Friday, June 29, 2007

कोमा में भारतीय क्रिकेट

हमारे साथी अभिषेक दुबे ने बड़ी तेजी से खेल पत्रकारिता में अपनी पहचान बनाई है। कई साल तक डेस्क पर काम करने के बाद जब उन्हें टीवी पर आने का मौका मिला तो वो पूरी तरह छा गए। क्रिकेट पर वो किताब लिख चुके हैं और उन्हें करीब से जानने वाले ये मानते हैं कि खेल को लेकर उनकी समझ और जानकारी ज्यादातर खेल पत्रकारों से बेहतर है। यही वजह है कि मैंने उनसे क्रिकेट के मौजूदा हालत पर कुछ लिखने की गुजारिश की। साथी अभिषेक ने मेरी गुजारिश कबूल कर ली। बीसीसीआई अध्यक्ष शरद पवार के नाम इस चिट्ठी से वो चौखंबा पर दस्तक दे रहे हैं।

जरा सुनिये “केपीएस” पवार साहब,
ये क्या हो रहा है? मरीज बीमार है और रिश्तेदार और मित्र बेहाल है। दो साल पहले तक यही शख्स जोश से भरा हुआ था। तंदरुस्त था। लंबी चौड़ी छलांगे लगाता था। दुश्मनों के छक्के छुड़ाता था और हर किसी को अपने अंदाज से दीवाना बना देता था। लेकिन जबसे इसे संभालने और सही दिशा देने की जिम्मेदारी आपके हाथ में गई है, इसकी हालत बिगड़ती ही जा रही है। पिछले तीन महीने में तो सेहत इतनी खराब हो गई है कि मरीज आईसीयू में पहुंच गया है। कोमा में है। लेकिन इसका इलाज कराने वाला कोई नहीं। आखिर ये हो क्या रहा है?
पवार साहब, आप ये तो नहीं बोल सकते कि इस मरीज के इलाज के लिए आपके पास पैसे नहीं। भाई, आप भारतीय क्रिकेट नाम की जो दुकान चला रहे हैं, उसकी कमाई करोड़ों में नहीं अरबों में हैं। टीवी राइट्स से पैसा। स्पॉन्सरशिप से पैसा। दर्शकों से पैसा। न्यूट्रल मैदानों में एक के बाद एक मैच कराने से पैसा। आपके पास तो ऐसी मुर्गी है जो दनादन सोने का अंडा दे रही है। उसके अलावा आपके पास ललित मोदी जैसा शख्स भी है। जिनका बस चले तो मिट्टी को भी सोने के भाव बेच दें। फिर ऐसी क्या बात हो गई है कि मरीज का इलाज नहीं हो पा रहा?
पवार साहब, आप ये भी नहीं कह सकते कि ये मरीज बाहर से भले ही तंदरुस्त दिखे लेकिन असल में शुरू से ही कमजोर था। आपके अध्यक्ष बनने से पहले, आज का ये मरीज, एक दमदार नौजवान था। इसी ने वर्ल्ड कप 2003 में फाइनल तक का सफर तय किया। इसी ने ऑस्ट्रेलिया को उसकी मांद में जाकर चुनौती दी थी। इसी ने पहली बार पाकिस्तान को उसकी ही सरजमीं पर टेस्ट और वनडे में धूल चटाई। इसी ने इंग्लैंड और वेस्टइंडीज में जाकर सीरीज बराबर की। आज इसके जो हाथ पांव खराब पड़े हैं ... मैदान में उतरने के साथ ही कांपने लगते हैं ... कुछ दिनों पहले तक यही हाथ पांव एक झटके में दुश्मन को पटक देते थे। चंद दिनों में ही इतना कुछ बदल गया, आखिर कैसे?
पवार साहब, आपको ये शिकायत करने का हक भी नहीं है कि आपको मनमुताबिक टीम इंडिया चुनने की आजादी नहीं मिली। सच तो ये है कि आप भले ही अध्यक्ष हैं भारतीय क्रिकेट बोर्ड के, लेकिन ऐसा लगता है कि आप महाराष्ट्र क्रिकेट बोर्ड चला रहे हैं। राजनीति में आप चाहकर भी महाराष्ट्र से बाहर पहचान नहीं बना सके। वही हाल खेल में भी है। यहां भी आप महाराष्ट्र और पश्चिमी जोन के बाहर सोच नहीं पा रहे हैं। अगर भरोसा ना हो तो अपने सिपाहसलारों की सूची पर नजर दौड़ाएं। सीईओ रत्नाकर शेट्टी मुंबई के हैं तो उपाध्यक्ष और कांट्रैक्ट समिति के अध्यक्ष शशांक मनोहर नागपुर के रहने वाले। निरंजन शाह राजकोट के हैं तो मुख्य चयनकर्ता दिलीप वेंगसरकर मुंबई से। कोच की खोज समिति के तीन सदस्यों में से दो सुनील गावस्कर और रवि शास्त्री मुंबई से। बांग्लादेश दौरे के लिए मुंबई के रवि शास्त्री क्रिकेट मैनेजर बनाए गए तो ऑयरलैंड-इंग्लैंड दौरे के लिए पुणे के चंदू बोर्डे को क्रिकेट मैनेजर चुना गया। सवाल उठता है कि क्या देश के किसी और हिस्से में काबिल लोग हैं ही नहीं? आखिर माजरा क्या है?
पवार साहब, बात निकली है तो दूर तक जाएगी ही। सौरव गांगुली ने भारतीय क्रिकेट को क्षेत्रवाद के चंगुल से निकाला था, लेकिन आपने इसे फिर से उसी दलदल में ढकेल दिया। आखिर क्या सोच कर 34 साल के सचिन तेंदुलकर को अचानक टीम का उपकप्तान बना दिया गया? तेंदुलकर के जितने बड़े आप फैन हैं उससे शायद अधिक मैं हूं, लेकिन वर्ल्ड कप से ठीक पहले कप्तान द्रविड़ पर ये दबाव बनाना कि तेंदुलकर उनकी जगह ले सकते हैं कहां तक सही था? आखिर किस आधार पर वसीम जाफर को वनडे टीम में शामिल किया गया? कैसे राजेश पोवार बांग्लादेश में टेस्ट टीम में शामिल कर लिए गए? आखिर क्यों वीरेंद्र सहवाग के कोच ये आरोप लगाने को मजबूर हो रहे हैं कि पश्चिमी लॉबी ने सहवाग को खत्म करने के लिए युवराज सिंह का इस्तेमाल किया? चलिये एक मिनट के लिए मान लेते हैं कि वो अंधेरे में तीर चला रहे है, लेकिन आग के बिना धुआं कैसे उठ सकता है? ये तो आप भी मानेंगे की वर्ल्ड कप में पहले सहवाग को चुना गया। उसके बाद आपके मुख्य चयनकर्ता ने कहा कि कप्तान द्रविड़ के दबाव में सहवाग को चुना गया है। मान लिया कि आपने कभी गंभीर क्रिकेट नहीं खेला, लेकिन कर्नल वेंगसरकर तो खेल चुके हैं। कम से कम उन्हें तो ये अंदाजा होना चाहिए कि अहम मुकाबले से पहले किसी बल्लेबाज पर दबाव बनाना सही नहीं। फिर उनसे ये गलती कैसे हो गई?
पवार साहब, आपके सिपाहसलार हर चीज के लिए मीडिया को दोषी बताते है। लेकिन वे अपनी गिरेबां में झांककर क्यों नहीं देखते। इसमें हमारी क्या गलती कि निंबस हो या फिर जी स्पोर्ट्स, पहले हर किसी से करार होता है और फिर करार फेल हो जाता है। इसमें मीडिया कि क्या गलती कि कांट्रैक्ट मुद्दे को लेकर विवाद महीने चलता है और क्रिकेटरों को आठ महीने तक मैच फीस नहीं मिलती। चलिए, तेंदुलकर, द्रविड़, सौरव और धोनी विज्ञापन से मोटी कमाई करते हैं। लेकिन मुनाफ पटेल, पीयूष चावला, श्रीशांत और रोमेश पोवार जैसे क्रिकेटरों का क्या होगा जो नए हैं और मैच फीस पर ही निर्भर हैं। प्रसारण अधिकार का मसला हो या फिर कोच और टीम के चयन का, टीम इंडिया के खेल की बात हो या फिर खिलाड़ियों से करार की- आप और आपके सिपहसालार हर मोर्चे पर नाकाम साबित हो रहे हैं। आखिर माजरा क्या है?
पवार साहब, आपके मन में होगा कि काश, टीम इंडिया आयरलैंड और इंग्लैंड में अच्छा खेले जिससे कि विरोधियों की जुबां पर ताला लग जाए। मेरा भी दिल यही चाहता है, लेकिन दिमाग नहीं मानता। मौजूदा टीम इंडिया से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद करना भी गुनाह है। आखिर आपने किस तैयारी से भेजा इस टीम को। कांट्रैक्ट को लेकर क्रिकेटरों को अंतिम वक्त तक तनाव में रखा। अहम दौरे के लिए रवाना होने से पहले तक इस बात को लेकर सस्पेंस बरकरार रहा कि आखिर कोच कौन होगा। भारतीय क्रिकेट के चाणक्य गावस्कर ने एजेंडा चलाने के चक्कर में डेव व्हॉटमोर का पत्ता तो साफ कर दिया, लेकिन बदले में कोई विकल्प नहीं सुझाया। गावस्कर और उनके साथियों के रंगढंग देख कर ग्राहम फोर्ड को अंदाजा मिल गया कि बीसीसीआई सर्कस में शामिल होकर काम करना कितना मुश्किल होगा, इसलिए उन्होंने भी इनकार कर दिया। भरी तिजोरी के बावजूद जब आप स्थायी कोच नहीं चुन सके, तो आपने 73 साल के चंदू बोर्डे को क्रिकेट मैनेजर बना दिया। आखिर ये क्या हो रहा है?
पवार साहब, वर्ल्ड कप में हार के बाद खेलप्रेमियों का गुस्सा शांत करने के लिए आपने मुंबई में दो दिन बैठक की। लंबे चौड़े वादे किए। घरेलू क्रिकेट को बदल कर रख दूंगा। युवा टीमें तैयार होंगी। हर टीम को फीजियो और ट्रेनर दिया जाएगा। क्रिकेटरों के विज्ञापन पर लगाम लगेगी। प्रदर्शन के आधार पर क्रिकेटरों को पैसा मिलेगा। लेकिन धुर नेता की तरह चंद ही दिनों में सारे वादे भूल गए। जिस तरह से कृषि मंत्री के तौर पर आप किसानों के साथ विश्वासघात कर रहे हैं, ठीक उसी तरह बीसीसीआई अध्यक्ष के तौर पर खेलप्रेमियों को धोखा दे रहे हैं। आखिर ये कब तक चलेगा?
पवार साहब, माना कि आपके हाथों में सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है, लेकिन ये मुर्गी ही मर गई, तो फिर आप और आपके सिपाहसलारों का क्या होगा? जिस तरह से आपके सिपाहसलार काम कर रहे हैं, किसी भी दिन इस मुर्गी के मरने की खबर आ सकती है। अगर खेलप्रेमियों के लिए नहीं तो कम से कम अपने सिपाहसलारों के लिए तो इस मुर्गी को बचाईए। जड़ें खोदने का जो काम के पी एस गिल ने भारतीय हॉकी संघ के लिए किया वही काम आप भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के लिए कर रहे हैं। ऐसे में आपको केपीएस पवार कहना क्या गलत होगा? अगर बुरा लग रहा है तो गुस्ताखी माफ करें, लेकिन कहते हैं कि सच बहुत कड़वा होता है।

भवदीय
अभिषेक दुबे

"विकल्प नहीं है तो अनुकल्प से काम चलाइए"

राष्ट्रपति पर चल रही बहस में साथी विचित्र मणि के लेख पर विप्लव भाई ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं। शुरू से ही धर्म और हिंसा की सियासत करने वाली पार्टी के नुमाइंदे को कैसे सही ठहराया जा सकता है ? जो पार्टी गुजरात में नरसंहार की जिम्मेदार है उसके नुमाइंदे को इस देश के सर्वोच्च पद पर कैसे बिठाया जा सकता है ? सवाल और भी हैं और अब साथी विचित्र मणि ने विप्लव भाई के सवालों पर अपना जवाब भेजा है।

प्रिय विप्लव भाई,
जिस समय मैं यह लेख लिख रहा था, यह बात मेरे मन में ये शंका थी कि अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण प्रस्तुत हो सकता है। बावजूद इसके लिखा तो इसलिए नहीं कि भैरों सिंह शेखावत भारतीय राजनीति और इतिहास के आदर्श पुरुष हैं। यह ठीक है कि हम दलीय राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा हैं और हमारे लोकतंत्र की वह एक अहम कड़ी है। लेकिन जब राष्ट्रपति के चुनाव का सवाल आता है, तो उसे दलीय जोड़ तोड़ से ऊपर रखकर आंकने की जरूरत होती है। राष्ट्रपति पद के लिए इस बार कांग्रेस की अगुवाई में जिस प्रतिभा पाटील को मैदान में उतारा गया है, उन प्रतिभा जी से तुलना करने पर शेखावत मीलों आगे नजर आते हैं।
रही बात विचारधारा से दशकों तक जुड़े रहने की, तो विप्लव भाई, उदाहरण तो यही बताते हैं कि समता मूलक समाज बनाने वाले नाम की पार्टियों में भी कितने अच्छे लोग हैं। उंगली पर गिन कर देखिए, दोनो हाथों की उंगलियां ज्यादा पड़ जाएंगी। एक उदाहरण लीजिए। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी में अमर सिंह भी हैं। कल अगर तीसरा मोर्चा कहीं सेकुलरिज्म के नाम पर अमर सिंह को ही राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना देती तो क्या पार्टी की समाजवादी विचारधारा के नाम पर उनका समर्थन किया जा सकता था। फिर अमर सिंह की छोड़िये, जिनका कोई राजनीतिक दीन ईमान ही नहीं है। लोग कहते हैं, हालांकि मैं नहीं मानता, कि कम्युनिस्टों से ज्यादा विचारधारा और आदर्श से जुड़ा कोई नहीं होता। लेकिन पश्चिम बंगाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य जिस आदर्श का परिचय दे रहे हैं, उसे आप क्या कहेंगे। कहां चले जाते हैं सर्वहारा के सृजनहार। आखिर टाटा या सलेम ग्रुप के लिए बुद्धदेव से लेकर सीताराम येचुरी और प्रकाश करात तक क्यों किसान विरोधी भाषा समवेत स्वर में बोलने लगते हैं। गुजरात में मोदी ने बेगुनाह मुसलमानों को मरवाया, पश्चिम बंगाल में बुद्धदेव ने दीन हीन किसानों को। क्या फर्क है दोनो में। जरा बताइए। और हां, जो किसान मारे गये हैं ना पश्चिम बंगाल में, उनमें बहुतेरे मुसलमान भी हैं। जी हां, मुसलमान, जिनकी आड़ लेकर इस देश में बहुतों की सेकुलर दुकान चलती है। लेकिन साठ साल में मुसलमानों का भला कैसे हो, इसके बारे में मुकम्मल एजेंडा उनके पास नहीं है। और चलते चलते बात कांग्रेस की। पीछे मुड़कर देख लीजिए, कांग्रेस धर्म के नाम पर दंगों में अपनी साजिश की वजह से बेगुनाहों के खून से रंगी नजर आएगी। चाहे मेरठ का दंगा हो या भागलपुर का या फिर दिल्ली में सिख विरोधी दंगा। कांग्रेस हर जगह जल्लाद के कटघरे में खड़ी दिखेगी। इस तरह देखिए तो कांग्रेस, भाजपा, कम्युनिस्ट सभी एक ही चेहरे के अलग अलग क्लोन नजर आते हैं। बस नजरों का धोखा है कि हम उन्हें गलत मानते हैं।
विप्लव भाई, देश की मौजूदा राजनीति से लोगों का मोह भंग हो चुका है। लोग चाहते हैं, एक नई राजनीति की शुरुआत हो। लेकिन जब तक ये प्रयास किसी अंजाम तक नहीं पहुंचता या यूं कहें कि कोई सार्थक विकल्प पेश नहीं होता, तब तक हमें छोटे छोटे अनुकल्पों से ही काम चलाना होगा। राष्ट्रपति पद के चुनाव में भैरों सिंह शेखावत फिलहाल वैसे ही एक अनुकल्प हैं।
आपका विचित्र मणि

"सभी कुछ कम, कुछ ज्यादा खतरनाक हैं"

चौखंबा पर राष्ट्रपति चुनाव को लेकर एक बहस चल रही है। इसकी शुरुआत साथी मणीष के लेख से हुई फिर साथी विचित्र मणि ने अपनी राय रखी। इन पर कई प्रतिक्रियाएं आईं। सबसे सटीक प्रतिक्रिया विप्लव भाई ने दी। उन्होंने कई गंभीर सवाल उठाए हैं। सवाल जो बहस को नई दिशा दे सकते हैं। उनकी इस प्रतिक्रिया को हम आपके सामने रख रहे हैं। इस उम्मीद में कि और लोग भी सामने आएंगे और एक सार्थक बहस होगी।

अगले राष्ट्रपति की पसंद-नापसंद पर अच्छी बहस चल रही है। लेकिन कुछ अ-राजनैतिक(apolitical) है। राजनीति के मैदान में किसी भी अहम किरदार की जगह उसकी राजनीतिक विचारधारा के बिना, या उसे अलग करके तय करना कितना सही है? इस कसौटी पर कलाम, प्रतिभा पाटिल और भैरों सिंह शेखावत - सभी कुछ कम, कुछ ज्यादा खतरनाक हैं। जनता के हित में, आम आदमी के हक में खड़ा होने का माद्दा इनमें से किसी में नहीं है। हो भी नहीं सकता है। इन सभी का विचारधारागत रुझान या उसका अभाव इसकी इजाज़त नहीं देता। इस लिहाज से बेशक के आर नारायणन आज़ाद हिंदुस्तान के सबसे बेहतर राष्ट्रपति लगते हैं। हालांकि उनके कार्यकाल ने बार-बार ये भी साबित किया कि राष्ट्रपति देश का सर्वोच्च पद है जरूर, लेकिन देश राजनीति में उसकी अहमित सिर्फ सांकेतिक ही है। और संसदीय ढंग के लोकतंत्र में ये गलत भी नहीं है। इस तरह से देखें, तो हमें वैसे ही राष्ट्रपति मिलते हैं, जैसी हमारी संसद और विधानसभाएं होती हैं। भ्रष्ट, अपराधी और जन विरोधी प्रतिनिधियों के समर्थन से सरकार बनाने वाले प्रधानमंत्री हों या उनके वोट से चुनकर आने वाले राष्ट्रपति, इनसे किसी क्रांतिकारी बदलाव या जनता के हक की आवाज बुलंद करने की उम्मीद करना शेखचिल्ली के सपने से कम नहीं। यहां साध्य और साधन के रिश्ते पर गांधी के विचार और वर्ग चरित्र पर मार्क्स का चिंतन, दोनों सटीक नजर आते हैं। एक बात और, "गलत खेमे में खड़ा सही आदमी" ये लेबल काफी अरसे तक अटल बिहारी वाजपेयी पर चिपकाया जाता रहा। कितना बेमतलब था ये लेबल, अब तक शायद साफ हो चुका है। अब इस लेबल को शेखावत पर चिपकाना, कुछ समझ नहीं आता। राजनीति के मैदान में, ना सिर्फ गलत खेमे में खड़ा, बल्कि बरसों उसकी पतवार थामने वाला, उसकी कमान अपने हाथ में रखने वाला कोई धुरंधर, सही कैसे हो सकता है? गुजरात में नरसंहार करने वाली जमात के प्रतिनिधि और अगुवा, देश के किसी भी सर्वोच्च पद पर बैठने के लायक कैसे समझे जा सकते हैं? नफरत की बुनियाद पर खड़ी विचारधारा को सीने से लगाए रखने वाले लोग, बड़े दिलवाले और उदार राजनेता कैसे हो सकते हैं? ये कुछ सवाल हैं, जिन पर सोचने की जरूरत है। फिलहाल इतना ही। हालांकि बात अभी अधूरी है। शायद ठीक से शुरू भी नहीं हो पाई है। लेकिन एक साथ लंबा लिखते जाना, कुछ एकालाप सा लगता है। ये विषय ऐसा है, जो संवाद मांगता है। विचारों का आदान-प्रदान मांगता है। इसलिए आगे की बात आगे होगी....

विप्लव

Tuesday, June 26, 2007

राजनीति के दंगल में राष्ट्रपति

राष्ट्रपति को लेकर उठापटक जारी है। सबसे चौंकाने वाली पलटी शिवसेना ने मारी है। मराठी अस्मिता का नारा देते हुए ठाकरे कांग्रेस की गोद में जा बैठे हैं। इससे प्रतिभा पाटील की दावेदारी और मजबूत हो गई हैं। ऐसे में सवाल यही है कि क्या इस देश को एक रीढ़विहीन प्रधानमंत्री के बाद एक वैसा ही राष्ट्रपति भी मिलेगा ? इसी अहम सवाल पर रोशनी डाल रहे हैं हमारे साथी विचित्र मणि
वही हुआ, जो होना था। पहले शक था, लेकिन एक झटके में उसके यकीन में बदलते देर नहीं लगी। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने दो टूक कह दिया कि राष्ट्रपति पद के चुनाव में वह भैरों सिंह शेखावत के साथ नहीं बल्कि प्रतिभा पाटील के पक्ष में खड़े हैं। शिवसेना के इस रवैये पर बीजेपी ने छाती कूटना शुरु किया कि ठाकरे ने तो पीठ में छूरा घोंपा है। ये तो विश्वासघात है। पता नहीं, बीजेपी को शिवसेना पर कितना विश्वास था लेकिन शिवसेना का इतिहास तो यही बताता है कि बड़ी ताकतों के आगे झुक जाना उसकी फितरत है। ठाकरे ने वही किया, जो उनसे अपेक्षित था।

लेकिन राजनीति ऐसे ही मौकों पर दुर्गम इम्तिहान लेती है। 25 जून को निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उप राष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत ने राष्ट्रपति पद के लिए पर्चा दाखिल किया। और शाम होते होते बाल ठाकरे ने कह दिया कि मराठा सम्मान के लिए वो पाटील को वोट देंगे, शेखावत को नहीं। दोनों घटनाएं जिस तारीख को हुईं, उसकी बड़ी अहमियत है। आखिर 32 साल पहले वो 25 जून की ही काली रात थी, जब सत्ता के नशे में चूर श्रीमति इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया था। तब जय प्रकाश नारायण समेत विपक्ष के तमाम नेता एक झटके में काल कोठऱी में ठूंस दिये गए। विपक्ष तो छोड़िये, कांग्रेस के कद्दावर नेता चंद्रशेखर को भी रातो रात गिरफ्तार कर लिया गया। जिसने भी इंदिराशाही के खिलाफ और लोकशाही के पक्ष में आवाज उठायी, उसकी नियति उसे सलाखों के पीछे ले गयी। शेखावत भी उन्हीं लोगों में से थे, जिन्होंने लोकतंत्र के पक्ष में जेल जाने का रास्ता चुना। लेकिन जानते हैं, हिंदू तन मन जीवन की बात करने वाले बाल ठाकरे ने क्या किया था? इंदिरा गांधी के आतंक और अपने स्वार्थ और सुविधा के लिए ठाकरे ने इंदिरा गांधी से माफी मांग ली थी और उस जमात में शामिल हो गये, जो जम्हूरियत का जनाजा निकालने में जुटा था।

32 साल बाद इतिहास ने खुद को कमोबेश वैसे ही दुहराया। बल्कि और विद्रूप तरीके से। भले नाम मराठी अस्मिता का दिया गया हो लेकिन ठाकरे तो कांग्रेस की झोली में जा गिरे। और कांग्रेस ने क्या किया। धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने वाली कांग्रेस को शिवसेना से वोट मांगने में हिचक नहीं हुई, जिसे वो सांप्रदायिक और देश की सबसे बड़ी सांप्रदायिक पार्टी मानती है। बीजेपी से भी ज्यादा। उस हाल में अगर प्रतिभा पाटील चुनाव जीत जाती हैं तो कांग्रेस शिवसेना की मदद का दाग कैसे धोएगी। लेकिन सच कहिये तो ये सवाल उठाना ही बेमानी है, क्योंकि ऐसे सवाल उनकी आत्मा को कचोटते हैं, जिनके लिए सिद्धांत हर हाल में स्वार्थों से बड़े होते हैं। उनके लिए नहीं, जिनकी सियासत की तराजू पर स्वार्थ और सुविधा का पलड़ा सिद्धातों पर भारी पड़ जाता है। कांग्रेस ने वही किया और पहली बार नहीं किया। और शिवसेना? आज वह मराठा हित की बात करती है लेकिन पिछली बार उप राष्ट्रपति के चुनाव में उसका मराठा प्रेम कहां चला गया था, जब उसने सुशील कुमार शिंदे को वोट नहीं दिया था। जबकि शिंदे तो महाराष्ट्र से ही हैं। तो क्या ये माना जाए कि शिंदे का दलित होना ठाकरे को रास नहीं आया था या अवसरपरस्ती शिवसेना का मूल मंत्र है?

तो ये तो तय माना जा रहा है कि प्रतिभा पाटील ही अगली राष्ट्रपति होंगी क्योंकि वोटों का मौजूदा समीकरण साफ साफ उनके पक्ष में जाता है। यूपीए उनके साथ है, वामपंथियों को उनमें महिला सशक्तिकरण का आभास मिलता है और सेकुलर नीतियों की खुशबू, बहन मायावती को केंद्र से बनाकर रखना है, लिहाजा उनके लिए भी प्रतिभा ताई से बेहतर कोई और नहीं। और आखिरकार शिवसेना भी साथ खड़ी हो गयी। दूसरी तरफ निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में डटे शेखावत के पक्ष में पूरा एनडीए भी नहीं है। जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष शरद यादव तो साथ हैं लेकिन नीतीश को शेखावत रास नहीं आते। रही बात नवजात तीसरे मोर्चे की, तो उसमें भी कई अगर मगर हैं। धर्मनिरपेक्षता के बहाने कई पार्टियां शेखावत से दूर खड़ी हैं। बावजूद इसके शेखावत खम ठोंककर मैदान में डटे हैं। हो सकता है कि वो हार जाएं लेकिन कई बार हार का संघर्ष जीत की बधाइयों से ज्यादा सुहाना होता है। पिछले चुनाव को याद कीजिए। बीजेपी ने पहले तो तत्कालीन उप राष्ट्रपति कृष्णकांत को उम्मीदवार बनाने का ऐलान किया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तो फोन करते अपने जमाने के युवातुर्क को बधाई भी दे दी थी। लेकिन ऐन मौके पर बीजेपी ने पलटी मार दी और मैदान में ला खड़ा किया एपीजे अब्दुल कलाम को। क्या कांग्रेस, क्या समाजवादी पार्टी, सबने कलाम की जयजयकार शुरू कर दी। क्या इसकी वजह कलाम की योग्यता थी। बेशक कलाम जितने बड़े वैज्ञानिक हैं, कहीं उससे बड़े इंसान हैं। और याद रखिए, विद्वान मिल जाते हैं, इंसान नहीं मिलते। लेकिन राष्ट्रपति के तौर पर अपने कार्यों से जो अमिट छाप के आर नारायणन ने छोड़ी है, उस स्तर पर दूसरा कोई राष्ट्रपति नहीं टिकता।

वो नारायणन ही थे, जो पहली बार कतार में खड़ा होकर आम लोगों की तरह वोट डालने पहुंचे थे और इस मिथक को तोड़ा था कि राष्ट्रपति वोट नहीं डालता। वो नारायणन ही थे, जिन्होंने गुजराल सरकार के कहने पर यूपी में और वाजपेयी के कहने पर बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू करने के सिफारिश को पहली बार सिरे से खारिज कर दिया था। वो नारायणन ही थे, जिन्होंने वाजपेयी सरकार की तरफ से संविधान समीक्षा के प्रस्ताव पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करके जता दिया था कि हमारे संविधान में कोई खोट नहीं है। वो नारायणन ही थे, जिन्होंने दुनिया के बाहुबली बने फिरने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की आंखों में आंखे डालकर ये कहने का साहस दिखा सके कि कश्मीर दुनिया का सबसे खतरनाक जगह नहीं है और हां, अगर दुनिया ग्लोबल विलेज में बदल रही है तो उस गांव को सारे पंच मिल कर चलाएंगे, कोई चौधरी नहीं। कहते हैं कि ये बात अमेरिका की पिछलग्गू वाजपेयी सरकार को अच्छी नहीं लगी थी। लेकिन इससे अपने नारायणन का क्या बिगड़ता है? उनके लिए राष्ट्रीय अस्मिता बड़ी थी, अपना स्वार्थ नहीं। और हां, जब गुजरात में मोदी सरकार ने नरसंहार शुरू कराया तो नारायणन ने प्रधानमंत्री वाजपेयी को चिट्ठी लिखकर कहा कि ये सब रोको। लेकिन भाषणवीर वाजपेयी और पाखंड की पुजारन बीजेपी से आप समरस समाज बनाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। वही हुआ, पहले गुजरात जला और उसके बाद जब राष्ट्रपति चुनाव का समय आया और कुछ लोगों ने नारायणन का नाम दोबारा राष्ट्रपति के लिए सामने लाया तो बीजेपी का कलेजा जलने लगा। लेकिन मजे देखिये कि बीजेपी ही नहीं, कांग्रेस और मुलायम सिंह जैसे दलितों-पिछड़ों-उपेक्षितों-वंचितों के आलमबरदारों को भी नारायणन सुहाते नहीं थे। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को छोड़ दें तो किसी बड़े नेता ने नारायणन के पक्ष में एक बयान तक देना गवारा नहीं समझा। लेकिन जब इतने विरोध थे, तो नारायणन ने ही खुद को इस दांवपेंच से अलग कर लिया।

अतीत के आंगन में झांकने का आशय ये नहीं था कि पुरानी यादों को ताजा किया जाए बल्कि कहने का मतलब ये है कि मौजूदा राजनीति में असरदार राष्ट्रपति किसी को नहीं चाहिए। मौजूदा राष्ट्रपति डॉक्टर अब्दुल कलाम के प्रति बिना किसी किस्म का अनादर भाव प्रकट किये ये तो कहा ही जा सकता है कि राष्ट्रपति के तौर पर बच्चों में जरूर उन्होंने बडा भाव जगाया लेकिन राष्ट्र प्रमुख के तौर पर उनका कार्यकाल सतही ही रहा। उस हाल में नया राष्ट्रपति जाति-लिंग-धर्म के दायरे से बाहर एक सुलझा हुआ राजनेता होना चाहिए जो नीर-क्षीर विवेक का इस्तेमाल करके सही फैसला सुना सके। शेखावत का इतिहास भले ही बीजेपी से जुड़ा रहा है लेकिन पिछले पांच साल में बतौर उपराष्ट्रपति उन्होंने साबित कर दिया है कि वो दलगत राजनीति की परिधि से बाहर निकल चुके एक ईमानदार और साफगोई पसंद बड़े दिल के राजनेता हैं। तो क्या कभी बीजेपी से उनका साथ ही उनकी राह में रोड़ा होना चाहिए। रत्नाकर तो डाकू था लेकिन राम नाम की ताकत ने उसे महर्षि बाल्मीकि बना दिया।

और फिर ये कैसे कहा जा सकता है कि शेखावत जीत नहीं सकते। 1969 में सबको यही लग रहा था कि कांग्रेस के उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी चुनाव जीत जाएंगे लेकिन वराह वेंकट गिरि ने उन्हें धूल चटा दिया था। करिश्मे बार बार नहीं होते लेकिन कई बार इतिहास खुद को दोहराता तो जरूर है। लिहाजा, मन साध कर देखते रहिए कि देश के पहले नागरिक के चुनाव में होता क्या है।

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