Friday, May 30, 2008

क्या हम सड़क पर चलना नहीं जानते?

दफ्तर से लौटते वक्त लगा कि गाड़ी भिड़ जाएगी। ग्रेटर कैलाश से आईटीओ की तरफ बढ़ने पर ओबेरॉय होटल के पास से बायीं तरफ इंडिया गेट के लिए रास्ता निकलता है। मैं इंडिकेटर देते हुए धीरे धीरे उधर मुड़ने लगा। लेकिन तभी एक तेज रफ्तार कार पॉवर हॉर्न बजाते हुए वायें से निकलने लगी। अगर मैंने जोर से ब्रेक नहीं दबाया होता तो हादसा तय था। ये पहली बार नहीं है। दिल्ली की सड़क पर गाड़ी चलाते हुए कुछ अधिक सतर्क रहना पड़ता है। यहां ज्यादातर लोग बेतरतीब ढंग से गाड़ी चलाते हैं। कोई साठ की लेन में तीस की रफ्तार से चलता है तो कोई चालीस की लेन में अस्सी की रफ्तार से।

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वतन को फिक्र कहां?

आज एक ख़बर आई। अमेरिका के न्यू आर्सलेंस प्रांत से। भारतीय मजदूरों की बेबसी से जुड़ी हुई। वहां पर एक कंट्रक्शन कंपनी ने पांच सौ से ज्यादा भारतीय मजदूरों पर कहर बरपाया है। इन मजदूरों को भारत के ही एक दलाल ने रहने और खाने के अच्छे इंतजाम और अच्छी तनख्वाह का लालच देकर अमेरिका पहुंचाया। लेकिन अब वहां पर उनके साथ बंधुआ मजदूरों जैसा बर्ताब हो रहा है। तीन सौ वर्ग फुट के कमरे में २५-२५ मजदूर रहने को मजबूर हैं। खाने-पीने का बंदोबस्त भी बुरा। यही नहीं विरोध करने पर कंपनी के गुंडे उनकी पिटाई भी करते हैं और पुलिस तमाशा देखती रहती है। न्याय के लिए वो मजदूर पिछले १६ दिन से भूख हड़ताल पर बैठे हैं। मानवाधिकार संगठनों के जरिये उन्होंने भारत के हुक्मरानों तक भी अपनी बात पहुंचाने की कोशिश की है। लेकिन हमारी सरकार खामोश हैं। मनमोहन सिंह चुप हैं। सोनिया गांधी भी चुप हैं।
कुछ दिनों पहले सूडान में चार भारतीयों के अपहरण की खबर आई थी। तब एक साथी ने कहा कि ऐसी ख़बरें दिखाने की क्या ज़रूरत है? लोग पैसे के लालच में वतन छोड़ कर चले जाएं और मुसीबत में फंसे तो सरकार मदद करे? ये भी कोई तुक है? पहली नज़र में सवाल सही लगते हैं। लेकिन सही हैं नहीं। दरअसल किसी भी देश से दो तबके के लोग नौकरी के लिए विदेश जाते हैं। एक तबका इंजीनियर, डॉक्टर, मैनेजर, वैज्ञानिक जैसे पढ़े लिखे लोगों का है और दूसरा मजदूरों का तबका। पहला तबका अपने सपनों को, महात्वाकांक्षाओं को नया आयाम देने के लिए जाता है। दूसरा रोजी रोटी की तलाश में, अपना और परिवार की जरूरतों को पूरा करने की कोशिश में।
हम अपने लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरी करने लायक गुंजाइश भी पैदा नहीं कर सके हैं, तो ये हमारे देश, हमारे हुक्मरानों और हमारी व्यवस्था की कमजोरी है। एक ऐसी कमजोरी जो किसी भी सम्प्रभु राष्ट्र के लिए शर्म की बात है। ऐसे में अगर लोग रोजी रोटी की तलाश में विदेश जाते हैं और वहां उनके साथ कुछ बुरा होता है तब खामोश रह कर हम सम्प्रभु राष्ट्र होने की एक और शर्त पर खरे नहीं उतरेंगे। ये अपने लोगों के साथ दोहरा विश्वासघात होगा। फिलहाल हमारी सरकार चुप रह कर अमेरिका में न्याय के लिए लड़ रहे अपने उन पांच सौ से ज्यादा नागरिकों और उनके घरवालों के साथ यही दोहरा विश्वासघात कर रही है।
तारीख - ३० मई, २००८
वक़्त - १०.30

Thursday, May 29, 2008

अंकों का बोझ

आज सुबह आठ बजे दसवीं के नतीजे आए। उस समय मैं दफ्तर में था और वहां से नौ बजे के करीब घर पहुंचा। तब तक मेरा भाई अपना नतीजा जानने के लिए कई फोन कर चुका था। परीक्षा के बाद वो छुट्टियां बिताने के लिए गांव चला गया। मेरी तरह उसे भी गांव काफी पसंद है। बलिया जिले का चौरा कथरिया गांव। सड़क के शोर से एक कोस दूर। बस से उतरने के बाद खड़ींजा पर गांव की तरफ बढ़ते हुए पहले खेत पड़ते हैं... फिर बगीचे और उसके बाद आबादी। बगीचे और आबादी के बीच करीब दो सौ मीटर की परती है। परती में कुछ बड़े गड्ढे और उन गड्ढों के बीच में पतली पतली पगडंडियां। उन्हों पगडंडियों से होकर हम लोग करीब पंद्रह फुट की ऊंचाई पर बसे गांव में दाखिल होते हैं। हमारा घर गांव के बाहरी छोर पर है। इसलिए दुआर से आबादी नहीं परती, बगीचे और खेल खलिहान नज़र आते हैं। वो खेत खलिहान और बगीचे जिन्हें देखने के लिए आंखें हर वक्त तरसती रहती हैं। अरे ये क्या? मैं लिखने बैठा था दसवीं के नतीजों पर और गांव का ब्योरा देने लगा।घर पहुंचते ही कंप्यूटर ऑन किया, लेकिन इंटरनेट ने धोखा दे दिया। फिर दोस्त विचित्र मणि को फोन किया और भाई का रोल नंबर नोट कराया।

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Wednesday, May 28, 2008

मेरे सपने, मेरी तमन्ना

जमाना बीत गया है अपने लिये कुछ लीखे हुए। दफ़्तर में तो हर रोज कई पन्ने टाइप कर लेता हूं, लेकिन अपनी ज़िंदगी को पन्नों पर दर्ज करने के लिए या यूं कहें कि अपने लिये लिखने की फुर्सत ही नहीं मिलती। खाली होने पर खालीपन का अहसास इतना गहरा हो जाता है कि कुछ भी करने का जी नहीं करता। जब से शराब और सिगरेट छोड़ दी है, कई दोस्तों से मिलने का बहाना भी छूट गया है। इसलिए ज्यादातर वक्त अब घर में कटता है। टीवी देखते, सोते और ये सोचते हुए कि ज़िंदगी के मायने क्या है। क्या यूं ही अंतहीन... अंधेरे सफ़र पर चलते जाना मेरी नियति है? क्या जीवन का सिर्फ़ इतना ही लक्ष्य है कि अपना और परिवार का पेट पाल लें? छोटे भाई-बहनों को पढ़ा लें? बच्चों के लिए कुछ जमा कर दें?
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