Friday, August 8, 2008

जब जस्टिस ऐसे हों तो कैसे बचेगा देश?

सुप्रीम कोर्ट भी कम हिप्पोक्रेट नहीं. बीते कुछ दिनों में दो अहम मामले सुप्रीम कोर्ट के सामने थे. एक जजों से जुड़ा मामला और दूसरा नेताओं, पत्रकारों और समाज के दूसरे ताक़तवर तबकों से जुड़ा हुआ. दोनों ही मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने जजों के दोहरे चरित्र को सामने ला दिया. पहला मामला सरकारी मकान पर गैर कानूनी कब्जों से जुड़ा था. ये पांच अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के सामने आया. तब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बी एन अग्रवाल और जस्टिस जी एम सिंघवी की बेंच ने कहा कि “सरकार कानून का पालन नहीं करना ही चाहती. पहले ये कहते थे कि देश को भगवान ही बचा सकता है, मगर अब लगता है कि भगवान भी इस देश की मदद नहीं कर सकता”.

दूसरा मामला आज अदालत में पेश हुआ. करोड़ों रुपये के प्रोविडेंट फंड घोटाले में जजों की भूमिका से जुड़ा हुआ. इसमें निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज भी संदेह के घेरे में. उन पर आरोपियों की मदद का शक है. इस घोटाले और जजों की भूमिका की जांच किससे कराई जाए इस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. सुनवाई तीन जजों की बेंच कर रही थी, जिनमें दो जस्टिस बी एन अग्रवाल और जस्टिस जी एम सिंघवी वही थे जिनकी बेंच ने कहा था कि “इस देश को भगवान भी नहीं बचा सकता”. मगर आज जस्टिस बी एन अग्रवाल आपा खो बैठे. हुआ यूं कि सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील और पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री शांति भूषण ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भ्रष्ट जजों को बचाने की कोशिश कर रहा है. जिस पर जस्टिस बी एन अग्रवाल भड़क गए. उन्होंने शांति भूषण से बयान वापस लेने को कहा. लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया और कहा कि चाहें तो मानहानि का मुक़दमा कर दें. थोड़ी रुकावट के बाद सुनवाई आगे बढ़ी तो जस्टिस बी एन अग्रवाल ने कुछ कहा जिस पर शांति भूषण के बेटे प्रशांत भूषण ने कहा कि वो उनके सीनियर के मुंह में अपने शब्द डाल रहे हैं. फिर क्या था जस्टिस बी एन अग्रवाल सुनवाई बीच में छोड़ कर उठ गए. अब मामला सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन पर छोड़ दिया गया है.

अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जिस देश में सुप्रीम कोर्ट के जज खुद को खुदा समझने लगे हों और कड़ुवे सच को बर्दाश्त करने की हिम्मत भी नहीं रखते हों उस देश का भगवान भला कैसे करे? जस्टिस बी एन अग्रवाल (जो चीफ जस्टिस के बाद दूसरे सबसे सीनियर जज हैं) को सोचना चाहिये था कि उनके इस बर्ताब से अदालत सम्मानित नहीं बल्कि अपमानित होगी. साथ ही कानून और न्यायपालिका पर आम आदमी का यकीन और भी घटेगा.

2 comments:

Cyril Gupta said...

प्रशांत भूषण और शांती भूषण जी को नमन, प्रणाम, उनकी हिम्मत को सलाम. यहां तो कोर्ट के खिलाफ एक लेख लिखने में रूह कांप जाती है

समरेंद्र said...

शांति भूषण लंबे समय से न्यायपालिका में फैले भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं. लेकिन अदालतों में फैले भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उन्हें काटना आसान नहीं.

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