंपनियां और बैंक मिलकर उस क्षेत्र से धन की उगाही करते हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि वहां धन की बेहद कमी है। ये कुछ ऐसा है कि जिस कमजोर व्यक्ति को डॉक्टरों ने खून की जरूरत बताई है, खून चढ़ाने के बाद उस वयक्ति से ऐसी कीमत वसूली जाती है कि उसे अदा करने के लिए मजबूरी में उसे अपना दोगुना खून बेचना पड़ जाता है।&lt;br /&gt;पिछले एक लेख &lt;a href="http://chaukhamba.blogspot.com/2007/06/blog-post_17.html"&gt;अगली आहुति आपकी&lt;/a&gt; (चौखंबा, 17 जून, 2007) में मैंने इसकी चर्चा की थी कि भारत में खेती के क्षेत्र में बड़ी खरीदारी के लिए 99 फीसदी से अधिक किसान कर्ज पर आश्रित हैं। बड़ी खरीदारी से आशय ट्रैक्टर, थ्रेसर, ट्रेलर, पंपसेट जैसी चीजों से है। वो उपकरण जो उत्पादकता के लिए होते हैं ना कि उपभोग के लिए और जिनकी कीमत 50 हजार से लेकर 4-5 लाख रुपये तक होती है। यह जानिये कि जब ज्यादातार बाजार ऋण से संचालित होता है तो ग्राहकों के लिए मारामारी सामान बनाने वाली कंपनियों में नहीं, बल्कि कर्ज मुहैया कराने वाली कंपनियों के बीच होती है। उस पर जब कर्ज लेनेवाले एक खोजें हजार पाएं की तर्ज पर हों तो कर्ज देनेवालों की मनमानी चलती है। ऐसे में बुना जाता है वो जाल, जिसमें फंस कर किसानों को बेचना पड़ता है अपना लहू। उसी लहू से पैदा होती है वो लालिमा जो कंपनियों और बैंकों के लिए रंगीन फेस्टिव सीजन का निर्माण करती है। &lt;font color="#660000"&gt;(जारी...)&lt;/font&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-5229239282820422874?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/5229239282820422874/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=5229239282820422874' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/5229239282820422874'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/5229239282820422874'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2007/07/blog-post.html' title='किसानों के खून से काली कमाई'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-7908113323001407515</id><published>2007-06-29T17:50:00.000+05:30</published><updated>2008-12-09T23:56:19.514+05:30</updated><title type='text'>कोमा में भारतीय क्रिकेट</title><content type='html'>&lt;em&gt;&lt;strong&gt;हमारे साथी &lt;span style="color:#660000;"&gt;अभिषेक दुबे &lt;/span&gt;ने बड़ी तेजी से खेल पत्रकारिता में अपनी पहचान बनाई है। कई साल तक डेस्क पर काम करने के बाद जब उन्हें टीवी पर आने का मौका मिला तो वो पूरी तरह छा गए। क्रिकेट पर वो किताब लिख चुके हैं और उन्हें करीब से जानने वाले ये मानते हैं कि खेल को लेकर उनकी समझ और जानकारी ज्यादातर खेल पत्रकारों से बेहतर है। यही वजह है कि मैंने उनसे क्रिकेट के मौजूदा हालत पर कुछ लिखने की गुजारिश की। साथी अभिषेक ने मेरी गुजारिश कबूल कर ली। बीसीसीआई अध्यक्ष शरद पवार के नाम इस चिट्ठी से वो चौखंबा पर दस्तक दे रहे हैं। &lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#333333;"&gt;जरा सुनिये “केपीएस” पवार साहब, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoT9k_UU5yI/AAAAAAAAAJo/Ka_qQ1GYaQY/s1600-h/pawar+cartoon.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5081465091494569762" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoT9k_UU5yI/AAAAAAAAAJo/Ka_qQ1GYaQY/s400/pawar+cartoon.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;ये क्या हो रहा है? मरीज बीमार है और रिश्तेदार और मित्र बेहाल है। दो साल पहले तक यही शख्स जोश से भरा हुआ था। तंदरुस्त था। लंबी चौड़ी छलांगे लगाता था। दुश्मनों के छक्के छुड़ाता था और हर किसी को अपने अंदाज से दीवाना बना देता था। लेकिन जबसे इसे संभालने और सही दिशा देने की जिम्मेदारी आपके हाथ में गई है, इसकी हालत बिगड़ती ही जा रही है। पिछले तीन महीने में तो सेहत इतनी खराब हो गई है कि मरीज आईसीयू में पहुंच गया है। कोमा में है। लेकिन इसका इलाज कराने वाला कोई नहीं। आखिर ये हो क्या रहा है?&lt;br /&gt;पवार साहब, आप ये तो नहीं बोल सकते कि इस मरीज के इलाज के लिए आपके पास पैसे नहीं। भाई, आप भारतीय क्रिकेट नाम की जो दुकान चला रहे हैं, उसकी कमाई करोड़ों में नहीं अरबों में हैं। टीवी राइट्स से पैसा। स्पॉन्सरशिप से पैसा। दर्शकों से पैसा। न्यूट्रल मैदानों में एक के बाद एक मैच कराने से पैसा। आपके पास तो ऐसी मुर्गी है जो दनादन सोने का अंडा दे रही है। उसके अलावा आपके पास ललित मोदी जैसा शख्स भी है। जिनका बस चले तो मिट्टी को भी सोने के भाव बेच दें। फिर ऐसी क्या बात हो गई है कि मरीज का इलाज नहीं हो पा रहा?&lt;br /&gt;पवार साहब, आप ये भी नहीं कह सकते कि ये मरीज बाहर से भले ही तंदरुस्त दिखे लेकिन असल में शुरू से ही कमजोर था। आपके अध्यक्ष बनने से पहले, आज&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoUDIPUU54I/AAAAAAAAAKY/Uq1YLw070xI/s1600-h/vengsarkar.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5081471194643097474" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoUDIPUU54I/AAAAAAAAAKY/Uq1YLw070xI/s400/vengsarkar.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; का ये मरीज, एक दमदार नौजवान था। इसी ने वर्ल्ड कप 2003 में फाइनल तक का सफर तय किया। इसी ने ऑस्ट्रेलिया को उसकी मांद में जाकर चुनौती दी थी। इसी ने पहली बार पाकिस्तान को उसकी ही सरजमीं पर टेस्ट और वनडे में धूल चटाई। इसी ने इंग्लैंड और वेस्टइंडीज में जाकर सीरीज बराबर की। आज इसके जो हाथ पांव खराब पड़े हैं ... मैदान में उतरने के साथ ही कांपने लगते हैं ... कुछ दिनों पहले तक यही हाथ पांव एक झटके में दुश्मन को पटक देते थे। चंद दिनों में ही इतना कुछ बदल गया, आखिर कैसे?&lt;br /&gt;पवार साहब, आपको ये शिकायत करने का हक भी नहीं है कि आपको मनमुताबिक टीम इंडिया चुनने की आजादी नहीं मिली। सच तो ये है कि आप भले ही अध्यक्ष हैं भारतीय क्रिकेट बोर्ड के, लेकिन ऐसा लगता है कि आप महाराष्ट्र क्रिकेट बोर्ड चला रहे हैं। राजनीति में आप चाहकर भी महाराष्ट्र से बाहर पहचान नहीं बना &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoUEA_UU55I/AAAAAAAAAKg/XaQE-sEHDkU/s1600-h/niranjan+shah.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5081472169600673682" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoUEA_UU55I/AAAAAAAAAKg/XaQE-sEHDkU/s400/niranjan+shah.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;सके। वही हाल खेल में भी है। यहां भी आप महाराष्ट्र और पश्चिमी जोन के बाहर सोच नहीं पा रहे हैं। अगर भरोसा ना हो तो अपने सिपाहसलारों की सूची पर नजर दौड़ाएं। सीईओ रत्नाकर शेट्टी मुंबई के हैं तो उपाध्यक्ष और कांट्रैक्ट समिति के अध्यक्ष शशांक मनोहर नागपुर के रहने वाले। निरंजन शाह राजकोट के हैं तो मुख्य चयनकर्ता दिलीप वेंगसरकर मुंबई से। कोच की खोज समिति के तीन सदस्यों में से दो सुनील गावस्कर और रवि शास्त्री मुंबई से। बांग्लादेश दौरे के लिए मुंबई के रवि शास्त्री क्रिकेट मैनेजर बनाए गए तो ऑयरलैंड-इंग्लैंड दौरे के लिए पुणे के चंदू बोर्डे को क्रिकेट मैनेजर चुना गया। सवाल उठता है कि क्या देश के किसी और हिस्से में काबिल लोग हैं ही नहीं? आखिर माजरा क्या है?&lt;br /&gt;पवार साहब, बात निकली है तो दूर तक जाएगी ही। सौरव गांगुली ने भारतीय क्रिकेट को क्षेत्रवाद के चंगुल से निकाला था, लेकिन आपने इसे फिर से उसी दलदल में ढकेल दिया। आखिर&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoT_JvUU53I/AAAAAAAAAKQ/tvoDszjk9-E/s1600-h/Tendulkar-Cricket.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5081466822366390130" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoT_JvUU53I/AAAAAAAAAKQ/tvoDszjk9-E/s320/Tendulkar-Cricket.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; क्या सोच कर 34 साल के सचिन तेंदुलकर को अचानक टीम का उपकप्तान बना दिया गया? तेंदुलकर के जितने बड़े आप फैन हैं उससे शायद अधिक मैं हूं, लेकिन वर्ल्ड कप से ठीक पहले कप्तान द्रविड़ पर ये दबाव बनाना कि तेंदुलकर उनकी जगह ले सकते हैं कहां तक सही था? आखिर किस आधार पर वसीम जाफर को वनडे टीम में शामिल किया गया? कैसे राजेश पोवार बांग्लादेश में टेस्ट टीम में शामिल कर लिए गए? आखिर क्यों वीरेंद्र सहवाग के कोच ये आरोप लगाने को मजबूर हो रहे हैं कि पश्चिमी लॉबी ने सहवाग को खत्म करने के लिए युवराज सिंह का इस्तेमाल किया? चलिये एक मिनट के लिए मान लेते हैं कि वो अंधेरे में तीर चला रहे है, लेकिन आग के बिना धुआं कैसे उठ सकता है? ये तो आप भी मानेंगे की वर्ल्ड कप में पहले सहवाग को चुना गया। उसके बाद आपके मुख्य चयनकर्ता ने कहा कि कप्तान द्रविड़ के दबाव में सहवाग को चुना गया है। मान लिया कि आपने कभी गंभीर क्रिकेट नहीं खेला, लेकिन कर्नल वेंगसरकर तो खेल चुके हैं। कम से कम उन्हें तो ये अंदाजा होना चाहिए कि अहम मुकाबले से पहले किसी बल्लेबाज पर दबाव बनाना सही नहीं। फिर उनसे ये गलती कैसे हो गई?&lt;br /&gt;पवार साहब, आपके सिपाहसलार हर चीज के लिए मीडिया को दोषी बताते है। लेकिन वे अपनी गिरेबां में झांककर क्यों नहीं देखते। इसमें हमारी क्या गलती कि निंबस हो या फिर जी स्पोर्ट्स, पहले हर किसी से करार होता है और फिर करार फेल हो जाता है। इसमें मीडिया &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoT-2PUU52I/AAAAAAAAAKI/7soeD9Mz1pU/s1600-h/dravid+defeated.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5081466487358941026" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoT-2PUU52I/AAAAAAAAAKI/7soeD9Mz1pU/s400/dravid+defeated.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;कि क्या गलती कि कांट्रैक्ट मुद्दे को लेकर विवाद महीने चलता है और क्रिकेटरों को आठ महीने तक मैच फीस नहीं मिलती। चलिए, तेंदुलकर, द्रविड़, सौरव और धोनी विज्ञापन से मोटी कमाई करते हैं। लेकिन मुनाफ पटेल, पीयूष चावला, श्रीशांत और रोमेश पोवार जैसे क्रिकेटरों का क्या होगा जो नए हैं और मैच फीस पर ही निर्भर हैं। प्रसारण अधिकार का मसला हो या फिर कोच और टीम के चयन का, टीम इंडिया के खेल की बात हो या फिर खिलाड़ियों से करार की- आप और आपके सिपहसालार हर मोर्चे पर नाकाम साबित हो रहे हैं। आखिर माजरा क्या है?&lt;br /&gt;पवार साहब, आपके मन में होगा कि काश, टीम इंडिया आयरलैंड और इंग्लैंड में अच्छा खेले जिससे कि विरोधियों की जुबां पर ताला लग जाए। मेरा भी दिल यही चाहता है, लेकिन दिमाग नहीं मानता। मौजूदा टीम इंडिया से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद करना भी गुनाह है। आखिर आपने किस तैयारी से भेजा इस टीम को। कांट्रैक्ट को लेकर क्रिकेटरों को अंतिम वक्त तक तनाव में रखा। अहम दौरे के लिए रवाना होने से पहले तक इस बात को लेकर सस्पेंस बरकरार रहा कि आखिर कोच कौन होगा। भारतीय क्रिकेट के चाणक्य गावस्कर ने एजेंडा चलाने के चक्कर में डेव व्हॉटमोर का पत्ता तो साफ कर दिया, लेकिन बदले में कोई विकल्प नहीं सुझाया। गावस्कर और उनके साथियों के रंगढंग देख कर ग्राहम फोर्ड को अंदाजा मिल गया कि बीसीसीआई सर्कस में &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoT-ZvUU50I/AAAAAAAAAJ4/jCk5cgqsCNc/s1600-h/gavasker.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5081465997732669250" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoT-ZvUU50I/AAAAAAAAAJ4/jCk5cgqsCNc/s320/gavasker.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;शामिल होकर काम करना कितना मुश्किल होगा, इसलिए उन्होंने भी इनकार कर दिया। भरी तिजोरी के बावजूद जब आप स्थायी कोच नहीं चुन सके, तो आपने 73 साल के चंदू बोर्डे को क्रिकेट मैनेजर बना दिया। आखिर ये क्या हो रहा है?&lt;br /&gt;पवार साहब, वर्ल्ड कप में हार के बाद खेलप्रेमियों का गुस्सा शांत करने के लिए आपने मुंबई में दो दिन बैठक की। लंबे चौड़े वादे किए। घरेलू क्रिकेट को बदल कर रख दूंगा। युवा टीमें तैयार होंगी। हर टीम को फीजियो और ट्रेनर दिया जाएगा। क्रिकेटरों के विज्ञापन पर लगाम लगेगी। प्रदर्शन के आधार पर क्रिकेटरों को पैसा मिलेगा। लेकिन धुर नेता की तरह चंद ही दिनों में सारे वादे भूल गए। जिस तरह से कृषि मंत्री के तौर पर आप किसानों के साथ विश्वासघात कर रहे हैं, ठीक उसी तरह बीसीसीआई अध्यक्ष के तौर पर खेलप्रेमियों को धोखा दे रहे हैं। आखिर ये कब तक चलेगा?&lt;br /&gt;पवार साहब, माना कि आपके हाथों में सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है, लेकिन ये मुर्गी ही मर गई, तो फिर आप और आपके सिपाहसलारों का क्या होगा? जिस तरह से आपके सिपाहसलार काम कर रहे हैं, &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoT-s_UU51I/AAAAAAAAAKA/_S_QPQbdSA4/s1600-h/shastri.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5081466328445151058" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoT-s_UU51I/AAAAAAAAAKA/_S_QPQbdSA4/s320/shastri.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;किसी भी दिन इस मुर्गी के मरने की खबर आ सकती है। अगर खेलप्रेमियों के लिए नहीं तो कम से कम अपने सिपाहसलारों के लिए तो इस मुर्गी को बचाईए। जड़ें खोदने का जो काम के पी एस गिल ने भारतीय हॉकी संघ के लिए किया वही काम आप भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के लिए कर रहे हैं। ऐसे में आपको केपीएस पवार कहना क्या गलत होगा? अगर बुरा लग रहा है तो गुस्ताखी माफ करें, लेकिन कहते हैं कि सच बहुत कड़वा होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भवदीय&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;अभिषेक दुबे&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-7908113323001407515?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/7908113323001407515/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=7908113323001407515' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/7908113323001407515'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/7908113323001407515'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2007/06/blog-post_29.html' title='कोमा में भारतीय क्रिकेट'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoT9k_UU5yI/AAAAAAAAAJo/Ka_qQ1GYaQY/s72-c/pawar+cartoon.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-1814817172340370052</id><published>2007-06-29T11:30:00.000+05:30</published><updated>2007-06-29T11:50:20.550+05:30</updated><title type='text'>"विकल्प नहीं है तो अनुकल्प से काम चलाइए"</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;em&gt;राष्ट्रपति पर चल रही बहस में साथी &lt;span style="color:#660000;"&gt;विचित्र मणि&lt;/span&gt; के लेख पर &lt;span style="color:#660000;"&gt;विप्लव भाई&lt;/span&gt; ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं। शुरू से ही धर्म और हिंसा की सियासत करने वाली पार्टी के नुमाइंदे को कैसे सही ठहराया जा सकता है ? जो पार्टी गुजरात में नरसंहार की जिम्मेदार है उसके नुमाइंदे को इस देश के सर्वोच्च पद पर कैसे बिठाया जा सकता है ? सवाल और भी हैं और अब साथी &lt;span style="color:#660000;"&gt;विचित्र मणि&lt;/span&gt; ने &lt;span style="color:#660000;"&gt;विप्लव भाई&lt;/span&gt; के सवालों पर अपना जवाब भेजा है। &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रिय विप्लव भाई,&lt;br /&gt;जिस समय मैं यह लेख लिख रहा था, यह बात मेरे मन में ये शंका थी कि अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण प्रस्तुत हो सकता है। बावजूद इसके लिखा तो इसलिए नहीं कि भैरों सिंह शेखावत भारतीय राजनीति और इतिहास के आदर्श पुरुष हैं। यह ठीक है कि हम दलीय राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा हैं और हमारे लोकतंत्र की वह एक अहम कड़ी है। लेकिन जब राष्ट्रपति के चुनाव का सवाल आता है, तो उसे दलीय जोड़ तोड़ से ऊपर रखकर आंकने की जरूरत होती है। राष्ट्रपति पद के लिए इस बार कांग्रेस की अगुवाई में जिस प्रतिभा पाटील को मैदान में उतारा गया है, उन प्रतिभा जी से तुलना करने पर शेखावत मीलों आगे नजर आते हैं।&lt;br /&gt;रही बात विचारधारा से दशकों तक जुड़े रहने की, तो विप्लव भाई, उदाहरण तो यही बताते हैं कि समता मूलक समाज बनाने वाले नाम की पार्टियों में भी कितने अच्छे लोग हैं। उंगली पर गिन कर देखिए, दोनो हाथों की उंगलियां ज्यादा पड़ जाएंगी। एक उदाहरण लीजिए। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी में अमर सिंह भी हैं। कल अगर तीसरा मोर्चा कहीं सेकुलरिज्म के नाम पर अमर सिंह को ही राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना देती तो क्या पार्टी की समाजवादी विचारधारा के नाम पर उनका समर्थन किया जा सकता था। फिर अमर सिंह की छोड़िये, जिनका कोई राजनीतिक दीन ईमान ही नहीं है। लोग कहते हैं, हालांकि मैं नहीं मानता, कि कम्युनिस्टों से ज्यादा विचारधारा और आदर्श से जुड़ा कोई नहीं होता। लेकिन पश्चिम बंगाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य जिस आदर्श का परिचय दे रहे हैं, उसे आप क्या कहेंगे। कहां चले जाते हैं सर्वहारा के सृजनहार। आखिर टाटा या सलेम ग्रुप के लिए बुद्धदेव से लेकर सीताराम येचुरी और प्रकाश करात तक क्यों किसान विरोधी भाषा समवेत स्वर में बोलने लगते हैं। गुजरात में मोदी ने बेगुनाह मुसलमानों को मरवाया, पश्चिम बंगाल में बुद्धदेव ने दीन हीन किसानों को। क्या फर्क है दोनो में। जरा बताइए। और हां, जो किसान मारे गये हैं ना पश्चिम बंगाल में, उनमें बहुतेरे मुसलमान भी हैं। जी हां, मुसलमान, जिनकी आड़ लेकर इस देश में बहुतों की सेकुलर दुकान चलती है। लेकिन साठ साल में मुसलमानों का भला कैसे हो, इसके बारे में मुकम्मल एजेंडा उनके पास नहीं है। और चलते चलते बात कांग्रेस की। पीछे मुड़कर देख लीजिए, कांग्रेस धर्म के नाम पर दंगों में अपनी साजिश की वजह से बेगुनाहों के खून से रंगी नजर आएगी। चाहे मेरठ का दंगा हो या भागलपुर का या फिर दिल्ली में सिख विरोधी दंगा। कांग्रेस हर जगह जल्लाद के कटघरे में खड़ी दिखेगी। इस तरह देखिए तो कांग्रेस, भाजपा, कम्युनिस्ट सभी एक ही चेहरे के अलग अलग क्लोन नजर आते हैं। बस नजरों का धोखा है कि हम उन्हें गलत मानते हैं।&lt;br /&gt;विप्लव भाई, देश की मौजूदा राजनीति से लोगों का मोह भंग हो चुका है। लोग चाहते हैं, एक नई राजनीति की शुरुआत हो। लेकिन जब तक ये प्रयास किसी अंजाम तक नहीं पहुंचता या यूं कहें कि कोई सार्थक विकल्प पेश नहीं होता, तब तक हमें छोटे छोटे अनुकल्पों से ही काम चलाना होगा। राष्ट्रपति पद के चुनाव में भैरों सिंह शेखावत फिलहाल वैसे ही एक अनुकल्प हैं।&lt;br /&gt;आपका विचित्र मणि&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-1814817172340370052?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/1814817172340370052/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=1814817172340370052' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/1814817172340370052'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/1814817172340370052'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2007/06/blog-post_4477.html' title='&quot;विकल्प नहीं है तो अनुकल्प से काम चलाइए&quot;'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-4861766215941942848</id><published>2007-06-29T01:08:00.000+05:30</published><updated>2007-06-29T01:16:18.424+05:30</updated><title type='text'>"सभी कुछ कम, कुछ ज्यादा खतरनाक हैं"</title><content type='html'>&lt;em&gt;&lt;strong&gt;चौखंबा पर राष्ट्रपति चुनाव को लेकर एक बहस चल रही है। इसकी शुरुआत साथी &lt;span style="color:#660000;"&gt;मणीष &lt;/span&gt;के लेख से हुई फिर साथी &lt;span style="color:#660000;"&gt;विचित्र मणि&lt;/span&gt; ने अपनी राय रखी। इन पर कई प्रतिक्रियाएं आईं। सबसे सटीक प्रतिक्रिया &lt;span style="color:#660000;"&gt;विप्लव भाई&lt;/span&gt; ने दी। उन्होंने कई गंभीर सवाल उठाए हैं। सवाल जो बहस को नई दिशा दे सकते हैं। उनकी इस प्रतिक्रिया को हम आपके सामने रख रहे हैं। इस उम्मीद में कि और लोग भी सामने आएंगे और एक सार्थक बहस होगी। &lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले राष्ट्रपति की पसंद-नापसंद पर अच्छी बहस चल रही है। लेकिन कुछ अ-राजनैतिक(apolitical) है। राजनीति के मैदान में किसी भी अहम किरदार की जगह उसकी राजनीतिक विचारधारा के बिना, या उसे अलग करके तय करना कितना सही है? इस कसौटी पर कलाम, प्रतिभा पाटिल और भैरों सिंह शेखावत - सभी कुछ कम, कुछ ज्यादा खतरनाक हैं। जनता के हित में, आम आदमी के हक में खड़ा होने का माद्दा इनमें से किसी में नहीं है। हो भी नहीं सकता है। इन सभी का विचारधारागत रुझान या उसका अभाव इसकी इजाज़त नहीं देता। इस लिहाज से बेशक के आर नारायणन आज़ाद हिंदुस्तान के सबसे बेहतर राष्ट्रपति लगते हैं। हालांकि उनके कार्यकाल ने बार-बार ये भी साबित किया कि राष्ट्रपति देश का सर्वोच्च पद है जरूर, लेकिन देश राजनीति में उसकी अहमित सिर्फ सांकेतिक ही है। और संसदीय ढंग के लोकतंत्र में ये गलत भी नहीं है। इस तरह से देखें, तो हमें वैसे ही राष्ट्रपति मिलते हैं, जैसी हमारी संसद और विधानसभाएं होती हैं। भ्रष्ट, अपराधी और जन विरोधी प्रतिनिधियों के समर्थन से सरकार बनाने वाले प्रधानमंत्री हों या उनके वोट से चुनकर आने वाले राष्ट्रपति, इनसे किसी क्रांतिकारी बदलाव या जनता के हक की आवाज बुलंद करने की उम्मीद करना शेखचिल्ली के सपने से कम नहीं। यहां साध्य और साधन के रिश्ते पर गांधी के विचार और वर्ग चरित्र पर मार्क्स का चिंतन, दोनों सटीक नजर आते हैं। एक बात और, "गलत खेमे में खड़ा सही आदमी" ये लेबल काफी अरसे तक अटल बिहारी वाजपेयी पर चिपकाया जाता रहा। कितना बेमतलब था ये लेबल, अब तक शायद साफ हो चुका है। अब इस लेबल को शेखावत पर चिपकाना, कुछ समझ नहीं आता। राजनीति के मैदान में, ना सिर्फ गलत खेमे में खड़ा, बल्कि बरसों उसकी पतवार थामने वाला, उसकी कमान अपने हाथ में रखने वाला कोई धुरंधर, सही कैसे हो सकता है? गुजरात में नरसंहार करने वाली जमात के प्रतिनिधि और अगुवा, देश के किसी भी सर्वोच्च पद पर बैठने के लायक कैसे समझे जा सकते हैं? नफरत की बुनियाद पर खड़ी विचारधारा को सीने से लगाए रखने वाले लोग, बड़े दिलवाले और उदार राजनेता कैसे हो सकते हैं? ये कुछ सवाल हैं, जिन पर सोचने की जरूरत है। फिलहाल इतना ही। हालांकि बात अभी अधूरी है। शायद ठीक से शुरू भी नहीं हो पाई है। लेकिन एक साथ लंबा लिखते जाना, कुछ एकालाप सा लगता है। ये विषय ऐसा है, जो संवाद मांगता है। विचारों का आदान-प्रदान मांगता है। इसलिए आगे की बात आगे होगी....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;em&gt;विप्लव&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-4861766215941942848?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/4861766215941942848/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=4861766215941942848' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/4861766215941942848'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/4861766215941942848'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2007/06/blog-post_28.html' title='&quot;सभी कुछ कम, कुछ ज्यादा खतरनाक हैं&quot;'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-8986094390094429042</id><published>2007-06-26T09:43:00.000+05:30</published><updated>2008-12-09T23:56:20.619+05:30</updated><title type='text'>राजनीति के दंगल में राष्ट्रपति</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoCVuxJtxhI/AAAAAAAAAIg/5fob8HRV_Jc/s1600-h/bal.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;div&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;राष्ट्रपति को लेकर उठापटक जारी है। सबसे चौंकाने वाली पलटी शिवसेना ने मारी है। मराठी अस्मिता का नारा देते हुए ठाकरे कांग्रेस की गोद में जा बैठे हैं। इससे प्रतिभा पाटील की दावेदारी और मजबूत हो गई हैं। ऐसे में सवाल यही है कि क्या इस देश को एक रीढ़विहीन प्रधानमंत्री के बाद एक वैसा ही राष्ट्रपति भी मिलेगा ? इसी अहम सवाल पर रोशनी डाल रहे हैं हमारे साथी &lt;span style="color:#990000;"&gt;विचित्र मणि&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;। &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoCWZRJtxjI/AAAAAAAAAIw/7oUFuPRA9Ss/s1600-h/bal.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5080225740518966834" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoCWZRJtxjI/AAAAAAAAAIw/7oUFuPRA9Ss/s320/bal.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;वही हुआ, जो होना था। पहले शक था, लेकिन एक झटके में उसके यकीन में बदलते देर नहीं लगी। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने दो टूक कह दिया कि राष्ट्रपति पद के चुनाव में वह भैरों सिंह शेखावत के साथ नहीं बल्कि प्रतिभा पाटील के पक्ष में खड़े हैं। शिवसेना के इस रवैये पर बीजेपी ने छाती कूटना शुरु किया कि ठाकरे ने तो पीठ में छूरा घोंपा है। ये तो विश्वासघात है। पता नहीं, बीजेपी को शिवसेना पर कितना विश्वास था लेकिन शिवसेना का इतिहास तो यही बताता है कि बड़ी ताकतों के आगे झुक जाना उसकी फितरत है। ठाकरे ने वही किया, जो उनसे अपेक्षित था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन राजनीति ऐसे ही मौकों पर दुर्गम इम्तिहान लेती है। 25 जून को निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उप राष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत ने राष्ट्रपति पद के लिए पर्चा दाखिल किया। और शाम होते होते &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoCWChJtxiI/AAAAAAAAAIo/26z2H_S5JqE/s1600-h/shekhawat.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5080225349676942882" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoCWChJtxiI/AAAAAAAAAIo/26z2H_S5JqE/s320/shekhawat.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;बाल ठाकरे ने कह दिया कि मराठा सम्मान के लिए वो पाटील को वोट देंगे, शेखावत को नहीं। दोनों घटनाएं जिस तारीख को हुईं, उसकी बड़ी अहमियत है। आखिर 32 साल पहले वो 25 जून की ही काली रात थी, जब सत्ता के नशे में चूर श्रीमति इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया था। तब जय प्रकाश नारायण समेत विपक्ष के तमाम नेता एक झटके में काल कोठऱी में ठूंस दिये गए। विपक्ष तो छोड़िये, कांग्रेस के कद्दावर नेता चंद्रशेखर को भी रातो रात गिरफ्तार कर लिया गया। जिसने भी इंदिराशाही के खिलाफ और लोकशाही के पक्ष में आवाज उठायी, उसकी नियति उसे सलाखों के पीछे ले गयी। शेखावत भी उन्हीं लोगों में से थे, जिन्होंने लोकतंत्र के पक्ष में जेल जाने का रास्ता चुना। लेकिन जानते हैं, हिंदू तन मन जीवन की बात करने वाले बाल ठाकरे ने क्या किया था? इंदिरा गांधी के आतंक और अपने स्वार्थ और सुविधा के लिए ठाकरे ने इंदिरा गांधी से माफी मांग ली थी और उस जमात में शामिल हो गये, जो जम्हूरियत का जनाजा निकालने में जुटा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;32 साल बाद इतिहास ने खुद को कमोबेश वैसे ही दुहराया। बल्कि और विद्रूप तरीके से। भले नाम मराठी अस्मिता का दिया गया हो लेकिन ठाकरे तो कांग्रेस की झोली में जा गिरे। और कांग्रेस ने क्या&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoCW3hJtxkI/AAAAAAAAAI4/3aSqza-KaBE/s1600-h/pratibhapatil2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5080226260210009666" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoCW3hJtxkI/AAAAAAAAAI4/3aSqza-KaBE/s400/pratibhapatil2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; किया। धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने वाली कांग्रेस को शिवसेना से वोट मांगने में हिचक नहीं हुई, जिसे वो सांप्रदायिक और देश की सबसे बड़ी सांप्रदायिक पार्टी मानती है। बीजेपी से भी ज्यादा। उस हाल में अगर प्रतिभा पाटील चुनाव जीत जाती हैं तो कांग्रेस शिवसेना की मदद का दाग कैसे धोएगी। लेकिन सच कहिये तो ये सवाल उठाना ही बेमानी है, क्योंकि ऐसे सवाल उनकी आत्मा को कचोटते हैं, जिनके लिए सिद्धांत हर हाल में स्वार्थों से बड़े होते हैं। उनके लिए नहीं, जिनकी सियासत की तराजू पर स्वार्थ और सुविधा का पलड़ा सिद्धातों पर भारी पड़ जाता है। कांग्रेस ने वही किया और पहली बार नहीं किया। और शिवसेना?  आज वह मराठा हित की बात करती है लेकिन पिछली बार उप राष्ट्रपति के चुनाव में उसका मराठा प्रेम कहां चला गया था, जब उसने सुशील कुमार शिंदे को वोट नहीं दिया था। जबकि शिंदे तो महाराष्ट्र से ही हैं। तो क्या ये माना जाए कि शिंदे का दलित होना ठाकरे को रास नहीं आया था या अवसरपरस्ती शिवसेना का मूल मंत्र है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो ये तो तय माना जा रहा है कि प्रतिभा पाटील ही अगली राष्ट्रपति होंगी क्योंकि वोटों का मौजूदा समीकरण साफ साफ उनके पक्ष में जाता है। यूपीए उनके साथ है, वामपंथियों को उनमें महिला सशक्तिकरण का आभास मिलता है और सेकुलर नीतियों की खुशबू, बहन मायावती को केंद्र से बनाकर रखना है, लिहाजा उनके लिए भी प्रतिभा ताई से बेहतर कोई और नहीं। और आखिरकार शिवसेना भी &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoCX6hJtxmI/AAAAAAAAAJI/EnSYWmfIrPY/s1600-h/Dr_Kalam.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoCY4RJtxoI/AAAAAAAAAJY/KxQQSVEIT9M/s1600-h/Dr_Kalam.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5080228472118167170" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoCY4RJtxoI/AAAAAAAAAJY/KxQQSVEIT9M/s320/Dr_Kalam.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;साथ खड़ी हो गयी। दूसरी तरफ निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में डटे शेखावत के पक्ष में पूरा एनडीए भी नहीं है। जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष शरद यादव तो साथ हैं लेकिन नीतीश को शेखावत रास नहीं आते। रही बात नवजात तीसरे मोर्चे की, तो उसमें भी कई अगर मगर हैं। धर्मनिरपेक्षता के बहाने कई पार्टियां शेखावत से दूर खड़ी हैं। बावजूद इसके शेखावत खम ठोंककर मैदान में डटे हैं। हो सकता है कि वो हार जाएं लेकिन कई बार हार का संघर्ष जीत की बधाइयों से ज्यादा सुहाना होता है। पिछले चुनाव को याद कीजिए। बीजेपी ने पहले तो तत्कालीन उप राष्ट्रपति कृष्णकांत को उम्मीदवार बनाने का ऐलान किया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तो फोन करते अपने जमाने के युवातुर्क को बधाई भी दे दी थी। लेकिन ऐन मौके पर बीजेपी ने पलटी मार दी और मैदान में ला खड़ा किया एपीजे अब्दुल कलाम को। क्या कांग्रेस, क्या समाजवादी पार्टी, सबने कलाम की जयजयकार शुरू कर दी। क्या इसकी वजह कलाम की योग्यता थी। बेशक कलाम जितने बड़े वैज्ञानिक हैं, कहीं उससे बड़े इंसान हैं। और याद रखिए, विद्वान मिल जाते हैं, इंसान नहीं मिलते। लेकिन राष्ट्रपति के तौर पर अपने कार्यों से जो अमिट छाप के आर नारायणन ने छोड़ी है, उस स्तर पर दूसरा कोई राष्ट्रपति नहीं टिकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो नारायणन ही थे, जो पहली बार कतार में खड़ा होकर आम लोगों की तरह वोट डालने पहुंचे थे और इस मिथक को तोड़ा था कि राष्ट्रपति वोट नहीं डालता। वो नारायणन ही थे, जिन्होंने गुजराल सरकार के कहने पर यूपी में और वाजपेयी के कहने पर बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू करने के सिफारिश को पहली बार सिरे से खारिज कर दिया था। वो नारायणन ही थे, जिन्होंने वाजपेयी सरकार की तरफ से संविधान समीक्षा के प्रस्ताव पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करके जता दिया था कि हमारे संविधान में कोई खोट नहीं है। वो नारायणन ही थे, जिन्होंने दुनिया के &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoCXRhJtxlI/AAAAAAAAAJA/5V26fJB6gyQ/s1600-h/narayanan+vajpayee.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoCYqhJtxnI/AAAAAAAAAJQ/XMk-geh-iiI/s1600-h/narayanan+vajpayee.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5080228235894965874" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoCYqhJtxnI/AAAAAAAAAJQ/XMk-geh-iiI/s320/narayanan+vajpayee.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;बाहुबली बने फिरने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की आंखों में आंखे डालकर ये कहने का साहस दिखा सके कि कश्मीर दुनिया का सबसे खतरनाक जगह नहीं है और हां, अगर दुनिया ग्लोबल विलेज में बदल रही है तो उस गांव को सारे पंच मिल कर चलाएंगे, कोई चौधरी नहीं। कहते हैं कि ये बात अमेरिका की पिछलग्गू वाजपेयी सरकार को अच्छी नहीं लगी थी। लेकिन इससे अपने नारायणन का क्या बिगड़ता है? उनके लिए राष्ट्रीय अस्मिता बड़ी थी, अपना स्वार्थ नहीं। और हां, जब गुजरात में मोदी सरकार ने नरसंहार शुरू कराया तो नारायणन ने प्रधानमंत्री वाजपेयी को चिट्ठी लिखकर कहा कि ये सब रोको। लेकिन भाषणवीर वाजपेयी और पाखंड की पुजारन बीजेपी से आप समरस समाज बनाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। वही हुआ, पहले गुजरात जला और उसके बाद जब राष्ट्रपति चुनाव का समय आया और कुछ लोगों ने नारायणन का नाम दोबारा राष्ट्रपति के लिए सामने लाया तो बीजेपी का कलेजा जलने लगा। लेकिन मजे देखिये कि बीजेपी ही नहीं, कांग्रेस और मुलायम सिंह जैसे दलितों-पिछड़ों-उपेक्षितों-वंचितों के आलमबरदारों को भी नारायणन सुहाते नहीं थे। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को छोड़ दें तो किसी बड़े नेता ने नारायणन के पक्ष में एक बयान तक देना गवारा नहीं समझा। लेकिन जब इतने विरोध थे, तो नारायणन ने ही खुद को इस दांवपेंच से अलग कर लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतीत के आंगन में झांकने का आशय ये नहीं था कि पुरानी यादों को ताजा किया जाए बल्कि कहने का मतलब ये है कि मौजूदा राजनीति में असरदार राष्ट्रपति किसी को नहीं चाहिए। मौजूदा राष्ट्रपति डॉक्टर अब्दुल कलाम के प्रति बिना किसी किस्म का अनादर भाव प्रकट किये ये तो कहा ही जा सकता है कि राष्ट्रपति के तौर पर बच्चों में जरूर उन्होंने बडा भाव जगाया लेकिन राष्ट्र प्रमुख के तौर पर उनका कार्यकाल सतही ही रहा। उस हाल में नया राष्ट्रपति जाति-लिंग-धर्म के दायरे से बाहर एक सुलझा हुआ राजनेता होना चाहिए जो नीर-क्षीर विवेक का इस्तेमाल करके सही फैसला सुना सके। शेखावत का इतिहास भले ही बीजेपी से जुड़ा रहा है लेकिन पिछले पांच साल में बतौर उपराष्ट्रपति &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoCcZxJtxpI/AAAAAAAAAJg/VnEXwKhrUNs/s1600-h/v_v_gri_4.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5080232346178668178" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoCcZxJtxpI/AAAAAAAAAJg/VnEXwKhrUNs/s200/v_v_gri_4.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;उन्होंने साबित कर दिया है कि वो दलगत राजनीति की परिधि से बाहर निकल चुके एक ईमानदार और साफगोई पसंद बड़े दिल के राजनेता हैं। तो क्या कभी बीजेपी से उनका साथ ही उनकी राह में रोड़ा होना चाहिए। रत्नाकर तो डाकू था लेकिन राम नाम की ताकत ने उसे महर्षि बाल्मीकि बना दिया।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;और फिर ये कैसे कहा जा सकता है कि शेखावत जीत नहीं सकते। 1969 में सबको यही लग रहा था कि कांग्रेस के उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी चुनाव जीत जाएंगे लेकिन वराह वेंकट गिरि ने उन्हें धूल चटा दिया था। करिश्मे बार बार नहीं होते लेकिन कई बार इतिहास खुद को दोहराता तो जरूर है। लिहाजा, मन साध कर देखते रहिए कि देश के पहले नागरिक के चुनाव में होता क्या है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-8986094390094429042?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/8986094390094429042/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=8986094390094429042' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/8986094390094429042'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/8986094390094429042'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2007/06/blog-post_25.html' title='राजनीति के दंगल में राष्ट्रपति'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RoCWZRJtxjI/AAAAAAAAAIw/7oUFuPRA9Ss/s72-c/bal.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-840375019465751468</id><published>2007-06-21T04:16:00.000+05:30</published><updated>2008-12-09T23:56:22.778+05:30</updated><title type='text'>इन्हें प्यादा चाहिये, काका कलाम नहीं</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;em&gt;काका कलाम पर लेख पढ़ने के बाद बहुत लोगों ने लेखक के बारे में पूछा। दरअसल &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;मणीष&lt;/span&gt; से मेरा परिचय 1997 से है। एक साल के लिए ही सही हम दोनों ने साथ पढ़ाई की। आज मणीष पेशे से बैंक में मैनेजर हैं , लेकिन ग्राहकों के रुपये पैसे का लेखा जोखा रखते हुए भी उन्होंने पढ़ने लिखने की आदत नहीं छोड़ी। वो हर रोज वक्त निकाल कर कई घंटे पढ़ते हैं। जब उन्हें पता चला कि एक ऐसा ब्लॉग शुरू हुआ है जिसमें वो सरकार की गलत नीतियों और सामयिक विषयों पर अपनी राय रख सकते हैं तो उन्होंने लिखना शुरू कर दिया। लिखते वो काफी पहले भी रहे हैं। लेकिन इस बार उन्होंने वादा किया है कि ये क्रम तोड़ेंगे नहीं। चौखंबा के लिए वो एक महीने में ही सही एक लेख जरूर देंगे। इस मंच पर उनके पहले के दोनों लेख जिसने भी पढ़े उसे कुछ नया जरूर मिला। हमें उम्मीद है कि ये अच्छा सिलसिला बना रहेगा। साथी मणीष के लिखने और पाठकों के सुझावों का सिलसिला। &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm2nxJtxXI/AAAAAAAAAHQ/MGEwpNA7VnI/s1600-h/1kalamimage1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5078290849162184050" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm2nxJtxXI/AAAAAAAAAHQ/MGEwpNA7VnI/s400/1kalamimage1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;वे वाकई सहज आदमी लगते हैं। इतने सहज कि उन्हें पवित्र कहने को जी चाहता है। उनकी ऐसी ही सहज पवित्रता के कारण उनसे अपनापन लगता है। वे हमें नहीं जानते, पर हम उन्हें बेहद नजदीक से जानते हैं। नजदीकी इस कदर कि कई लोग और बच्चों का एक बड़ा वर्ग उन्हें चाचा कलाम कहता है। मैं खुद उन्हें काका कलाम कहता हूं। काका से अपनापन ज्यादा लगता है और कलाम के साथ काका की जोड़ी भी चाचा से ज्यादा अच्छी जमती है। वैसे भी चाचा तो नेहरू के साथ पहले से ही जुड़ा हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो मामला काका कलाम का है। आजकल वे फिर चर्चा में हैं। हमारे देश के राजनीतिक गुटों ने सुविधा और सहूलियत के हिसाब से गणराज्य के अगले प्रथम नागरिक के बारे में गुणा गणित शुरू किया, तो काका को सबसे पहले खारिज कर दिया। दलील ये दी कि प्रथम राष्ट्रपति के अलावा परंपरागत रूप से किसी भी शख्स को एक ही बार राष्ट्रपति बनने का मौका दिया जाता रहा है। मालूम पड़ता है कि राष्ट्रपति का चयन किसी व्यक्ति विशेष को उपकृत करने के लिए किया जाता है। गोया देश और देशवासियों के हित अनहित का इस पद के लिए चुने जा रहे व्यक्ति के कोई लेना-देना नहीं हो। सार्वभौम गणराज्य (sovereign republic) की अवधारणा हमारे संविधान में हैं और उसमें राष्ट्रपति किसी व्यक्ति विशेष को उपकृत करने वाला पद बन कर रह जाए, इसकी किसी ने कल्पना नहीं की होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm4ARJtxdI/AAAAAAAAAIA/YdhR7KQL9RA/s1600-h/pratibha.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5078292369580606930" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm4ARJtxdI/AAAAAAAAAIA/YdhR7KQL9RA/s400/pratibha.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;खैर, बाखबर लोग इसे जान पा रहे होंगे कि अगर चुनावी गणित राजनीतिक दलों के प्रति निष्ठा पर चला तो हमें प्रतिभा पाटिल के रूप में नई राष्ट्राध्यक्षा मिलेंगी। ये कहीं से आलोचना योग्य कदम नहीं है। पर मंशा वह कभी नहीं रही तो अभी जताई जा रही है। यूपीए और उसके सहयोगियों द्वारा प्रतिभा पाटिल के नाम की घोषणा ऐसे की जा रही है कि मानों शुरू से ही उनका उदेश्य शीर्ष पद पर किसी महिला को बैठाना रहा हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ऐसा कतई नहीं है। इसे और गहराई से समझने के लिए हम थोड़ा अतीत में झांकते हैं। आप राष्ट्रपति के लिए पिछले चुनाव (2002) को याद करें। मरहूम कोचिल रमनन नारायणन तत्कालीन राष्ट्रपति थे। जानने और मानने वाले जानते और मानते हैं कि अब तक जितने भी राष्ट्रपति रहे हैं उनमें नारायणन किसी से कमतर नहीं थे। आप हर राष्ट्रपति के कार्यकाल का विवरण पढ़ें। संक्षेप में बताएं कि डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद अगर हिंदू कोड बिल को लेकर आलोचना के शिकार हुए तो फखरूद्दीन अली अहमद आपातकाल में अपनी भूमिका को लेकर। बीबी गिरी और नीलम संजीव रेड्डी तो अपने दौर में कांग्रेस में चल रही वर्चस्व की लड़ाई में मोहरे के तौर पर इस्तेमाल किये गये। डॉक्टर राधाकृष्णन और डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा अपनी अकादमिक रूचियों के कारण ज्यादा विद्वत भले माने जाते रहे, पर राजनीतिक अभिरूचि से पद के महत्व को बढ़ाने के लिहाज से उनका कार्यकाल नहीं जाना जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैंकटरमन कांग्रेस और श्रीमति गांधी(प्रथम) के वफादार बने रहे, तो ज्ञानी जैल सिंह को अलग तरह के क्रियाकलापों के लिये जाना गया। &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm26RJtxZI/AAAAAAAAAHg/0SM0xFAj4eU/s1600-h/indira.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5078291166989763986" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm26RJtxZI/AAAAAAAAAHg/0SM0xFAj4eU/s400/indira.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;श्रीमति गांधी (प्रथम) के समय ज्ञानी जैल सिंह खुद को राष्ट्रपति से ज्यादा एक स्वामिभक्त कारिंदा मानते रहे। लेकिन राजीव काल में उन्होंने टकराव का नया द्वार खोला। राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्यक्ष के बीच टकराव का अभूतपूर्व उदाहरण सामने आया। हालत यहां तक बिगड़े कि राष्ट्रपति के द्वारा प्रधानमंत्री की बर्खास्तगी के कयास लगाए जाने लगे। साथ ही प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग लाने की अटकलें भी जोर पकड़ने लगीं। गनीमत रही कि ऐसा कुछ नहीं हुआ और ज्ञानी जैल सिंह ने अपना कार्यकाल पूरा कर लिया। इन सबों के कार्यकाल के बाद कभी इतनी शिद्दत से तत्कालीन समाज को महसूस नहीं हुआ कि इनके कार्यकाल को और विस्तार दिया जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्ञानी जैल सिंह के बाद तो उपराष्ट्रपति के राष्ट्रपति के रूप में चुने जाने का सिलसिला सा बन गया। ये सिलसिला टूटा नारायणन के कार्यकाल के अंत में। दरअसल नारायणन का दौर उनकी बेहद खरी सोच और स्वतंत्र और निर्बद्ध कार्यपद्धति के लिए जाना जाता है। उनमें साहस भी गजब का था। बात &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm2xRJtxYI/AAAAAAAAAHY/WHdKZ3FeGZU/s1600-h/naraynan+clinton.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5078291012370941314" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm2xRJtxYI/AAAAAAAAAHY/WHdKZ3FeGZU/s400/naraynan+clinton.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिंटन के भारत दौरे की है। तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनके सभी मंत्री क्लिंटन के स्वागत में बिछे जा रहे थे। लेकिन नारायणन ने यहां भी भारत का पक्ष जोरदार तरीके से रखा। उस दौरे में क्लिंटन ने कहा कि दुनिया एक गांव के समान हो गई है और अमेरिका से दूरी किसी के लिए भी ठीक नहीं। तब नारायणन ने खाने की मेज पर क्लिंटन को दो टूक शब्दों में बताया कि इस वैश्विक गांव में कोई एक अपनी चौधराहट हांकने की कोशिश नहीं करे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाजपेयी सरकार के चंगु मंगुओं ने इसे नाजायज अकड़ में की गई एक बड़ी डिप्लोमेटिक भूल करार दिया। जब मन गुलाम हो, मस्तिष्क पर गुलामी का मुलम्मा चढ़ा हो तो जुबां से साहस की उम्मीद करना बेवकूफी है। गुलाम, मालिक की बेअदबी में कही गई हर बात को गलत और भूल करार नहीं देगा तो और क्या करेगा? वाजपेयी और उनके मंत्रियों ने यही किया। मगर नारायण गुलाम मन के नहीं थे। उनके मस्तिष्क पर गुलामी का मुलम्मा भी नहीं चढ़ा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नारायणन के दिल पर उस संयुक्त मोर्चा सरकार के प्रति भी वफादारी दिखाने का बोझ नहीं था जिसने उन्हें राष्ट्रपति भवन में प्रतिष्ठित किया था। उनके जेहन में अपनी भूमिका को लेकर कोई उलझन नहीं थी। वो जानते थे कि पद का परिस्कार या तिरस्कार उस पर आसीन व्यक्ति के चरित्र से होता है। नारायणन ने एक अहसानमंद व्यक्ति की अपेक्षा, एक कर्तव्यनिष्ठ और संविधान से आबद्ध राष्ट्रपति के रूप में अपनी भूमिका का चयन किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका उदाहरण भी मिलता है। 1998 में उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सरकार थी। केंद्र में सत्तारूढ़ संयुक्त मोर्चा सरकार ने उसकी बर्खास्तगी की सिफारिश की। लेकिन नारायणन ने उसे लौटाने में जरा भी संकोच नहीं किया। यह तय है कि केंद्र ने उन्हें अपना आदमी जान विरोधी दल की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए उनका उपयोग करना चाहा। पर नारायणन राष्ट्रपति थे ना कि उपयोग में आने के लिए तैयार बैठा एक सामान्य अहसानमंद आदमी। उनका काम संविधान के अनुसार, संविधान की रक्षा करना था, ना कि किसी गठबंधन का अहसान चुकाना। उन्होंने वही किया जिसकी अपेक्षा संविधान उनसे करता था। नारायणन से पहले लगभग सौ बार इस देश में राज्य सरकारों को बे-सिर पैर के कारणों का हलावा देकर केंद्र की विरोधी दलों की सरकारों ने बर्खास्त करवाया था। परंपरा से हट कर भूमिका के चयन के लिए जिस साहस और स्वतंत्र चेतना की आवश्यकता होती है वह नारायणन ने अपने कामों से दिखाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम और आप जानते हैं कि हर मालिक को हामी भरने वाले स्वामिभक्त टॉमी की जरूरत होती है। &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm8oBJtxgI/AAAAAAAAAIY/zJOKD5vCdbQ/s1600-h/narayanan+vajpayee.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5078297450526918146" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm8oBJtxgI/AAAAAAAAAIY/zJOKD5vCdbQ/s400/narayanan+vajpayee.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;स्वतंत्र और निष्पक्ष राय देने वाला कभी अच्छे नौकर के तौर पर नहीं देखा जाता। इसलिए जब 2002 में राष्ट्रपति के चयन की बात आई तो एनडीए सरकार ने नारायणन की दोबारा ताजपोशी को यह कह कर नकार दिया कि दोबारा चुने जाने की परंपरा नहीं है। याद रहे कि नारायणन ने उत्तर प्रदेश में उसी एनडीए की सरकार को असंवैधानिक तरीके से उखाड़ने से मना कर दिया था। नारायणन का नाम खारिज करने के बाद तलाश ऐसे व्यक्ति की शुरू हुई जो मालिक के इशारे पर अपनी भूमिका चुने न कि संविधान के अनुरूप।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तमाम नाम आए। ताजिंदगी नौकरशाह रहे पी सी एलेक्जेंडर, तत्कालीन उपराष्ट्रपति और आंध्र प्रदेश के पूर्व राज्यपाल कृष्णकांत और 85 साल की कैप्टन लक्ष्मी सहगल भी। हर राजनीतिक गुट अपनी गोटी फिट करने में लगा हुआ था। प्रमोद महाजन को पी सी एलेक्जेंडर की वफादारी भा रही थी। तो चंद्रबाबू नायडू कृष्णकांत की पैरोकारी में जुटे थे। यह हम सबको मालूम है कि वर्तमान साझा सरकारों के दौर में आम चुनाव के तुरंत बाद या फिर बीच में किसी टकराव की स्थिति में किसी दल और व्यक्ति विशेष को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलवाना राष्ट्रपति का एक महती विवेधिकार होता है। सोचिये अगर पी सी एलेक्जेंडर राष्ट्रपति होते तब क्या प्रमोद महाजन की प्रधानमंत्री बनने की इच्छा ज्यादा परवान नहीं चढ़ती? गठबंधन की सरकार में रूठना मनाना लगा ही रहता है। ऐसे रूठने मनाने का खेल माहौल को अपने पक्ष में बनाने के लिए भी करवाया जाता है। ऐसे में जब अंपायर आपके अहसानों के बोझ से लदा, आपके पक्ष में फैसला सुनाने के लिए तैयार बैठा हो तो आशाएं क्यों न हिलोर मारें?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंध्र प्रदेश के दिनों से ही राज्यपाल रहे कृष्णकांत पर चंद्रबावू नायडू का अहसान तारी हो रहा था। फिर उन्हें उप राष्ट्रपति बनवाने में भी नायडू की भूमिका अहम थी। नायडू को लगा कि&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm7GBJtxeI/AAAAAAAAAII/RpVbPY0XUcM/s1600-h/kkant.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5078295766899738082" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm7GBJtxeI/AAAAAAAAAII/RpVbPY0XUcM/s400/kkant.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; राष्ट्रपति बनवा कर कृष्णकांत से जरूरत पड़ने पर बड़ी कीमत वसूली जाएगी। खुद कृष्णकांत को भी लगने लगा कि अब सत्ता का शीर्ष उनके करीब है। एक दौर में अपने तीखे तेवर के लिए युवा तुर्क की उपाधि पाने वाले कृष्णकांत ने 2002 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले के मौसम में मौन धारण कर लिया। साफ लगने लगा कि पदोन्नति कि आशा में उन्होंने वो तेवर खो दिया जिसके लिए उनकी तारीफ होती थी। कालांतर में आप ऐसे व्यक्ति से दृढनिष्पक्षता की उम्मीद कैसे करते?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां कई नेता अपनी अनर्गल महत्वाकांक्षा को साधने की जुगाड़ में लगे थे तो वहीं उनके विरोधी काट तैयार कर रहे थे। इसी कारण ऐसे आज्ञाकारी व्यक्ति की खोज शुरू हुई जो समय आने पर इतना संविधानभक्त न बने कि उसके कृत्य से अहसानफरामोशी की बू आए। आप बताएं कि भला ऐसे में नारायणन को कौन पूछता? हालांकि देश का प्रबुद्ध और अराजनीतिक तबका उनके पक्ष में लगातार आवाज उठाता रहा और उन्होंने स्वयं भी आम सहमति की स्थिति होने पर अपनी उम्मीदवारी के लिए हामी भरी। आम सहमति पर जोर इसलिए रहा कि एक बार राष्ट्रपति रह चुका व्यक्ति अपने साथ पराजित उम्मीदवार का पैबंद कभी नहीं लगाना चाहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;येन केन प्रकारेण राजनीतिक गुटों के एक बड़े वर्ग की सहमति अबील पकीर जमील अब्दुल कलाम के नाम पर बनी। कलाम का पहले का व्यवहार और बर्ताव बेहद आज्ञाकारी पदाधिकारी के रूप में रहा था। पिछली तमाम भूमिकाओं में उन्होंने हमेशा अपने से ऊपर के ओहदेवालों की प्रशंसा ही बटोरी। काम के प्रति समर्पण भाव को नेताओं ने उनकी स्वामिभक्ति के तौर पर लिया। उनके नाम पर कमोवेश आम सहमति थी। वाममोर्चे को भी कोई खास एतराज नहीं था। लेकिन सिद्धांतत: उसने दक्षिणपंथी भाजपा नेतृत्व गंठबंधन के उम्मीदवार का विरोध करने का फैसला लिया और कैप्टन लक्ष्मी सहगल को मैदान में उतार दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह काका कलाम इस अपेक्षा से लदे राष्ट्रपति भवन पहुंचे कि वो अगले नारायणन नहीं बनेंगे। सोच यह थी कि आजीवन नौकरी कर चुका व्यक्ति अपनी स्वतंत्र चेतना खो चुका होगा और शीर्ष पर रह कर भी वही &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm7iBJtxfI/AAAAAAAAAIQ/n0DHFR9t-k0/s1600-h/Dr_Kalam.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5078296247936075250" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm7iBJtxfI/AAAAAAAAAIQ/n0DHFR9t-k0/s400/Dr_Kalam.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;करेगा जैसा उससे कहा जाएगा। उनसे ऐसी ही एक गलती हुई भी। रूस प्रवास के दौरान बिहार में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश को कलाम ने आधी रात को मंजूरी दी। हड़बड़ी में हस्ताक्षर के इस एक मामले को छोड़ दें तो काका कलाम का कार्यकाल गणतांत्रिक लोकतंत्र के स्वस्थ विकास के एक चरण के तौर में जाना जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे कई मौके आए जब अंधस्वार्थी हुक्मरानों ने कलाम से वह सब उम्मीदें की जिन पर खरा उतरने के बाद उन्हें अगला कार्यकाल मिल सकता था। बेहद हालिया घटना को लें तो लाभ के पद के बिल पर हामी भरना ऐसा ही एक कार्य होता, लेकिन काका कलाम ने ऐसा कुछ नहीं किया। श्रीमति गांधी (द्वितीय) को अराध्य देवी के रूप में पूजने वाले हुक्मरानों की वर्तमान जमात ने इसे अपनी देवी की शान में गुस्ताखी माना। कलाम को भी हमेशा अंदाजा रहा कि ऐसे भोकुस दलालों के रहते दूसरा कार्यकाल नहीं मिलेगा। इस कारण उन्होंने अपनी उम्मीदवारी की चर्चा को वही कह कर खारिज कर दिया जो नारायणन ने कहा था। मतलब आम सहमति की स्थिति में कलाम ने खुद को अगले कार्यकाल के लिए तैयार बताया। हालांकि यह भी सत्य है कि उनके नाम पर जो सियासी दुरचालें चली गईं और जाल बुना गया उसने उन्हें और क्षुब्ध कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप काका कलाम के कार्यों को देखें तो आप जान पाएंगे कि उनके जैसे व्यक्ति का शीर्ष पर होना कितना आश्वस्त करता है। न्यायपालिका की स्वतंत्र सत्ता के बावजूद राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में जो भी बन पड़ा काका कलाम ने उसका प्रयोग किया ताकि न्यायपालिका में शुचिता लाई जा सके। घाघ नेताओं के बीच काका कलाम ने हमेशा स्वच्छ राजनीतिक आचरण की वकालत की। यह उनके व्यक्तित्व का ही असर था कि कभी किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि चेहरे के हावभाव से भी उनके कहे का तिरस्कार कर सके। कलाम तमाम प्रकार से लूटने वाले मुनाफाखोर उद्योगपतियों के सम्मेलन में इस देश और इसके आम नागरिकों के बारे में सोचने और करने की वकालत करते हैं और श्रोता धनपशु सहमति में सिर हिलाते नज़र आते हैं। ये और बात है कि बेशर्म धनपशुओं ने उनके सुझावों पर कभी अमल नहीं किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काका कलाम बताते हैं कि बिना खेती और खेतीहर समाज के विकास के असली विकास का हमारा सपना बेमानी है। काका कलाम के जैसों के रहते आप इस देश के सर्वोच्च प्रतिष्ठान की निष्पक्षता को लेकर आश्वस्त रह सकते हैं। ऐसे लोगों की जरूरत हम और आप जैसे आम नागरिकों को हो सकती है। लेकिन घाघ और दलाल हुक्मरानों को नहीं। उन्हें वह सब करने की छूट चाहिये, जो उनकी दलाली के लिए जरूरी हो। ऐसा करने में नारायणन और काका कलाम जैसे लोग कहीं से फिट नहीं बैठते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5078291617961330098" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm3UhJtxbI/AAAAAAAAAHw/9MkOHZScdrc/s400/rashtrapati+bhawan.jpg" border="0" /&gt;&lt;br /&gt;राष्ट्रपति के पिछले चुनाव और अब होने जा रहे चुनाव ने इन राजनीतिक गुटों को यह समझा और सिखला दिया है कि नारायणन और कलाम जैसे लोग शुरुआत में भोले भले दिखें, लेकिन अंतत: ये भारी पड़ते हैं। इस सीख और अनुभव के बाद राष्ट्रपति पद के लिए इस बार से फिर ऐसे लोगों का चुनाव शुरू हो गया जो घुटे राजनीतिक माहौल में पला बढ़ा और स्वामिभक्त हो। आप शुरुआत में उछले नामों पर गौर करें। शिवराज पाटिल, कर्ण सिंह, प्रणब मुखर्जी, अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा, नारायण दत्त तिवारी ... वगैरह वगैरह। यह भी बताते चलें कि ऐसे लोगों के बारे में हुई चर्चा का कोई मतलब नहीं जिन्हें सत्तारूढ़ गुट का जिताने वाला समर्थन हासिल नहीं हो सकता। मसलन भैरों सिंह शेखावत, सोमनाथ चटर्जी आदि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm3hhJtxcI/AAAAAAAAAH4/GxzbTy_eTGk/s1600-h/sonia_gandhi_fashion.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5078291841299629506" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm3hhJtxcI/AAAAAAAAAH4/GxzbTy_eTGk/s400/sonia_gandhi_fashion.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;हुक्मरानों की अराध्य देवी श्रीमति गांधी (द्वितीय) को उसी व्यक्ति की उम्मीदवारी तुष्ट करती जिसका पिछला रिकॉर्ड स्वामिभक्ति से ओत पोत रहा हो। वो भी इस कदर कि उसके भविष्य के अहसानपरस्त आचरण के प्रति आश्वस्त हुआ जा सके। सिर्फ परंपरा की दुहाई देकर कलाम की अपेक्षा श्रीमति पाटिल को तवज्जो देने का मतलब सिर्फ उतना नहीं जितना बताया जा रहा है। असल में हुक्मरानों को वह नहीं चाहिये जो नारायण और कलाम करते रहे हैं। उन्हें वह चाहिये जो प्रणब मुखर्जी या शिवराज पाटिल या फिर प्रतिभा पाटिल जैसे लोग करने की गारंटी देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बात एक महिला को राष्ट्रपति बनाने की। यहां यह कहना काफी होगा कि जाकीर हुसैन, फखरुद्दीन अली अहमद और काका कलाम के राष्ट्रपति हो जाने से देश में मुसलमानों की स्थिति बेहतर नहीं हो गई है। एक सिख के राष्ट्रपति होने से उसके कार्यकाल के दौरान ठीक उसी की नाक के नीचे सिखों का सरेआम कत्ल नहीं रुका। साफ है प्रतीक रूप में आप किसी को कुछ देते हैं तो वह उस व्यक्ति के समुदाय को ... उसका बकाया देना नहीं होता। प्रतिभा पाटिल का राष्ट्रपति होना इस देश की महिलाओं को उन सब बेड़ियों से मुक्त नहीं करेगा जिनके कारण उनका शोषण होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी महिला की उम्मीदवारी का विरोध करना इस लेख की मंशा नहीं। बताना बस इतना है कि हम ऐसे घाघ और घुटे हुए लोगों से शासित हैं, जो ऐसे व्यक्ति को भी तथाकथित परंपरा के नाम पर बाहर करने का षणयंत्र रचते हैं जिसने अपना सबकुछ इस राष्ट्र को दिया है। ऐसा शख्स जो पूरे कार्यकाल के दौरान घूम घूम कर बच्चों को सिखाता रहा कि हमेशा देश हित में सोचो। कलाम की मंशा ये रही कि इस राष्ट्र का भविष्य भी मजबूत हो। वो अपने आचरण से हम सबको सीख देते हैं कि इस मुश्किल दौर में भी ईमानदार सपनों के लिए सहज रूप से जिया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5078291338788455842" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnm3ERJtxaI/AAAAAAAAAHo/gffUiheKv3o/s400/kalam+children.jpg" border="0" /&gt;&lt;br /&gt;याद रखिये कहने को हमारे पास तर्क है कि भला राष्ट्रपति के चयन में हमारी क्या भूमिका हो सकती है? पर तथ्य यह भी है कि हम ऐसे लोगों के द्वारा ही शासित होते हैं जिनके चयन में हमारी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका होती है। अप्रत्यक्ष ही सही हम अपनी भूमिका के होने से इनकार नहीं कर सकते। अपनी जिम्मेदारी को ना निभाने पर या अनमने ढंग से निभाने पर हम दोमुंहे नेताओं से शासित होने को शापित हैं और सही ढंग से निभाएं तो इसी में हमारी मुक्ति है। हमारा मतलब ... हम और ठीक हमारे ही जैसे काका कलाम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लेखक: मणीष&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-840375019465751468?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/840375019465751468/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=840375019465751468' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/840375019465751468'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/840375019465751468'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2007/06/blog-post_20.html' title='इन्हें प्यादा चाहिये, काका कलाम नहीं'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' 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0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RneweRJtxQI/AAAAAAAAAGY/cr3Vl1-1ohw/s400/blair_bush.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;1. “नई मुसीबत में फंस सकते हैं ब्लेयर” &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;2. “इराकी कबीलों को हथियारों से लैस न करे अमेरिका – नूरी”&lt;br /&gt;3. “खाड़ी देशों से ईरान पर अमेरिकी हमला न होने दिया जाएगा” &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;4. “अमेरिका बोला, लगे रहे जनरल मियां”&lt;br /&gt;और&lt;br /&gt;5. “काबुल में आत्मघाती हमला, 35 लोग मरे”&lt;br /&gt;पहली खबर टोनी ब्लेयर के झूठ पर है। वो झूठ जो उन्होंने इराक पर हमले से पहले अपने देशवासियों से बोला था। तब टोनी ब्लेयर ने कहा था कि अमेरिका की अगुवाई में ब्रिटेन और उसके साथियों के पास हमले के बाद की पूरी योजना तैयार है। लेकिन अब सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदखल किये अरसा गुजर चुका है लेकिन योजना की भनक तक नहीं लग रही। यही वजह है कि अब टोनी ब्लेयर के खिलाफ ब्रिटेन में माहौल बनने लगा है। इस विरोधी माहौल को और अधिक हवा ब्लेयर के करीबी साथियों ने दी है। वो साथी जो हमले के उनके गुनाह में बराबर के भागीदार रहे, लेकिन ब्लेयर पर ही निशाना साध रहे हैं। उन्होंने एक डॉक्यूमेंट्री में कहा है कि ब्लेयर अच्छी तरह से वाकिफ थे कि युद्ध के बाद इराक के पुनर्निमाण की अमेरिका के पास कोई योजना नहीं थी, फिर भी उन्होंने हमले के लिए अपनी सेना भेजी।&lt;br /&gt;दूसरी खबर भी इराक की है। अभी वहां ऐसी सरकार है जो अमेरिकी अगुवाई में तैनात सेना के दम पर राज कर रही है। वहां प्रधानमंत्री हैं नूरी अल मलिकी। नूरी से बेहतर बहुत कम लोग ही अमेरिकी ताकत का सही आकलन कर सकते हैं।&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnew6xJtxTI/AAAAAAAAAGw/UcUGcjy584A/s1600-h/iraqviolence.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5077721628556510514" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/Rnew6xJtxTI/AAAAAAAAAGw/UcUGcjy584A/s400/iraqviolence.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; लेकिन अपने वतन में हो रही रोज की हिंसा से नूरी भी जरूर आहत होते होंगे। उन्हें भी धीरे-धीरे ये अहसास हो रहा है कि अमेरिकी सैनिक इस हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं। अमेरिकी सैनिक अपने फायदे के लिए इराक के स्थानीय कबीली गुटों को हथियार बांट रहे हैं ताकि वो एक दूसरे पर हमले जारी रखें। इराकी लड़ाकू आपस में ही लड़ कट मरें। यही वजह है कि नूरी अब आगाह कर रहे हैं। अमेरिकी सेना को आगाह। इराक में अभी तक अमेरिका को चेतावनी विरोधी देते थे। अब समर्थक भी दे रहे हैं। हालांकि उनके सुर अभी बहुत हल्के हैं... लेकिन हालात तेजी से बदलते हैं। वक्त के साथ इराकी आवाम में छले जाने का अहसास गहरा होता जाएगा ... और ये अहसास जितना गहरा होगा ... अमेरिका के खिलाफ गुस्सा भी उतना ही बढ़ेगा। तब वो सब विरोधी और समर्थक मिल कर अमेरिका से हिसाब मांगेंगे। अपनी बर्बादी का हिसाब, अपने लोगों के लहू का हिसाब। अमेरिका इस खतरे को टाल सकता है, लेकिन हमेशा के लिए। नूरी की चेतावनी इसी बदलाव का संकेत है। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;तीसरी खबर का ताल्लुक भी अरब देशों से है। सऊदी अरब और खाड़ी सहयोग परिषद ने एलान किया है कि ईरान पर हमले के लिए अमेरिका को खाड़ी देशों की जमीन का इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा। उनका कहना है कि ईरान पर अमेरिकी हमले से अरब देशों को कोई फायदा नहीं पहुंचेगा इसलिए वो किसी भी सूरत में अमेरिका का समर्थन नहीं करेंगे। यही नहीं वो सभी इस विवाद में ईरान के साथ हैं। इस परिषद में सिर्फ सऊदी अरब ही नहीं है बल्कि कुवैत, कतर, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान भी हैं। ऐसे में अरब देशों का ये बयान काफी अहमियत रखता है। ये संकेत है कि आने वाले दिनों में अमेरिका को किस तरह की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। ये संकेत है कि इराक पर हमले को बर्दाश्त कर चुके अरब देश अब ईरान पर हमले को बर्दाश्त नहीं करेंगे और अगर अमेरिका ने उनकी इच्छाओं के विपरीत हमला किया तो उसे और अधिक मुश्किलों का समाना करना पड़ सकता है। इससे आने वाले दिनों में खाड़ी के देशों में किस तरह के कूटनीतिक संबंध स्थापित होंगे इसकी भनक लगाई जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5077724669393356114" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RnezrxJtxVI/AAAAAAAAAHA/7paDaWoOCdE/s400/trade_your_son_for_oil.jpg" border="0" /&gt;चौथी खबर पाकिस्तान की। इराक में सद्दाम को अमेरिका ने सत्ता से बेदखल किया और हिंसा का वो दौर शुरू किया जो थमने का नाम नहीं ले रहा। अब अमेरिका की साजिश ईरान में सत्ता परिवर्तन की है। लेकिन पाकिस्तान में वो तानाशाह मुशर्रफ को सत्ता में बने रहने का आशीर्वाद दे रहा है। आप इसी से अंदाजा लगे सकते हैं कि अमेरिका के मंसूबे कितने खतरनाक हैं। अमेरिका बार बार कहता है कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में पाकिस्तान की अहमियत को वो समझता है। दरअसल ये आतंकवाद के खिलाफ जंग नहीं है। ये सारी जंग पैसे की है। इस्लामिक देशों के पास ऊर्जा का ऐसा भंडार है जो आने वाले दिनों में दुनिया की दिशा तय करेगा। यही वजह है कि धीरे धीरे अमेरिका उन सब पर कब्जा करना चाहता है। लेकिन वो जानता है कि उसके मंसूबे तभी पूरे होंगे जब उसे कुछ ताकतवर इस्लामिक देशों का समर्थन भी हासिल होगा। पाकिस्तान भी एक ताकतवर इस्लामिक देश है और वहां एक बड़ा धड़ा अमेरिका के खिलाफ भी है। लेकिन मुशर्रफ अमेरिका समर्थक हैं। इसलिए बुश सरकार की कोशिश है कि मुशर्रफ लंबे समय तक बने रहें। वो जब तक पाकिस्तान की सत्ता में रहेंगे, अमेरिका का हित साधते रहेंगे। लेकिन ऐसा नहीं है कि कोई और सत्ता में आया तो अमेरिका उससे ठुकरा देगा। बल्कि उसकी कोशिश उसे भी अपने सांचे में ढालने की होगी।&lt;br /&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5077720997196317938" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RnewWBJtxPI/AAAAAAAAAGQ/ObY9oEW3u_U/s400/afghan+war.jpg" border="0" /&gt;अब बात पांचवी खबर की। ये खबर एक ऐसे देश से है जहां अमेरिका ने खूब प्रयोग किये। नया प्रयोग लोकतंत्र स्थापित करने के बहाने चल रहा है। वहां चुनी हुई सरकार सत्ता में भी है। लेकिन हिंसा थम नहीं रही। बावजूद इसके कि अमेरिका समेत कई देशों की सेना वहां शांति बहाली की कोशिश में लगी हुई है। वो भी कई साल से। लेकिन शांति बहाल होने की बजाए हिंसा बढ़ती जा रही है। इराक&lt;/div&gt;की ही तरह अफगानिस्तान भी सुलग रहा है। ये दोनों देश गवाह हैं कि जिस देश में भी अमेरिका और उसके साथियों ने दखल दिया है वो देश बर्बाद हुआ है। अफगानिस्तान में पहले अपने हितों के लिए अमेरिका ने तालिबानियों और मुल्ला उमर को बढ़ावा दिया और बाद में अपने ही हित के लिए उनका सफाया किया। लेकिन इस सबके चक्कर में अफगानिस्तान बर्बाद हो गया।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RnexcBJtxUI/AAAAAAAAAG4/BSWvdodNL8M/s1600-h/iraq_minime.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5077722199787160898" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RnexcBJtxUI/AAAAAAAAAG4/BSWvdodNL8M/s400/iraq_minime.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;एक बड़े अखबार के एक ही पेज पर दुनिया की पांच बड़ी खबरें और हर खबर अमेरिका और उसके साथियों की साजिश से जुड़ी हुई। उन्होंने ये साजिश रची लोकतंत्र की मजबूती और आतंकवाद विरोधी मुहिम के नाम पर। अरब देशों और इस्लामिक देशों से आती खबरें चीख चीख अमेरिका के खौफनाक चेहरे को बयां करती हैं। साथ ही ये ख़बरें आगाह भी कर रही हैं कि गरीब और पिछड़े हुए देशों को उनके नापाक इरादों की भनक लग गई है। हर तरफ अमेरिका विरोधी सुर मजबूत हो रहे हैं। ये सुर जितनी जल्दी अधिक मजबूत होंगे। अमेरिकी साम्राज्यवाद की मौत भी उतनी ही जल्दी होगी। इसलिए जरूरत है उन सुरों को मजबूत करने की।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-3662856940806996041?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/3662856940806996041/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=3662856940806996041' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/3662856940806996041'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/3662856940806996041'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2007/06/blog-post_19.html' title='ये मौत की आहट है अमेरिका और ब्रिटेन'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_yGgoydDwbpE/SE-JCSTdt8I/AAAAAAAAAM4/PlWjsDEt6ko/S220/sw+405.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_yGgoydDwbpE/RneweRJtxQI/AAAAAAAAAGY/cr3Vl1-1ohw/s72-c/blair_bush.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2504780496929911450.post-8029023418745317824</id><published>2007-06-18T05:17:00.001+05:30</published><updated>2007-06-18T06:17:38.255+05:30</updated><title type='text'>माफ करें ये धर्मयुद्ध नहीं है</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;कल देर रात उमाशंकर जी को किसी काम के लिए मैंने फोन किया। बातों बातों में उन्होंने कहा कि किसानों पर लेख का ऐसा शीर्षक (अगली आहुति आपकी) क्यों चिपकाया है कि लगे नारद पर मचे हंगामे के बारे में है। मैंने उनसे कहा कि शीर्षक एकदम लेख के मुताबिक ही है ना कि किसी को धोखा देने के लिए। मेरा मानना है कि गंभीर मुद्दों पर बहस के लिए आप किसी को झांसा देकर भले ही बुला लें उसे रोक कर नहीं रख सकते। इसलिए जो शीर्षक लगाया है वो पूरा सच है। अगर हम आज नहीं जागे तो अगली आहुति हमें ही देनी है। लेकिन उनकी बात से मुझे लगा कि इसी गलतफहमी में कई लोग चौखंबा पर आए होंगे। शायद यही वजह है कि एक घंटे के भीतर कई हिट हो चुके थे। मेरा यकीन है कि उनमें से कुछ को जब लगा होगा कि "अगली आहुति आपकी" किसानों से जुड़े गंभीर मुद्दे पर है तो उन्हें निराशा हुई होगी।&lt;br /&gt;दरअसल आज के दौर का यही सच है और ब्लॉग की दुनिया भी इस सच से जुदा नहीं। यहां भी हमारे देश और दुनिया की व्यवस्था का खोखलापन साफ नजर आता है। गंभीर मुद्दों पर बहस करने वालों की संख्या बेहद कम है और रास्ता काफी तंग। मुझे लगता है कि नारद पर घमासान उसी खोखलेपन की गवाही देता है। अपनी इस बात को और साफ करने के लिए मैंने ये चिट्ठा लिखने का फैसला किया। ये फैसला इसलिए कतई नहीं है कि कुछ लोग ललकार रहे हैं कि आज तटस्थ रहे तो समय मांगेगा हिसाब। सच तो ये है कि ऐसा कहने वाले ये भूल जाते हैं कि ये नारा निर्णायक युद्ध या कहें कि धर्मयुद्ध के वक्त बुलंद किया जाता है। निर्णायक युद्ध या धर्मयुद्ध का मतलब उस युद्ध से है जब जुल्म के शिकार जुल्म करने वालों के खिलाफ जंग छेड़ देते हैं। खाये पीये अघाये लोगों के झगड़े को मैं बेहद बेतुका मानता हूं। ऐसे झगड़ों की कोख में होता है झूठा अहंकार और झूठी नफरत। आज नारद पर जो संग्राम चल रहा है उसमें ज्यादातर लोगों का यही सच है। चाहे वो नारद के समर्थक हों या फिर नारद के विरोधी।&lt;br /&gt;सबसे पहले बात नारद के विरोधियों की। आखिर ये लोग हैं कौन और इनकी नीयत क्या है? अगर ये सभी विचारों को लेकर इतने गंभीर हैं तो फिर छिछली भाषा पर उतरे ही क्यों? जब ये हमले करने का हौसला रखते हैं तो हमले सहने का जिगर क्यों नहीं रखते? अब न चाहते हुए भी इस मसले पर लिखने बैठ ही गया हूं तो चर्चा सारे पहलुओं पर होगी। शुरुआत नारद के कदम के विरोध में दी जाने वाली दलीलों से। बाजार वाले के निकाले जाने के बाद कई दिग्गजों ने विरोध जताया और अब भी जता रहे हैं। कुछ ने बाजार वाले के समर्थन में कहा कि आखिर हम क्यों उस स्तर तक नहीं उठ पाते जहां वैचारिक युद्ध के बाद शाम को बिना किसी गिले शिकवे के मिल सकें और व्यक्तिगत बातें कर सकें। अब आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि ये लोग विचारों को लेकर कितने गंभीर है। जो शख्स ऐसा लिखते हैं वो मौजूदा दौर के ज्यादातर ओछे सियासतदानों की तरह ही हैं। जो चुनाव के वक्त एक दूसरे की खाल नोचते हैं और जब सत्ता की बारी आती है तो सभी वैचारिक मतभेद भुला कर एकजुट हो जाते हैं। दुश्मनों के साथ सत्ता में बैठ कर मलाई खाते हैं। अपना और खानदान का पेट भरते है। तब ये सफेदपोश भूल जाते हैं कि उनके विचारों के लिए न जाने कितने कार्यकर्ताओं ने जान की बाजी लगाई। कितने लोगों ने दिन रात पसीना से लेकर लहू तक बहाया है। वो ये भूल जाते हैं कि लाखों करोड़ों लोगों के सपनों की कब्र पर वो सत्ता का सुख भोग रहे हैं। वो ये भूल जाते हैं कि युद्ध हथियारों से हो या फिर विचारों से – दुश्मनों से दूरी जरूरी है। दुश्मनों से सिर्फ और सिर्फ युद्ध के मैदान में मिला जा सकता है .. चाय और खाने की टेबल पर नहीं।&lt;br /&gt;बाजार वाले के समर्थन में दूसरा तर्क ये दिया जा रहा है कि उसने भावुक हो कर बेंगाणी बंधुओं के खिलाफ गालीगलौज शुरू कर दी, इसलिए इस बात को नजरअंदाज कर देना चाहिये। भावुकता बेहद कोमल तत्व है। भावुक होने पर इंसान रोता है ... तड़पड़ाता है। भावुकता का ताल्लुक दिल है और दीमाग से नहीं। इसलिए बाजार वाला जब भावुक हुआ तो उसके दीमाग ने काम करना बंद कर दिया और वो मार्यादाएं भूल गया। बेंगाणी बंधुओं के खिलाफ गालीगलौज पर उतारू हो गया। लेकिन यहां भी उसके निशाने पर बेंगाणी बंधु नहीं थे बल्कि मोदी और उनकी सांप्रदायिकता थी। इसलिए उसकी गालियों को नज़रअंदाज कर देना चाहिये और निष्कासन का फैसला रद्द होना चाहिये। दलील काफी मजेदार है, लेकिन वैचारिक स्तर पर उतनी ही खोखली भी। दरअसल मोदी के खिलाफ जितने घोर शब्दों का इस्तेमाल हो वो उतना कम है। रक्त में सने उसके हाथों और उसके चेहरे को देख कर मासूमों की चीखें कौंध जाती हैं। गुजरात दंगों की हक़ीक़त और राज्य की तरफ से हुए नरसंहार को शायद ही कोई संवेदनशील शख्स भूलने का साहस कर सकता है। लेकिन बाजार वाले ने मोदी पर हमला नहीं किया था, बल्कि सीधे और सीधे तौर पर बेंगाणी बंधुओं पर निशाना साधा था। उसने बेंगाणी बंधुओं को गाली दी थी। उसके लिखने का तरीका भी बेहद नीचले स्तर का था। पढ़ने पर ऐसा लगता है कि वो शख्स भले ही मोदी का विरोधी है .. लेकिन अपनी सोच और नजरिये को लेकर मोदी की तरह ही विकृत है। उसमें भी मोदी की तरह सहनशीलता जरा भी नहीं। और मेरा मानना है कि जिन लोगों में सहनशीलता नहीं होती है ... वो वैचारिक धरातल पर उतने ही खोखले होते हैं। यही नहीं सहनशील नहीं होने पर ही हिंसा जन्म लेती है और हिंसा चाहे कैसी भी हो उसका विरोध तो होना ही चाहिये। बाजार वाले भले ही धर्मनिरपेक्ष हो ... लेकिन उसने उस एक क्षण बेगाणी बंधुओं के खिलाफ हिंसक व्यवहार किया इसलिए उसे सजा तो मिलनी ही चाहिये। लेकिन सजा कैसी हो और उसका तरीका क्या हो इस पर बहस जरूरी थी। नारद से यहीं चूक हुई है ... उसने भी बाजारवाले की ही तरह भावुक होते हुए एक तुनकमिजाज फैसला ले लिया। प्रतिक्रिया में ही सही यहां वो भी हिंसक हो गया। यही नहीं उसके इस फैसले से कई सवाल उठ खड़े हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाजार वाले के समर्थक ऐसा ही एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहे हैं। वो सवाल है एग्रीगेटर की भूमिका को लेकर। सवाल जायज है। एग्रीगेटर का चरित्र कैसा हो इस पर बहस होनी ही चाहिये। क्या किसी एग्रीगेटर को इसकी इजाजत दी जा सकती है कि वो कोई राजनीतिक फैसला ले सके? क्या एग्रीगेटर भी हमें भगवा रंग, नीले रंग या फिर लाल रंग में रंगा नजर आएगा? यहां पर अब नारद समर्थक कूद पड़ते हैं। वो कहते हैं मर्यादा तो होनी ही चाहिये और जो भी मर्यादा तोड़ेगा उसे नारद सजा देगा। यही नहीं वो ये भी कहते हैं कि जिसे जहां जाना है वो चला जाए। उससे नारद का कोई सरोकार नहीं। वो सभी अपने अपने किले से ताल ठोंक रहे हैं। लेकिन उन्हें इसका अंदाजा नहीं कि ऐसा करके वो नारद की राह मुश्किल कर रहे हैं। अभी विरोध में धुरविरोधी गायब हुआ है। बात आगे बढ़ी तो कई और नाता खत्म कर लेंगे। ऐसा हुआ तो न सिर्फ नारद के बुरे दिन शुरू हो जाएंगे।&lt;br /&gt;मेरे हिसाब से एग्रीगेटर का फर्ज बनता है कि वो सब पर समान दृष्टि डाले। वो सही गलत का फैसला खुद नहीं करे, बल्कि लोगों को करने दे। क्योंकि जब कोई एग्रीगेटर खुद इस तरह के फैसले लेने लगता है तो वो खुद ही अपने चरित्र का हनन करता है। वो खुद को सीमित विचारधारा में बांध लेता है और ऐसे में उसे चुनौती भी मिलने लगती है। नारद को सोचना चाहिये कि अब से कुछ दिन पहले तक जहां सभी उसका गुणगान करते थे अब तीस फीसदी ही सही विरोध पर उतर आए हैं। ये एक एग्रीगेटर की हार है और अगर उसने अपने फैसले पर विचार नहीं किया तो आगे चल कर ऐसा हो सकता है कि कुछ और एग्रीगेटर अस्तित्व में आएं। ऐसा हुआ तब लोग उन विकल्पों की तरफ जाएंगे जो अपने फर्ज को लेकर ज्यादा ईमानदार होंगे। उस वक्त नारद के पास पछताने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।&lt;br /&gt;ऐसे में आप सोच रहे होंगे कि मैं बाजारवाले को सजा देने के पक्ष में भी हूं और नारद के फैसले के खिलाफ भी हूं ... ऐसा कैसे हो सकता है। यहां मेरा मानना है कि किसी को भी उसके अपराध की सजा देने का तरीका ये नहीं है कि उसे फांसी पर लटका दिया जाए। बाजार वाले की सजा यही होती कि उसकी बेहूदा बातों पर विचार करने की बजाए उसे वैसे ही छोड़ दिया जाता। मेरा मानना है कि कई बार हम ओछी चीजों पर प्रतिक्रिया जता कर उसे महान बना देते हैं। अगर नारद ने थोड़ा उदारता दिखाई होती और बाजारवाले को छोड़ दिया होता तो कुछ दिन बाद वो अपनी मौत मर जाता। ऐसे लोग एक बुलबुले की तरह होते हैं। जो बुलबुला जितनी तेजी से उठता है वो उतनी ही तेजी से फट भी जाता है। बाजार वाला भी एक बुलबुले की तरह है। लगता है कि उसे सिर्फ और सिर्फ गालियां देने ही आता है। उसके पास शब्दों की तरह ही विचारों की कमी भी है और जिसके पास ना तो शब्द हैं और ना ही विचार .. वो बहुत दिन तक नहीं टिका रह सकता।&lt;br /&gt;कुल मिला कर अपराध दोनों तरफ से हुए हैं। उसी का नतीजा है कि कुछ दिनों पहले तक नारद की दुनिया इतनी बड़ी थी कि वहां एक ही वक्त पर कई सार्थक बहसें होती थी, लेकिन अब ये दुनिया इतनी तंग हो गई है घुटन महसूस हो रही है। जहां पहले लोग सार्थक बहस करते नजर आते थे, वहां अचानक सभी के सभी तलवारें भांज रहे हैं। यही नहीं वो दूसरों को भी तलवारें भांजने के लिए उकसा रहे हैं .. भड़का रहे हैं। लेकिन माफ करें जनाब ये धर्मयुद्ध नहीं है। ये शोषकों के खिलाफ शोषितों का संघर्ष नहीं चल रहा है। इसलिए नारद एग्रीगेटर होते हुए भी भले ही तटस्थ नहीं रहे, लेकिन मैं और मेरे जैसे लोग इस झूठे विवाद में तटस्थ हो कर दोनों पक्षों की आलोचना करते हैं और करते रहेंगे। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2504780496929911450-8029023418745317824?l=chaukhamba.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://chaukhamba.blogspot.com/feeds/8029023418745317824/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2504780496929911450&amp;postID=8029023418745317824' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/8029023418745317824'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2504780496929911450/posts/default/8029023418745317824'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chaukhamba.blogspot.com/2007/06/blog-post_9269.html' title='माफ करें ये धर्मयुद्ध नहीं है'/><author><name>समरेंद्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07666323462491120829</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' 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