Friday, July 25, 2008

यशोदा बड़ी या देवकी... क्या सच में तय करेगा कानून?

दो मां. एक मुसलमान और दूसरी हिंदू. बच्चा जो नौ साल पहले मुसलमान मां की कोख से जन्मा, लेकिन छह साल से उसे हिंदू मां पाल रही है. अब सवाल यह कि बच्चा किसका है? छह साल से हर दुख झेल उसे बड़ा करने वाली हिंदू मां का या फिर जन्म देने वाली मुसलमान मां का, जो बीते छह साल से हर पल उसे ढूंढ रही थी. पागलों की तरह इस गली से उस गली... इस छोर से उस छोर. बच्चा मिला तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा, लेकिन ये खुशी उस समय जाती रही जब बच्चे ने पहचानने से इनकार कर दिया. अब फ़ैसला कानून को करना है. जिसमें एक लड़ाई जन्म देने वाली मां हार चुकी है.

ये कोई कहानी नहीं, हक़ीक़त है. गुजरात के एक नौ साल के बच्चे और उसकी दो मांओं की हक़ीक़त. उस बच्चे का नाम है मुज़फ़्फ़र मगर अब वो विवेक बन चुका है. वो अब पूजा करता है. हिंदू त्योहारों पर जश्न मनाता है. गायत्री मंत्र का जाप करता है. उसकी बहनें हैं जो उसे राखी बांधती हैं. वो भूल चुका है कि कभी उसके अब्बा मोहम्मद सलीम शेख़ उसे अंगुली थमा कर मस्जिद ले जाया करते थे.

बात २८ फरवरी, २००२ की है. गुजरात में वहशी दरिंदे सड़कों पर इंसानियत का ख़ून कर रहे थे. उन्हीं ख़ौफ़नाक पलों में मोहम्मद शेख़ ने अपने तीन साल के बच्चे मुज़फ़्फ़र, बहन फ़िरोज़ा और मां को अहमदाबाद की गुलबर्गा सोसायटी में पूर्व सांसद जाफ़री के घर पर पहुंचा दिया. इस उम्मीद में कि जाफ़री पूर्व सांसद थे और दंगाई उनके घर तक पहुंचने की हिम्मत नहीं करेंगे. लेकिन जब नरसंहार सत्ता में बैठे लोगों द्वारा प्रायोजित हो तो क्या जाफ़री और क्या शेख़. दंगाइयों ने वहां हमला किया और अगली सुबह शेख़ को हमेशा के लिए मौन हो चुकी मां मिली और बहन और बेटे का पता नहीं चला.

उसके बाद शेख़ और उनकी बीवी ज़ेबुनिस्सा ने मुज़फ़्फ़र और फ़िरोज़ा की तलाश में दिन रात एक कर दिया. एक राहत शिविर से दूसरे राहत शिविर. एक शहर से दूसरे शहर. एक दर से दूसरे दर ... सभी जगह ढूंढा... गुहार लगाई, लेकिन हाथ खाली ही रहे. मुज़फ़्फ़र की याद आते ही मां का कलेजा फट पड़ता... वो मां हर वक़्त रोती रहती, पर करती भी तो क्या करती ... खुद की लाचारी और बदकिस्मती पर... वो कुछ आंसू बहा लेती.

लेकिन दो हफ़्ते पहले जैसे ज़िंदगी लौट आई. सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ और सुप्रीम कोर्ट की तरफ से गठित एसआईटी की मदद से मुज़फ़्फ़र मिल गया. डीएनए टेस्ट में भी इसकी पुष्टि हो गई. लेकिन अब वो मुज़फ़्फ़र से विवेक विक्रम पटनी बन चुका है. मुसलमान से हिंदू में तब्दील हो गया है. सिर्फ़ धर्म ही नहीं बदला है, वक़्त ने जेहन में बसी असली मां-बाप की यादें मिटा दी हैं. अब वो मीना पटनी को मां मानता है और उसके पिता विक्रम पटनी की चार साल पहले मौत हो चुकी है.

दफ़्तर में जब ये रिपोर्ट आई तो मेरे चेहरे पर एक साथ कई भाव उतर आए. आंखों में मोदी और वीएचपी के लिए घृणा तो उभरी ही दोनों मांओं और बच्चे की स्थिति के बारे में सोच कर दर्द की लकीर भी खिंच गई. थोड़ी देर सोच में डूबा रहा फिर यही ख़्याल उभरा कि देखिये ज़िंदगी भी क्या गुल खिलाती है... मौत की आंधी में भी कुछ ऐसे दीये जलते हुए छोड़ जाती है जो सदियों तक भटके हुए लोगों को सही राह दिखाती रहें. वरना जिस गुजरात में हिंदुओं ने सत्ता के संरक्षण पर मुसलमानों का नरसंहार किया ... उसी गुजरात में इंसानियत की ये मिसाल क्यों? क्यों एक हिंदू मां ने मुसलमान बच्चे को अपनाया? और क्यों डीएनए टेस्ट के बाद भी वो ये मानने को तैयार नहीं कि ये बच्चा गैर है?

बेटे की पहचान होने के बाद ज़ेबुनिस्सा ने पटनी परिवार से अपना मुज़फ़्फ़र मांगा तो उन्होंने ये कह इनकार कर दिया कि वो किसी मुज़फ़्फ़र को जानते ही नहीं. उनके बेटे के नाम तो विवेक है. मामला मेट्रोपोलिटन जज के पास पहुंचा. अदालत में बेटे की झलक पाने के बाद ज़ेबुनिस्सा की आंखें छलक आईं, लेकिन बेटा मां के आंसू पहचान नहीं सका. पहचानता भी तो कैसे... जब बिछुड़ते वक़्त वो इतना छोटा था कि स्मृतियों को लंबे वक़्त तक सहेजने की कला सीख नहीं सका था. अदालत ने जब उससे पूछा कि वो किस मां के साथ रहना चाहता है तो उसने मीना की तरफ इशारा कर दिया. अब वो उन्हें ही मां समझता है और मुश्किल के वक़्त उन्हीं की आंचल में सिर छुपाता है. कोर्ट ने भी फ़ैसला मीना के हक़ में दिया. छह साल से जिगर के टुकड़े को तलाश रही ज़ेबुनिस्सा की झोली खाली रह गई. लेकिन इस बार वो बेटा खोना नहीं चाहती, इसलिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया है.

जो भी मुज़फ़्फ़र से विवेक बन चुके बच्चे और उनकी दोनों मांओं की दास्तान को सुन रहा है उसके मन में पहला सवाल यही कौंधता है कि आखिर किस मां की झोली भरेगी, किसकी खाली रहेगी? कन्हैया यशोदा को मिलेगा या देवकी को? मेरे बहुत से साथियों का ये मत है कि देवकी को त्याग करना चाहिये। कान्हा को यशोदा के पास ही छोड़ देना चाहिये. लेकिन मेरा मत अलग है.

मैं ये मानता हूं कि यशोदा की नियति ही त्याग है... उसे हर जन्म में कान्हा को प्यार देना है... लेकिन इस सोच के साथ कि कान्हा उनका नहीं है. सोचिये यशोदा की झोली खाली थी चंद वर्षों के लिए ही सही कान्हा ने उस झोली को खुशियों से भर दिया ... ज़िंदगी के कई खूबसूरत रंग दिखाए... लेकिन देवकी की झोली भरी थी... और खाली हो गई ... बीते छह साल में इस देवकी के हिस्से सिर्फ़ आंसू आएं हैं ... अगर इस बार भी उसकी झोली खाली रह गई तो ये बड़ा अनर्थ होगा. यशोदा क्या खुद को माफ कर सकेगी.

2 comments:

Advocate Rashmi saurana said...

sach ye to bhut kathin saval hai. or galti bhi kisi ki nahi hai. ab dekhte hai ki court kya faisala deti hai.

pol said...

मेरे हिसाब से फ़ैसला मीना पटनी के हक में जाना चाहिये. जेबुनिस्सा को चाहिये कि वो मुज़फ़्फ़र को भूल जाए. वैसे भी अब मुज़फ़्फ़र बचा कहा हैं?

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