Thursday, April 2, 2009

बिकता है कानून खरीदार चाहिये

एक बार फिर साबित हो गया कि देश में कानून और इंसाफ़ जैसे शब्दों की कोई अहमियत नहीं। अगर आपके पैसा और ताकत हो तो घिनौने से घिनौना अपराध करके भी बच सकते हैं। सीबीआई जैसी जांच एजेंसियां आपको बचाने में मदद करेंगी। अगर ऐसा नहीं होता तो १९८४ के दंगों के आरोपी आज जश्न नहीं मना रहे होते। दिल्ली की सड़कों पर सिखों का नरसंहार करने और कराने वालों को सज़ा जरूर मिलती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सीबीआई ने एक बार फिर जगदीश टाइटलर के खिलाफ चल रहे केस को बंद करने की इजाजत मांगी है। सीबीआई की शह पर टाइटलर अब मीडिया को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। टाइटलर के मुताबिक मीडिया ही है जो केस को जिंदा रखना चाहती है, वरना उनकी बेगुनाही कब की साबित हो गई होती।

दूसरा मामला संजय दत्त का है। संजय दत्त ने कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज पर धमकाने का आरोप लगाया है। जिसके जवाब में हंसराज भारद्वाज का कहना है कि संजय दत्त कांग्रेस के अहसान भूल गए। कौन से अहसान? क्या कांग्रेस ने संजय दत्त को बचाने में मदद की है? ऐसा नहीं कि लोगों को ये अहसास नहीं कि संजय दत्त की मदद की गई है। सभी को ये अंदाजा है कि संजय दत्त को बचाया गया है। अगर ऐसा नहीं होता तो अबू सलेम का साथी आज एक बड़ी पार्टी का महासचिव नहीं बन पाता। फिर भी कानून मंत्री को इस खौफनाक सच का इजहार नहीं करना चाहिये। ऐसा करके वो न्यायपालिका और न्यायिक व्यवस्था के चरित्र पर सवाल खड़े कर रहे हैं। साथ ही उन हजारों, लाखों लोगों की उस आखिरी उम्मीद को भी तोड़ रहे हैं जिसके बल पर वो लोग इंसाफ़ की लड़ाई लड़ते हैं।

Tuesday, March 31, 2009

रोना छोड़ करें भविष्य की पत्रकारिता का स्वागत

दैनिक हिंदुस्तान की संपादक मृणाल पांडे ने अपने लेख में कुछ अहम मुद्दे उठाए हैं. पहला मुद्दा पत्रकारिता के गिरते स्तर से जुड़ा है. मृणाल पांडे ने रविवार को अपने कॉलम कसौटी में लिखा है कि “यह एक विडंबना ही है कि जिस वक्त दुनिया के अनेक महत्वपूर्ण अखबारों के जनक और वरिष्ठ पत्रकार, इंटरनेट और अभूतपूर्व आर्थिक मंदी की दोहरी चुनौतियों से जूझते हुए नई राहें खोज रहे हैं, वहीं हमारे देश में (संभवत: पहली बार) लहलहा चले ज्यादातर भाषाई अखबारों को यह गलतफहमी हो गई है कि लोकतंत्र का यह गोवर्धन जो है, उन्हीं की कानी उंगली पर टिका हुआ है। इसलिए वे कानून से भी ऊपर हैं”।

यही नहीं अखबारों की हकीकत को बयां करने के बाद वो पत्रकारों के एक सच को बड़ी बेबाकी से बयां करती हैं. उनके मुताबिक “ऐसे तमाम उदाहरण आपको वहां मिल जाएंगे, जहां हिन्दी पत्रकारों ने छोटे-बड़े शहरों में मीडिया में खबर देने या छिपाने की अपनी शक्ति के बूते एक माफियानुमा दबदबा बना लिया है”। वो इसे और भी आगे बढ़ाती हैं। वो कहती हैं कि चंद भाषाई पत्रकार दलाली के स्तर पर उतर आए हैं। “वो (पत्रकार) सरकारी नियुक्तियां, तबादलों और प्रोन्नतियों में बिचौलिया बनकर गरीबों से पैसे भी वसूल रहे हैं और भ्रष्ट सत्तारूढ़ नेताओं को मुफ्त में ओबलाइज करके उनसे सस्ते में जमीनी और खदानी पट्टे हासिल कर रहे हैं, इसके भी कई चर्चे हैं”।

साफ है कि मृणाल पांडे ने भाषाई संस्थानों और पत्रकारों पर ये बहुत संगीन आरोप लगाए हैं। लेकिन अपने इस लेख में उन्होंने किसी एक संस्था और पत्रकार का नाम तक नहीं लिया है। ये बहुत ही जनरलाइज्ड स्टेटमेंट है और ऐसे स्टेटमेंट का कोई मतलब नहीं होता। मगर मृणाल पांडे कोई मामूली शख्स नहीं हैं। वो एक अनुभवी पत्रकार हैं। एक बड़े और सम्मानित अखबार की संपादक हैं। कई किताबें लिख चुकी हैं। इसलिए उनके आरोपों को गंभीरता से लेना चाहिये। सोचना चाहिये कि ये स्थिति क्यों हुई है? क्यों पत्रकारों का सम्मान घटा? और क्यों पत्रकार दलाल बन गए? इसे समझना आसान नहीं है मगर ज्यादा मुश्किल भी नहीं।

मृणाल के लेख से उठे सवालों का आधा जवाब उनके लेख के पहले हिस्से में हैं। आधा इसलिए कि उन्होंने आधा सच ही लिखा है। शायद पूरा सच लिखने का साहस उनमें नहीं था। मृणाल लिखती हैं कि “पाठकों को सबसे सस्ता अखबार देने की होड़ में अखबार दामी विज्ञापनों के बूते अपनी असली लागत से कहीं कम (लगभग 1/10वीं) कीमत पर बेचे जाते रहे हैं। और इधर बाजार की मंदी के कारण वह विज्ञापनी प्राणवायु लगातार घटती जा रही है”।

यहां पाठकों को सबसे सस्ता अखबार देने की होड़ नहीं थी। जब टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स में दाम कम करने की होड़ शुरू हुई तो यकीनन उसका मकसद ज्यादा से ज्यादा पाठक बटोरना था। मगर इसलिए नहीं कि ज्यादा अखबार बेच कर ज्यादा मुनाफा कमाएंगे, बल्कि इसलिए कि कंपनियों को ये कहा जा सके कि हमारा अखबार सबसे ज्यादा बिकता है (छपता है) इसलिए आप हमें विज्ञापन ज्यादा दें। इस तरह इन बड़े अखबारों ने पाठकों के पैसे से ज्यादा अहमियत विज्ञापनों को दी। यही वजह है कि आगे चल कर इन्होंने पाठकों से ज्यादा हित कंपनियों का साधा। विज्ञापनों के लिए ये पाठकों के हितों से समझौता करने में गुरेज नहीं करते। कुछ खबरों को दबाने और कुछ खबरों को खेलने का मकसद भी कंपनियों से संबंधों के आधार पर तय होता है।

अब इसी सच का दूसरा पहलू। आप सबको मालूम होगा कि कुछ दिन पहले अखबारों के नुमाइंदों ने सरकार के सामने आर्थिक मंदी से उठी मुश्किलों का जिक्र किया था। जिसके बाद सरकारी विज्ञापनों का कोटा बढ़ा दिया गया। प्राणवायु पंप होने लगी। फेंफड़ों में नई जान आ गई। आखिर सरकारी विज्ञापन किसके जरिये मिलते हैं? नेता और अधिकारियों के जरिये। जब नेता और अधिकारियों का अहसान इन अखबारों पर इतना बड़ा हो तो ये उनके खिलाफ कैसे लिखें और कैसे छापे? ये दलाली का एक बड़ा सच है। निचले स्तर पर मौजूद भाषाई पत्रकारों और अखबारों की इतनी औकात नहीं कि वो पत्रकारिता के मुंह पर कालिख पोत सकें... उनकी इतनी हैसियत नहीं कि वो लोकतंत्र का सौदा कर सकें... सच यही है कि ये काम बड़े अखबारों और बड़े पत्रकारों ने किया है। इसलिए भला तो यही होता कि मृणाल पांडे अपना निशाना सबसे पहले उन बड़े दलालों की तरफ साधती। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। फिर भी उन्होंने आधा ही सही एक सच बयां करने का साहस तो किया है। इसके लिए उन्हें साधुवाद।

अब मृणाल का एक और आरोप। उन्होंने ये आरोप इंटरनेट और ब्लॉग जगत के कुछ गिद्धों पर लगाए हैं। मृणाल लिखती हैं कि “इंटरनेट पर कुछेक विवादास्पद पत्रकारों ने ब्लाग जगत की राह जा पकड़ी है, जहां वे जिहादियों की मुद्रा में रोज कीचड़ उछालने वाली ढेरों गैर-जिम्मेदार और अपुष्ट खबरें छाप कर भाषायी पत्रकारिता की नकारात्मक छवि को और भी आगे बढ़ा रहे हैं। ऊंचे पद पर बैठे वे वरिष्ठ पत्रकार या नागरिक उनके प्रिय शिकार हैं, जिन पर हमला बोल कर वे अपने क्षुद्र अहं को तो तुष्ट करते ही हैं, दूसरी ओर पाठकों के आगे सीना ठोंक कर कहते हैं कि उन्होंने खोजी पत्रकार होने के नाते निडरता से बड़े-बड़ों पर हल्ला बोल दिया है। यहां जिन पर लगातार अनर्गल आक्षेप लगाए जा रहे हों, वे दुविधा से भर जोते हैं, कि वे इस इकतरफा स्थिति का क्या करें? क्या घटिया स्तर के आधारहीन तथ्यों पर लंबे प्रतिवाद जारी करना जरूरी या शोभनीय होगा? पर प्रतिकार न किया, तो शालीन मौन के और भी ऊलजलूल अर्थ निकाले तथा प्रचारित किए जाएंगे”। ये मसला बहुत गंभीर है। अगर कोई सिर्फ अपनी क्षुद्र अहम् को तुष्ट करने के लिए और बतौर खोजी पत्रकार स्थापित करने के लिए ऐसा कर रहा है तो उसे दंड मिलना चाहिये। किसी को भी यह हक नहीं कि वो बिना किसी सबूत दूसरों पर कोई आरोप लगाए या फब्तियां कसे। ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिये। केस दर्ज किया जाना चाहिये। लेकिन केस न्याय पाने की मंशा से दर्ज हो तो ठीक है, परेशान करने की मंशा से नहीं। हाल ही में कुछ पत्रकारों ने पत्रकारों पर और कुछ अखबारों ने पत्रकारों पर जो केस दर्ज किये हैं उनमें न्याय पाने की मंशा कम अपनी ताकत के जरिये दूसरों को परेशान करने की मंशा ज्यादा रही है।

इसी से जुड़ी एक और बात। अखबार अगर पत्रकारिता का अतीत और वर्तमान हैं तो इंटरनेट और ब्लॉग भविष्य। एक संवेदनशील शख्स अपने भविष्य को हेय दृष्टि से देखे ये सही नहीं। इंटरनेट और ब्लॉग ने ये सुविधा दी है कि कोई पत्रकार अगर चाहे तो मुफ्त में या फिर चंद पैसों में अपनी बात पाठकों तक पहुंचा सके। वो बात जिसे छापने और दिखाने का साहस ना तो अखबारों में है और ना ही टीवी न्यूज चैनलों में। इस लिहाज से देखें तो ब्लॉग और इंटरनेट ने बहुत से पत्रकारों को अपना कर्म और धर्म पूरा करने की सहूलियत दी है। साथ ही पत्रकारों पर संस्थाओं की तरह से हो रहे अन्याय के विरुद्ध बोलने के मंच दिया है। सूचना के अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी को नया आयाम दिया है। ये बहुत बेहतरीन चीज है और इसलिए जब मृणाल ये कहती हैं कि “क्या आप जानते हें कि आज भी इंटरनेट पर 85 प्रतिशत खबरों का स्रोत प्रिंट मीडिया ही है। वजह यह, कि सर्च इंजिन गूगल हो अथवा याहू, दुनियाभर में अपने मंजे हुए संवाददाताओं की बड़ी फौज तैनात करने की दिशा में अभी किसी इंटरनेट स्रोत ने खर्चा नहीं किया है। और वह करे भी, तो रातोंरात अखबार के कुशल पत्रकारों जैसी टीम वह खड़ी नहीं कर सकेंगे” तो वो गलत कहती हैं। इससे जाहिर होता है कि उन्हें इंटरनेट का “क...ख...ग...” भी नहीं मालूम। यही तो इंटरनेट की खासियत है कि उसे ऐसा कुछ भी करने की जरूरत नहीं। अमेरिका से लेकर भारत के एक छोटे कस्बे में बैठा लेखक अपनी ब्लॉग या साइट पर जो कुछ भी लिख रहा है वो पूरी दुनिया के लिए उपलब्ध है। अगर आपको जरूरत हो तो आप उस खबर या विचार को पढ़ें। उसके बारे में तहकीकात कर लें। एक दो जगहों से उसकी जांच कर लें। अगर वो बात गलत है तो उसे छोड़ दें। अगर सही है तो उसका इस्तेमाल कर लें। घर और दफ्तरों में बैठ कर लिख रहे हजारों, लाखों, करोड़ों की संख्या में ये लोग ही तो इंटरनेट की असली ताकत हैं। ये इंटरनेट के रिपोर्टर, लेखक, विचारक और संपादक... सबकुछ हैं। गूगल तो सर्च इंजन है और इस सर्च इंजन ने इंटरनेट के इन तमाम रिपोर्टरों, लेखकों और विचारकों को एक दूसरे से जोड़ दिया है।

अब आखिरी बात। अगर किसी अखबार में इंटरनेट विंग है तो उस वेब विंग का अपना अलग अस्तित्व है। जिस तरह आप अखबार के मालिक के तमाम कारोबारों को अखबार का कारोबार नहीं मान सकते ठीक उसी तरह वेबसाइट को भी अखबार की मिल्कियत नहीं समझना चाहिये। ये भी नहीं समझना चाहिये कि वेबसाइट पर काम कर रहा पत्रकार किसी मायने में अखबारों के दिग्गज पत्रकारों से कमतर है। हो सकता है कि कम्प्यूटर के सामने बैठ कर ठुक... ठुक करता वही नया पत्रकार भविष्य में पत्रकारिता का नाम रोशन कर जाए।

Tuesday, December 9, 2008

कुछ दिन ज़िंदगी के नाम

ब्लॉग की दुनिया में चार महीने बाद लौट रहा हूं। बीते चार महीनों में मैंने अपने लिये कुछ नहीं लिखा। सिर्फ नौकरी की, लेकिन अब नौकरी से मुक्त हो चुका हूं और वो हर काम कर रहा हूं जिसके लिए मन तरसता था। सुबह देर तक सोता हूं। अख़बार पढ़ता हूं। किताबें पढ़ता हूं। बच्चे के साथ खेलता हूं। गाना सुनता हूं। रात देर तक टीवी देखता हूं। अपने दोस्त गिरिजेश के पास से २९ बेहतरीन फिल्मों की डीवीडी ले आया हूं और हर रोज रात ग्यारह बजे के बाद एक फिल्म देखता हूं। १२ तारीख का रिजर्वेशन है गांव जा रहा हूं। करीब दो हफ्तों के लिए गांव में रहूंगा। आलू की पहली फसल पक चुकी है और अब आलू कोड़ने (जमीन से आलू निकालने) का वक़्त है। वहीं खेत में आलू भून कर खाऊंगा। गंगा किनारे बैठ कर ज़िंदगी को करीब से देखूंगा। अगले दो-तीन महीने तक सिवाये घूमने और सोचने के कुछ और नहीं करना है।

इस दौरान मैं सोचना चाहता हूं कि मीडिया में लौटूं या पूरी तरह गांव लौट जाऊं। गांव लौटने के ख्याल का सब विरोध कर रहे हैं। दोस्त और घर के लोग भी। सबका कहना है कि गांव लौटने लायक नहीं रह गए हैं। बात सही है। गांव की हालत बहुत बुरी है। लेकिन क्या मीडिया रहने लायक है। क्या मीडिया में वो बुराइयां नहीं हैं जो गांवों में हैं या फिर इस पूरी व्यवस्था में हैं। जाति की राजनीति मीडिया में भी है। धर्म के ठेकेदार भी हैं। क्षेत्रवाद भी हावी है। दलाली मीडिया के लोग भी करते हैं। चंद अपवादों को छोड़ दें तो जितना बड़ा पत्रकार उतना बड़ा दलाल। साज़िशें यहां भी खूब होती हैं। आप कोई साज़िश मत करिये, लेकिन आपके ख़िलाफ़ साज़िश करने वालों की कमी नहीं होगी। तो फिर मीडिया में क्यों लौटा जाए? क्या सिर्फ़ इसलिये कि यही काम करना आता है और उम्र के इस पड़ाव पर कोई दूसरा काम करना मुमकिन नहीं। रोजी रोटी चलानी है तो मीडिया में किसी तरह बने रहना होगा। जोंक की तरह चिपके रहना होगा।

आप सोच रहे हैं कि नौकरी छोड़ दिया है तो भाषण दे रहा है। नहीं ऐसा नहीं है। यकीन मानिये मैं ये सब लगातार सोच रहा हूं। बीते तीन साल से मैंने मीडिया के चरित्र, यहां के काम के हालात और लोगों पर बहुत विचार किया है। पिछले ११ साल में पांच मीडिया हाउस में काम कर चुका हूं। तीन चैनल में काम कर चुका हूं। इसलिए मीडिया के हर सच और झूठ को करीब से जानता हूं। कई बड़े रिपोर्टरों को जानता हूं जो सिंडिकेट बना कर सत्ता की दलाली करते हैं। मैं जानता हूं कि कैसे ख़बरें खड़ी की जाती हैं, ख़बरें खरीदी और बेची जाती हैं और ख़बरें दबाई जाती हैं। मैं जानता हूं एक ही तरह की दो ख़बरों पर क्यों चैनल दो नीतियां अपनाते हैं। उन ख़बरों में शामिल चेहरों के आधार से चैनलों की नैतिकता तय होती है। मैं मीडिया में चल रहे इस ख़तरनाक खेल पर एक किताब लिखने की योजना बना रहा हूं। उसमें बीते ग्यारह साल के अपने सफ़र और अनुभवों को दर्ज करूंगा। उसमें मेरठ के ट्रांसपोर्ट नगर में बीताए दिनों का जिक्र होगा, सपने और सच के बीच हुए टकराव की चर्चा होगी। वो टकराव जिसमें पत्रकार धीरे धीरे दम तोड़ता है और एक कॉरपोरेट जर्नलिस्ट जन्म लेता है। वो जर्नलिस्ट जो असल में एक सेल्समैन की भूमिका में है जिसके लिए ख़बर एक उत्पाद है और पत्रकारिता उत्पाद को बेचने का तरीका।

मीडिया में मैंने सबसे अधिक दिन एनडीटीवी में बिताए हैं। जाहिर सी बात है मेरी उस किताब में एनडीटीवी का जिक्र सबसे अधिक होगा। मैं व्यक्तिगत तौर पर मानता हूं कि एनडीटीवी का ख़बरों के बाज़ार में टिका रहना बेहद जरूरी है। लेकिन जब भी कोई मुझसे कहता है कि एनडीटीवी आइडियल है तो मैं इसका विरोध करता हूं। मैं मानता हूं कि एनडीटीवी की मौत का मतलब एक साफ-सुथरी टीवी पत्रकारिता की मौत होगी। यहां साफ-सुथरी टीवी पत्रकारिता का मतलब सिर्फ इतना है कि बिना किसी अश्लील वीडियो को दिखाए और बिना फूहड़ हुए भी चैनल चलाया जा सकता है। इससे अधिक मतलब निकलना ग़लत होगा। क्योंकि मैं निजी तौर पर ये भी मानता हूं कि एनडीटीवी स्कूल ऑफ जर्नलिज्म किसी भी दिन आज तक स्कूल ऑफ जर्नलिज्म से ज़्यादा घातक है। क्यों, इसे समझाने के लिए सिर्फ एक छोटा किस्सा सुनाना चाहूंगा।

कुछ समय पहले एनडीटीवी ने मनमोहन सरकार के सबसे अच्छे और सबसे खराब मंत्रियों पर एडिटर्स सर्वे कराया था। देश भर के संपादकों की राय ली गई। एक सूची तैयार की गई। रात आठ बजे के बुलेटिन में उसे चलाया गया। लेकिन फिर खराब मंत्रियों की सूची गिरा दी गई। मगर अच्छे मंत्रियों की सूची चलती रही। वो खराब मंत्री कौन थे और एनडीटीवी ने वो सूची क्यों गिराई इस पर विस्तार से चर्चा किताब में होगी। लेकिन इससे आप एनडीटीवी के चरित्र का अंदाजा लगा सकते हैं। जो चैनल सिर्फ हल्के से दबाव में अपने ही सर्वे को तोड़-मरोड़ सकता है उस चैनल में स्टेट के विरुद्ध खड़े होने का कितना हौसला होगा?

यही वजह है कि मैं लंबे समय से एनडीटीवी को छोड़ने का मन बना रहा था। मेरे करीबी मेरी उलझन , मेरे द्वंद को जानते हैं। वो जानते हैं कि एनडीटीवी की झूठी नैतिकता में मुझे किस कदर घुटन महसूस हो रही थी। ग्यारह साल तक नौकरी करते करते मेरे भीतर के पत्रकार ने दम तोड़ दिया था और वो एक बड़ी वजह थी कि मैं तमाम घुटन के बावजूद एनडीटीवी की नौकरी छोड़ने का फैसला नहीं ले पा रहा था। मगर हाल ही में एनडीटीवी प्रॉफिट से एनडीटीवी इंडिया में एक्सपोर्ट किये गए नए मैनेजिंग एडिटर अनिंदो चक्रवर्ती ने मुझे ये बड़ा फैसला लेने का बहाना दे दिया। एक झटके में सारी उलझन दूर हो गई और इसके लिए मैं उनका शुक्रगुजार हूं।

समरेंद्र सिंह (०९-१२-०८)

Friday, August 8, 2008

जब जस्टिस ऐसे हों तो कैसे बचेगा देश?

सुप्रीम कोर्ट भी कम हिप्पोक्रेट नहीं. बीते कुछ दिनों में दो अहम मामले सुप्रीम कोर्ट के सामने थे. एक जजों से जुड़ा मामला और दूसरा नेताओं, पत्रकारों और समाज के दूसरे ताक़तवर तबकों से जुड़ा हुआ. दोनों ही मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने जजों के दोहरे चरित्र को सामने ला दिया. पहला मामला सरकारी मकान पर गैर कानूनी कब्जों से जुड़ा था. ये पांच अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के सामने आया. तब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बी एन अग्रवाल और जस्टिस जी एम सिंघवी की बेंच ने कहा कि “सरकार कानून का पालन नहीं करना ही चाहती. पहले ये कहते थे कि देश को भगवान ही बचा सकता है, मगर अब लगता है कि भगवान भी इस देश की मदद नहीं कर सकता”.

दूसरा मामला आज अदालत में पेश हुआ. करोड़ों रुपये के प्रोविडेंट फंड घोटाले में जजों की भूमिका से जुड़ा हुआ. इसमें निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज भी संदेह के घेरे में. उन पर आरोपियों की मदद का शक है. इस घोटाले और जजों की भूमिका की जांच किससे कराई जाए इस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. सुनवाई तीन जजों की बेंच कर रही थी, जिनमें दो जस्टिस बी एन अग्रवाल और जस्टिस जी एम सिंघवी वही थे जिनकी बेंच ने कहा था कि “इस देश को भगवान भी नहीं बचा सकता”. मगर आज जस्टिस बी एन अग्रवाल आपा खो बैठे. हुआ यूं कि सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील और पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री शांति भूषण ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भ्रष्ट जजों को बचाने की कोशिश कर रहा है. जिस पर जस्टिस बी एन अग्रवाल भड़क गए. उन्होंने शांति भूषण से बयान वापस लेने को कहा. लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया और कहा कि चाहें तो मानहानि का मुक़दमा कर दें. थोड़ी रुकावट के बाद सुनवाई आगे बढ़ी तो जस्टिस बी एन अग्रवाल ने कुछ कहा जिस पर शांति भूषण के बेटे प्रशांत भूषण ने कहा कि वो उनके सीनियर के मुंह में अपने शब्द डाल रहे हैं. फिर क्या था जस्टिस बी एन अग्रवाल सुनवाई बीच में छोड़ कर उठ गए. अब मामला सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन पर छोड़ दिया गया है.

अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जिस देश में सुप्रीम कोर्ट के जज खुद को खुदा समझने लगे हों और कड़ुवे सच को बर्दाश्त करने की हिम्मत भी नहीं रखते हों उस देश का भगवान भला कैसे करे? जस्टिस बी एन अग्रवाल (जो चीफ जस्टिस के बाद दूसरे सबसे सीनियर जज हैं) को सोचना चाहिये था कि उनके इस बर्ताब से अदालत सम्मानित नहीं बल्कि अपमानित होगी. साथ ही कानून और न्यायपालिका पर आम आदमी का यकीन और भी घटेगा.

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