Tuesday, July 29, 2008

इन्हें धमाकों से क्या ... ये तो खुद मौत के सौदागर हैं

बीजेपी और कांग्रेस में कोई फ़र्क नहीं. बीते समय में हम सबने इन दोनों दलों को हिंसा पर सियासत करते देखा है और हिंसा की सियासत करते भी देखा है. १९८४ में सिखों का नरसंहार और २००२ में गुजरात में मुसलमानों का नरसंहार इसके गवाह हैं. ऐसे दंगों की फ़ेहरिस्त काफी लंबी है और इन दोनों दलों की बेशर्मी का इतिहास भी उतना ही लंबा. एक बार फिर देश के ये दोनों सबसे बड़े दल अपनी उसी चाल और चरित्र का इजहार कर रहे हैं. बैंगलोर और अहमदाबाद बम धमाकों पर सियासी रोटियां सेंकने में जुटे हैं. और इसी कोशिश में एक से बढ़ कर एक विभत्स बयान जारी कर रहे हैं.

शुरुआत बीजेपी से. मनमोहन सिंह के विश्वास प्रस्ताव पर चल रही गंभीर बहस के बीच लोकसभा के पटल पर नोट बिछाने के भद्दे नाटक के बाद अब धमाकों पर उससे भी भद्दे बयान. बीजेपी की तेज तर्रार नेता सुषमा स्वराज की माने तो ये धमाके कांग्रेस ने कराए हैं. विश्वास मत में हुई सांसदों की खरीदो-फ़रोख़्त से ध्यान हटाने के लिए. ये एक बेहद संगीन आरोप है और बिना आधार इस आरोप का कोई मतलब नहीं. अगर सुषमा ने ये बात गंभीरता से... सोच समझ कर और सबूतों के आधार पर कही हैं तो उन्हें वो आधार जनता के बीच पेश करने चाहिये ताकि कांग्रेस का वो घिनौना सच सामने आ सके. अगर सुषमा की बात में दम है तो कांग्रेस के सिर्फ़ एक नेता पर नहीं बल्कि पूरी पार्टी पर देशद्रोह का मुक़दमा चला कर सभी नेताओं को फांसी पर टांग देना चाहिये. लेकिन अगर सुषमा स्वराज ने ये बात बिना सोचे समझे कही है तो वो बेहद खुद ख़तरनाक हैं. उन्हें सियासत से हमेशा के लिए दूर कर देना चाहिये. आजीवन प्रतिबंध लगाया जाना चाहिये, ताकि लोगों को हमेशा याद रहे कि वोट के लिए समाज में ज़हर घोलना एक संगीन जुर्म है और उसे माफ़ नहीं किया जा सकता.

अब बात बीजेपी के एक और नेता नरेंद्र मोदी की. इनके बारे में तो जितना कहा जाए उतना कम है. बीजेपी के ये सबसे तेज चमकते सितारे हैं और इनकी माने तो केंद्रीय खुफ़िया एजेंसी आईबी सही तरीके से जानकारी नहीं देती है. चलिये मान लीजिये कि आईबी निकम्मी है. और आपने ये बात धमाकों का सारा दोष केंद्र पर मढ़ने के इरादे से नहीं कही. लेकिन यहां सवाल उठता है कि आखिर मोदी साहब आप क्या कर रहे थे? आप तो गुजरात के शहंशाह हैं. आपने वहां की सुरक्षा व्यवस्था क्यों नहीं दुरुस्त रखी? आज एनडीटीवी पर एक रिपोर्ट दिखाई गई. राहुल श्रीवास्तव की रिपोर्ट. उसके मुताबिक अगर अहमदाबाद में सभी १६ बमों की सही-सही जानकारी एक घंटे पहले भी दे दी जाती तो भी पुलिस १४ धमाकों को रोक नहीं पाती. अहमदाबाद पुलिस के बम निरोधी दस्ते में ड्राइवर समेत सिर्फ सात कर्मचारी हैं. एक बम को बेकार करने में कम से ४५ मिनट से एक घंटे का वक़्त लगता है. इस लिहाज से देखें तो ये कर्मचारी मिल कर डेढ़-पौने दो घंटे में अधिक से अधिक दो या तीन बम बेकार कर पाते. यही नहीं पूरे गुजरात में पुलिस महकमे के साठ फ़ीसदी पद खाली पड़े हैं. तो मोदी साहब माना आप मुसलमानों की ज़िंदगी दांव पर लगा कर सियासत करने में माहिर हैं, लेकिन हिंदुओं के हितों के लिए ही सही वहां सुरक्षा व्यवस्था तो दुरुस्त रखिये. धमाकों पर बिना आधार ओछी राजनीति तो मत करिये.

अब बात कांग्रेस की. कांग्रेस के एक बड़े नेता हैं श्रीप्रकाश जायसवाल. ये जनता का दुर्भाग्य है कि जायसवाल साहब देश के गृह राज्य मंत्री हैं. इनके बारे में एक बात मशहूर है कि ये किसी भी घटना पर बयान जारी कर सकते हैं, भले ही इन्हें उसके बारे में कोई जानकारी हो या नहीं. लेकिन इस बार तो हमारे गृह राज्य मंत्री जी ने सारी हदें तोड़ दीं. ये पहुंचे एक हवन में शामिल होने के लिए और वहां इन्होंने एक बेतुका बयान जारी कर दिया. श्री श्री १००८ श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा कि इस तरह के हवन होते रहने चाहिये. हवन होते हैं तो हमले नहीं होते. अगर ऐसा है तो जायसवाल साहब को तुरंत मंत्रिमंडल से बर्ख़ास्त कर देना चाहिये. जब भगवान पर ही देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी है तो गृह मंत्रालय की ज़रूरत क्या है?

कुल मिला कर ये कहा जाए कि ये धमाके इन्हीं दोनों पार्टियों बीजेपी और कांग्रेस के दोगलेपन की वजह से हुए हैं तो ग़लत नहीं होगा. देश और राज्यों में लंबे समय इन्हीं दोनों दलों का राज रहा है. समाज को बांटने में और आतंकवाद को बढ़ावा देने में इन्हीं दोनों पार्टियों का हाथ है और ऐसे में कई बार लगता है कि ये देश सच में भगवान भरोसे ही चल रहा है.

Friday, July 25, 2008

यशोदा बड़ी या देवकी... क्या सच में तय करेगा कानून?

दो मां. एक मुसलमान और दूसरी हिंदू. बच्चा जो नौ साल पहले मुसलमान मां की कोख से जन्मा, लेकिन छह साल से उसे हिंदू मां पाल रही है. अब सवाल यह कि बच्चा किसका है? छह साल से हर दुख झेल उसे बड़ा करने वाली हिंदू मां का या फिर जन्म देने वाली मुसलमान मां का, जो बीते छह साल से हर पल उसे ढूंढ रही थी. पागलों की तरह इस गली से उस गली... इस छोर से उस छोर. बच्चा मिला तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा, लेकिन ये खुशी उस समय जाती रही जब बच्चे ने पहचानने से इनकार कर दिया. अब फ़ैसला कानून को करना है. जिसमें एक लड़ाई जन्म देने वाली मां हार चुकी है.

ये कोई कहानी नहीं, हक़ीक़त है. गुजरात के एक नौ साल के बच्चे और उसकी दो मांओं की हक़ीक़त. उस बच्चे का नाम है मुज़फ़्फ़र मगर अब वो विवेक बन चुका है. वो अब पूजा करता है. हिंदू त्योहारों पर जश्न मनाता है. गायत्री मंत्र का जाप करता है. उसकी बहनें हैं जो उसे राखी बांधती हैं. वो भूल चुका है कि कभी उसके अब्बा मोहम्मद सलीम शेख़ उसे अंगुली थमा कर मस्जिद ले जाया करते थे.

बात २८ फरवरी, २००२ की है. गुजरात में वहशी दरिंदे सड़कों पर इंसानियत का ख़ून कर रहे थे. उन्हीं ख़ौफ़नाक पलों में मोहम्मद शेख़ ने अपने तीन साल के बच्चे मुज़फ़्फ़र, बहन फ़िरोज़ा और मां को अहमदाबाद की गुलबर्गा सोसायटी में पूर्व सांसद जाफ़री के घर पर पहुंचा दिया. इस उम्मीद में कि जाफ़री पूर्व सांसद थे और दंगाई उनके घर तक पहुंचने की हिम्मत नहीं करेंगे. लेकिन जब नरसंहार सत्ता में बैठे लोगों द्वारा प्रायोजित हो तो क्या जाफ़री और क्या शेख़. दंगाइयों ने वहां हमला किया और अगली सुबह शेख़ को हमेशा के लिए मौन हो चुकी मां मिली और बहन और बेटे का पता नहीं चला.

उसके बाद शेख़ और उनकी बीवी ज़ेबुनिस्सा ने मुज़फ़्फ़र और फ़िरोज़ा की तलाश में दिन रात एक कर दिया. एक राहत शिविर से दूसरे राहत शिविर. एक शहर से दूसरे शहर. एक दर से दूसरे दर ... सभी जगह ढूंढा... गुहार लगाई, लेकिन हाथ खाली ही रहे. मुज़फ़्फ़र की याद आते ही मां का कलेजा फट पड़ता... वो मां हर वक़्त रोती रहती, पर करती भी तो क्या करती ... खुद की लाचारी और बदकिस्मती पर... वो कुछ आंसू बहा लेती.

लेकिन दो हफ़्ते पहले जैसे ज़िंदगी लौट आई. सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ और सुप्रीम कोर्ट की तरफ से गठित एसआईटी की मदद से मुज़फ़्फ़र मिल गया. डीएनए टेस्ट में भी इसकी पुष्टि हो गई. लेकिन अब वो मुज़फ़्फ़र से विवेक विक्रम पटनी बन चुका है. मुसलमान से हिंदू में तब्दील हो गया है. सिर्फ़ धर्म ही नहीं बदला है, वक़्त ने जेहन में बसी असली मां-बाप की यादें मिटा दी हैं. अब वो मीना पटनी को मां मानता है और उसके पिता विक्रम पटनी की चार साल पहले मौत हो चुकी है.

दफ़्तर में जब ये रिपोर्ट आई तो मेरे चेहरे पर एक साथ कई भाव उतर आए. आंखों में मोदी और वीएचपी के लिए घृणा तो उभरी ही दोनों मांओं और बच्चे की स्थिति के बारे में सोच कर दर्द की लकीर भी खिंच गई. थोड़ी देर सोच में डूबा रहा फिर यही ख़्याल उभरा कि देखिये ज़िंदगी भी क्या गुल खिलाती है... मौत की आंधी में भी कुछ ऐसे दीये जलते हुए छोड़ जाती है जो सदियों तक भटके हुए लोगों को सही राह दिखाती रहें. वरना जिस गुजरात में हिंदुओं ने सत्ता के संरक्षण पर मुसलमानों का नरसंहार किया ... उसी गुजरात में इंसानियत की ये मिसाल क्यों? क्यों एक हिंदू मां ने मुसलमान बच्चे को अपनाया? और क्यों डीएनए टेस्ट के बाद भी वो ये मानने को तैयार नहीं कि ये बच्चा गैर है?

बेटे की पहचान होने के बाद ज़ेबुनिस्सा ने पटनी परिवार से अपना मुज़फ़्फ़र मांगा तो उन्होंने ये कह इनकार कर दिया कि वो किसी मुज़फ़्फ़र को जानते ही नहीं. उनके बेटे के नाम तो विवेक है. मामला मेट्रोपोलिटन जज के पास पहुंचा. अदालत में बेटे की झलक पाने के बाद ज़ेबुनिस्सा की आंखें छलक आईं, लेकिन बेटा मां के आंसू पहचान नहीं सका. पहचानता भी तो कैसे... जब बिछुड़ते वक़्त वो इतना छोटा था कि स्मृतियों को लंबे वक़्त तक सहेजने की कला सीख नहीं सका था. अदालत ने जब उससे पूछा कि वो किस मां के साथ रहना चाहता है तो उसने मीना की तरफ इशारा कर दिया. अब वो उन्हें ही मां समझता है और मुश्किल के वक़्त उन्हीं की आंचल में सिर छुपाता है. कोर्ट ने भी फ़ैसला मीना के हक़ में दिया. छह साल से जिगर के टुकड़े को तलाश रही ज़ेबुनिस्सा की झोली खाली रह गई. लेकिन इस बार वो बेटा खोना नहीं चाहती, इसलिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया है.

जो भी मुज़फ़्फ़र से विवेक बन चुके बच्चे और उनकी दोनों मांओं की दास्तान को सुन रहा है उसके मन में पहला सवाल यही कौंधता है कि आखिर किस मां की झोली भरेगी, किसकी खाली रहेगी? कन्हैया यशोदा को मिलेगा या देवकी को? मेरे बहुत से साथियों का ये मत है कि देवकी को त्याग करना चाहिये। कान्हा को यशोदा के पास ही छोड़ देना चाहिये. लेकिन मेरा मत अलग है.

मैं ये मानता हूं कि यशोदा की नियति ही त्याग है... उसे हर जन्म में कान्हा को प्यार देना है... लेकिन इस सोच के साथ कि कान्हा उनका नहीं है. सोचिये यशोदा की झोली खाली थी चंद वर्षों के लिए ही सही कान्हा ने उस झोली को खुशियों से भर दिया ... ज़िंदगी के कई खूबसूरत रंग दिखाए... लेकिन देवकी की झोली भरी थी... और खाली हो गई ... बीते छह साल में इस देवकी के हिस्से सिर्फ़ आंसू आएं हैं ... अगर इस बार भी उसकी झोली खाली रह गई तो ये बड़ा अनर्थ होगा. यशोदा क्या खुद को माफ कर सकेगी.

Thursday, July 24, 2008

बाल हठ के शिकार हो गए हैं सोमनाथ चटर्जी


उम्र का अपना असर होता है. ये एक ऐसा सत्य है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता. बीते वक़्त में हमने चंद्रशेखर को देखा था और अभी सोमनाथ चटर्जी को देख रहे हैं. बुढ़ापे में व्यक्ति एक छोटे बच्चे की तरह फ़ैसले लेने लगता है. ग़लत होते हुए भी ग़लती मानने को तैयार नहीं होता. उसमें बार बार बाल हठ झलकता है. वो हठ कई बार खुद उसके लिए सही नहीं होता, लेकिन तब इतना विवेक ही कहां कि ग़लत और सही का फ़ैसला कर सके.

सोमनाथ चटर्जी को सत्ता के गलियारे में सोमनाथ दा कहा जाता है. सोमनाथ ज़िंदगी भर लाल झंडा उठा कर चले. १९६८ से लेकर २००८ तक. चालीस साल. इन बीते चालीस साल में हमने कई सियासदानों को पथभ्रष्ट होते देखा. सत्ता के लिए कपड़े की तरह दल बदलते देखा. सोमनाथ इन सबसे दूर अपनी पार्टी के साथ अटल रहे. लेकिन सियासत के आखिरी पड़ाव में बग़ावत पर उतर आए. ये भूल कर कि आज वो जिस मुकाम पर पहुंचे हैं उसमें उनकी काबिलियत तो है मगर लाल झंडे का योगदान ज़्यादा बड़ा है. फिर आज वो खुद को उस झंडे से बड़ा कैसे मान बैठे हैं?

कायदे से होना तो यह चाहिये था कि सोमनाथ विश्वास प्रस्ताव पर बहस के लिए बुलाए गए विशेष सत्र से पहले ही स्पीकर पद से इस्तीफ़ा दे देते. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. जिस पोलित ब्यूरो ने उनकी गुजारिश पर उन्हें स्पीकर बनने के लिए हरी झंडी दिखाई थी. सोमनाथ ने उसी पोलित ब्यूरो की गुजारिश को ठुकरा दिया. बहुत से लोग कहने लगे कि ऐसा करके उन्होंने स्पीकर पद की गरिमा बचाए रखी. मेरा मत ऐसा बिल्कुल नहीं है, फिर भी थोड़ी देर के लिए मैं इस तर्क को मान लेता हूं. तो क्या विश्वास मत के बाद उन्हें पार्टी का मान नहीं रखना चाहिये था?

विश्वास मत से पहले उन्होंने अपने करीबी सूत्रों के जरिये ये संदेश भिजवाया कि मनमोहन सरकार की किस्मत का फ़ैसला होते ही वो पद से इस्तीफ़ा दे देंगे. साथ ही संसद की सदस्यता से भी. लेकिन अब इस्तीफ़ा देने की बात तो दूर विदेश दौरे की योजना बना रहे हैं. जाहिर है पद का मोह उन पर हावी हो चुका है. वो भी इस कदर कि सीपीएम से निकाले जाने और नैतिक आधार गंवाने के बाद भी वो पद पर बने रहना चाहते हैं. यही नहीं वो कांग्रेस और यूपीए नेताओं से मिल रहे हैं. लेकिन बावजूद इसके अब भी यही उम्मीद है कि धुंधली पड़ चुकी ही सही, एक विचारधारा से चालीस साल की वफादारी को वो गद्दारी से कलंकित नहीं करेंगे. अपना बाल हठ छोड़ कर विवेक से फ़ैसला लेंगे और अगले कुछ दिनों में स्पीकर पद से इस्तीफ़ा दे देंगे.

लो अब चलेगा देश बेचने का खुला खेल

लेफ़्ट ने समर्थन वापस ले लिया फिर भी सरकार बच गई. तीन पार्टियों बीजेपी, शिवसेना, बीजेपी और टीडीपी के जयचंदों ने मिल कर सरकार बचा दी. मनमोहन की बांछें खिल गई हैं. उनकी आका सोनिया और कांग्रेस के सारे पंटर भी जश्न मना रहे हैं. जश्न मुंबई में भी मनाया जा रहा है. शेयर बाज़ार के सारे दलाल सक्रिय हो गए हैं. निफ़्टी और सेंसेक्स छलांगे लगा रहा है. एक झटके में अमेरिका की मंदी का असर ख़त्म हो गया है. पहले ही दिन सेंसेक्स ने साढ़े आठ सौ अंकों की छलांग लगाई और निफ़्टी ने करीब ढाई सौ अंक. ये छलांग बताती है अब देश में आर्थिक सुधारों के नाम पर खुला खेल चलेगा. लेफ़्ट की लगाम हट गई है और अब दलालों का राज है. सरकारी कंपनियां बेची जाएंगी, निजी कंपनियों को कई तरह की रियायतें दी जाएंगी. उन रियायतों के लिए चिदंबरम एंड कंपनी को भी तोहफा मिलेगा. अरे हां, अमर सिंह को मत भूलियेगा... वो इस वक़्त का सबसे बड़ा दलाल है, बिल्डरों के हाथ उत्तर प्रदेश के कई शहर बेच चुका है और अब देश बेचने की तैयारी है.

इसको विस्तार से समझने के लिए ज़्यादा जोर देने की ज़रूरत नहीं है. आज जिन कंपनियों के भाव चढ़े हैं उनमें सबसे ऊपर जूनियर अंबानी की कंपनियां हैं. अमर सिंह के दोस्त अनिल अंबानी की कंपनियां. आरएनआरएल जैसी कमजोर कंपनी के भाव सबसे अधिक २२ फ़ीसदी चढ़े. यही नहीं पिछले छह महीने से मार झेल रही रियेलिटी सेक्टर की कंपनियां अब बूम-बूम कर रही हैं. किसी शेयर का भाव नौ फ़ीसदी बढ़ा है तो किसी का दस फ़ीसदी. सेल जैसी सरकारी कंपनी भी नौ फ़ीसदी ऊपर है. ये संकेत है कि अब देश में क्या होने जा रहा है.

कुछ पढ़े लिखे लोग तर्क दे रहे हैं कि लेफ़्ट की समर्थन वापसी से देश के विकास में तेजी आएगी, जैसे लेफ़्ट ने विकास की रफ़्तार रोक रखी थी. उनके मुताबिक लेफ़्ट फ्रंट ने बीते चार साल में देश को गर्त में मिला दिया. अरे भाई जरा दिमाग पर जोर दीजिये और बताइये कि आखिर लेफ़्ट फ्रंट ने ऐसे कौन से गुनाह किये जो देश गर्त में मिल गया. सरकारी कंपनियों को बेचने से रोका तो क्या ग़लत किया? पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने पर हंगामा काटा तो क्या ग़लत हुआ? क्या किसानों को दी जा रही सब्सिडी में कटौती का विरोध ग़लत था? क्या गरीबों को सुविधाएं देने की वकालत करना गुनाह है? क्या रोजगार गारंटी योजना के लिए दबाव गुनाह है? आखिर लेफ़्ट ने ऐसा क्या किया जिससे उस पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं?

देश की सत्ता के शीर्ष पर बैठे सबसे बड़े पंटर मनमोहन सिंह की माने तो लेफ़्ट ने उनकी सरकार को बंधुआ बना कर रखा था. ये एक बेहद बेहूदा टिप्पणी है. खासकर तब जब आपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम को तोड़ा हो ना कि आपको समर्थन दे रहे लेफ़्ट ने. वैसे मनमोहन के उस बयान पर मैं हैरान नहीं हुआ. ये सिर्फ मनमोहन नहीं बल्कि पूरे कांग्रेस का चरित्र है. ये वही पार्टी है जिसने एक बार नहीं कई कई बार गठबंधन सरकार को सिर्फ अपनी शर्तें नहीं मानने के कारण एक साल के भीतर गिरा दिया. चरण सिंह, देवेगौड़ा, आई के गुजराल और चंद्रशेखर इसके गवाह हैं. आज़ादी बाद के कांग्रेस के इतिहास को देख कर और कांग्रेसी नेताओं के बयान को सुन कर तो यही लगता है कि ऐसी दोगली पार्टी और उसके सबसे बड़े पंटर मनमोहन सिंह की सरकार को चार साल तक समर्थन देते रहने ही लेफ़्ट का सबसे बड़ा गुनाह है.

इसलिए आज यूपीए की जीत पर जो भी जश्न मना रहे हैं वो कल पछताने के लिए तैयार रहे हैं. क्योंकि ऐसा ही जश्न तब मनाया गया था जब देश में बेरोक-टोक आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई. तब से अब तक विकास तो बहुत हुआ है, लेकिन देश का नहीं अंबानी और टाटा जैसे घरानों का. देश का तो काफी कुछ बिक चुका है और बाकी जो भी बचा है... उसमें से बहुत कुछ अगले छह महीने में बिक जाएगा. तो सोनिया एंड कंपनी तुम देश बेचने का खुला खेल शुरू करो... आज जो तुम्हारी जीत का जश्न मना रहे हैं... कल तो उन्हें पछताना ही है.

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