Saturday, July 7, 2007

देश को बीमार बनाती सरकार

देश के दो क्षेत्र सबसे अधिक उपेक्षित रहे हैं। पहला शिक्षा और दूसरा स्वास्थ्य। हर साल न जाने कितने लोग धीमे धीमे मौत की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। खराब सेहत और इलाज नहीं मिलने से। लेकिन सत्ता में बैठे लोगों का हाल ये है कि उन्हें आम लोगों की सेहत को लेकर कोई फिक्र नहीं। वैसे भी हमारे देश के हुक्मरान आम जनता के ख्याल से नीतियां नहीं बनाते बल्कि चंद खास लोगों को ध्यान में रख कर काम करते हैं। स्वास्थ्य सेवा को लेकर सरकारी उदासीनता पर हमारे साथी विचित्रमणि ने नई रोशनी डाली है।


डिजरायली ने कभी कहा था कि झूठ तीन तरह के होते हैं- एक सामान्य झूठ, दूसरा सफेद झूठ और तीसरा सांख्यिकी। इसलिए दुनिया की एक महाशक्ति बनने को उतावले या मरे जा रहे इस देश में बीमारी की मार से दुर्बल होते लोगों की संख्या पर बात करनी बेमानी है। सरकारी आंकड़े तो सरकार की सुविधा के हिसाब से होते हैं और दूसरे आंकडों को सरकार मानती नहीं। इसलिए इस देश में स्वास्थ्य के तीखे सवालों का जवाब आंकडों के आधार पर नहीं, बल्कि अनुभव की बिनाह पर खोजे जाने चाहिए। कंप्यूटर पर इस लेख को पढते हुए आप अपने जेहन को खंगाल लीजिए कि अगर मोटी रकम खर्च करने को आप तैयार ना हुए हों तो सुविधा से अपनी या किसी अपने की इसी अस्पताल में आप ठीक ठाक इलाज करा पाए हों। नहीं ना।
इस सिलसिले में कुछ समय पहले एक जाने माने सर्वे संस्था ने आम लोगों से ये जानने की कोशिश की थी कि देश में स्वास्थ्य सेवा की हालत कैसी है। आपको यकीन नहीं होगा कि लोगों ने पुलिस के बाद सबसे ज्यादा भ्रष्ट स्वास्थ्य से जुड़े कर्मचारियों और डॉक्टरों को बताया। उसमें भी डॉक्टरों के बारे में पूछा गया तो ७७ फीसदी लोगों ने माना कि डॉक्टर बेहद भ्रष्ट और संवेदनहीन हो गये हैं जबकि मेडिकल स्टाफ के बारे में ६७ फीसदी लोगों की राय थी कि वो रोगियों का खयाल नहीं रखते।
यकीकन आप भी इससे पूरा इत्तफाक रखते होंगे कि जिस डॉक्टर को आप भगवान के बराबर मानते हैं, वो आपको इंसान भी नहीं समझते। लेकिन सच पूछिए तो क्या देश को बीमार बनाने या बीमार देश को इलाज दे पाने की नाकामी का ठीकरा सिर्फ डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफों के सिर पर ही फोड़ा जा सकता है। बिल्कुल नहीं, क्योंकि आपके सपनों की सरकार भी आपके स्वास्थ्य को लेकर थोडा भी संवेदनशील नहीं है। अगर होती तो महान मनमोहन सिंह के अतिमहान वित्त मंत्री पी चिदंबरम के बजट में स्वास्थ्य और खासकर ग्रामीण और पिछड़े इलाकों की हालत पर फोकस किया गया होता। लेकिन ऐसा था नहीं। हर भारतीय पर स्वास्थ्य के लिए सालाना करीब १०५० रुपये खर्च किये जाते हैं लेकिन उनमें सरकार की हिस्सेदारी महज १८४ रूपये है। यानी करीब साढ़े सत्रह फीसदी। सरकार के इस योगदान के औसत में आम आदमी की हिस्सेदारी इसलिए कम हो जाती है कि तमाम वीवीआईपी और वीआईपी के इलाज का खर्चा भी इसमें जुडा हुआ है। जिस तरह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जीडीपी और ग्रोथ की बोली बोलते हैं, उस लिहाज से भी टोटल मिलाएंगे तो आप पाएंगे कि स्वास्थ्य पर सरकार कुल सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का एक फीसदी से भी कम खर्चा करती है।
कई बार इच्छा होती है कि आपके प्रधानमंत्री की मीठी बातों पर यकीन कर लिया जाए लेकिन क्या करें। जमीनी सच्चाई ही बेचारे मनमोहन सिंह के झूठे सच की चुगली कर देते हैं। यही मनमोहन सिंह जब वित्तमंत्री बने तो स्वास्थ्य सेवाओं में भारी कटौती शुरु हुई और आज आलम ये है कि जिन ग्रामीण इलाकों में ७० फीसदी लोग वास करते हैं वहां सरकारी स्वास्थ्य सेवा का सिर्फ २५ फीसदी हिस्सा पहुंचा है। उन सत्तर फीसदी लोगों में से भी ८३ फीसदी लोगों को टूटे फूटे अस्पतालों में भी इलाज कराना नसीब नहीं होता। नतीजा ये होता है कि नीम हकीम या ओझाओं के चक्कर में पड़कर लोग बेमौत मारे जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक सालाना एक लाख ३७ हजार महिलाएं प्रसव के दौरान दम तोड़ देती हैं। ये हालत भी छोटे मोटे रोगों को लेकर है। कैंसर जैसे लोगों के इलाज के बारे में सोचना भी वहां पाप है। जहां बीमारी गरीब का गला दबाती है, वहां दैव योग को निहारने के सिवाय चारा भी क्या बचता है।
ऐसा नहीं है कि सरकार गरीबों की सेहत को लेकर फिक्रमंद नहीं दिखती। बिल्कुल दिखती है। उसी का नतीजा है कि बेबस, लाचार लोगों के इलाज के नाम पर बड़े बड़े निजी अस्पतालों को सरकार कौडियों के भाव करोडों की कीमत की जमीन दे देती है। लेकिन उन अस्पतालों में किसी गरीब का नहीं बल्कि लक्ष्मीपुत्रों का इलाज होता है। ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं, जब प्राइवेट अस्पतालों ने मोटी रकम के लिए लाश तक को अपने कब्जे में कर लिया है। उन खबरों को पढ़कर आप जरूर व्यग्र हो जाते होंगे लेकिन वो नहीं होते, जिन्हें चुनकर आपने संसद और विधानसभा तक भेजा है।
ऐसे ही माहौल में याद आते हैं वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज। मनमोहन सिंह से तुलना कीजिएगा तो विद्वता और अर्थशास्त्र के ज्ञान के मामले में चावेज कहीं नहीं टिकते। लेकिन उस चावेज ने पहले तो आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक का सारा कर्जा चुकाया और फिर ऐलान कर दिया कि आर्थिक दासता में फांसने वाले और अमेरिका के इशारे पर चलने वाले आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक से वो कभी कर्ज नहीं लेंगे। और अब उसी चावेज ने अपने देश के प्राइवेट अस्पतालों को दो टूक कह दिया है कि अगर आम आदमी के इलाज में कोई भी एं-बें हुआ तो उन बैंकों का राष्ट्रीयकरण करते उन्हें देर नहीं लगेगी। लेकिन ऐसा लगता नहीं कि चावेज से मनमोहन कभी प्रेरणा लेंगे। ले भी कैसे सकते हैं। मनमोहन सिंह की आत्मा पर वर्ल्ड बैंक की पुरानी नौकरी और सोनिया गांधी के प्रति दासत्व का बोझ है, जबकि चावेज की नजरों में समाजवाद का सपना पल रहा है। उस समाजवाद का, जो सिर्फ आखिरी आदमी की लड़ाई ही नहीं लड़ता, बल्कि दुनिया के दादा बने फिरने वाले अमेरिका की आंखों में आंखें डालकर बात करता है।


लेखक- विचित्रमणि

2 comments:

अभय तिवारी said...

बढ़िया लिखा..ऐसे लेख लिखते रहिये..

रजनीश मंगला said...

देश में चकित्सक सेवाओं की धांधलेबाज़ी का पर्दाफ़ाश किया है आपने। जर्मनी में हर महीने अपने परिवार के लिए तीन सौ यूरो मैडिकल इंश्योरेंस देना चुभता है मुझे, लेकिन वहीं अगर कहीं कोई बड़ी विपदा आन पड़े तो पैसों के बारे में नहीं सोचना पड़ता। पता नहीं यह पद्धति कितनी अच्छी या बुरी है और क्या ये भारत में भी पूर्ण रूप से काम कर सकती है, लेकिन इतना तो तय है कि भारत में डाक्टरी भी दुकानदारी की तरह ही है, पैसा दो , इलाज करवाओ। पैसा नहीं तो इलाज नहीं। जबकि चकित्सिक सेवा देश की नींव का मुख्य हिस्सा होना चाहिए। लेकिन करोड़ों लोग हैं, कोई फ़ंडा नहीं चल सकता।

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