Tuesday, July 15, 2008

मैं असद ज़ैदी का गुनहगार नहीं

मैं, असद ज़ैदी को सिर्फ एक पाठक की हैसियत से ही जानता हूं. इसलिए अभी तक मोहल्ले पर छिड़ी बहस में नहीं कूद रहा था. इसलिए भी कि किसी गैरजरूरी विवाद में कूदना मेरी आदत नहीं. लेकिन अब इस विवाद को दूसरा रंग दिया जा रहा है. कुछ लोग ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि असद ज़ैदी की बेइज्जती हुई और उनकी धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़े किये गये तो इसके लिए सभी “सज्जन” व्यक्ति जिम्मेदार हैं. इसलिए कि इन भले लोगों ने इस गैर जरूरी बहस में हिस्सा नहीं लिया और ये साबित करने की कोशिश नहीं की कि असद धर्मनिरपेक्ष हैं.

ये बड़ी अजीब और हास्यास्पद बात है कि पहले सोची समझी साज़िश के तहत किसी शख़्स को कठघरे में खड़ा करो, उसकी तमाम अच्छाइयों को नज़रअंदाज करते हुए उसकी बेइज्जती का तमाशा देखो. उसके बाद उसी बहाने उन तमाम लोगों को कठघरे में खड़ा करने लगो जो आपकी इस घटिया सोच और साज़िश से इत्तेफ़ाक नहीं रखते.

यहां ये दलील भी दी जा रही है कि मंशा एक सार्थक बहस की थी। बहस किससे और क्यों? बहस का भी एक तकाजा होता है। उसके कुछ कायदे होते हैं. बहस तभी होनी चाहिये जब जरूरत हो. यहां असद ज़ैदी को बज़ार में खड़ा करने की कोई जरूरत नहीं थी. ये किसी को हक़ नहीं था कि वो उन्हें तनाशाही फरमान सुनाने वालों के बीच खड़ा कर उनकी भद्द पिटने का तमाशा देखते रहें. जिन्होंने भी ऐसा किया उनकी नीयत पर सवाल उठने लाजिमी हैं. अगर सवाल उठ रहे हैं तो वो उन सवालों का जवाब दें. इसे बाकी भले लोगों पर थोप कर सवालों से बचने की कोशिश न करें.

यहां एक बात और। बहस वहीं हो सकती है जहां उसकी गुंजाइश हो और सार्थक नतीजे निकलने की उम्मीद. आप बहस उसी से कर सकते हैं जो मर्यादित ढंग से बहस करने में यकीन रखता हो. जिसका इस अवधारणा में यकीन नहीं उसे बहस का न्योता देना कीचड़ में धंसने की तरह है. वहां आप तो गंदे हो जाएंगे, लेकिन उस शख़्स की सेहत पर फर्क नहीं पड़ेगा. ऐसे लोगों के सबसे सटीक उदाहरण नरेंद्र मोदी और ओसामा बिन लादेन हैं. आपने इन्हें हज़ारों की भीड़ में ज़हर उगलते देखा होगा. आपने इन्हें टीवी चैनलों पर लोगों को भड़काते सुना होगा. लेकिन क्या आपने मोदी और लादेन को कभी किसी खुली बहस में हिस्सा लेते देखा है? हो सकता है कि अविनाश और उनके साथियों ने ऐसा देखा हो, लेकिन मैंने तो नहीं देखा। इसलिए मेरा मानना है कि असद ज़ैदी को बाज़ार में खड़ा कर उनका मजाक उड़ाया गया है, उनका तमाशा बनाया गया है. इस अपराध के लिए मोहल्ले को असद ज़ैदी से माफी तो मांगनी ही चाहिये।

7 comments:

अनुनाद सिंह said...

आपने इमानदारी से इस मुद्दे को समझने की कोशिश की है, लेकिन दुर्भाग्य से आप भी भटक गये और सही चीज नहीं पकड़ पाये।

मेरी समझ ये कहती है कि यह सब कुछ एक सोची-समझी रणनीति के तहत हुआ और हो रहा है। जैदी को एक 'महान कवि' के रूप में विज्ञापित करने की परियोजना बनायी गयी है। इसकी रणनीति यह है कि पहले जैदी की कोई गाली-गलौज युक्त कविता को बाजार में कुछ लाल-बुद्धिजीवियों की मदद से उतारा जाय; कुछ विवाद पैदा किया जाय; फ़िर उस विवाद पर विवाद किया जाय ... और जैदी जी हिन्दी के 'महान कवि' के रूप में स्थापित हो गये।

pol said...

मुझे लगता है कि अनुनाद सही कह रहे हैं. ये एक सोची समझी साजिश का हिस्सा है. बड़ी साज़िश का हिस्सा.

समरेंद्र said...

अनुनाद जी,
मैं ऐसा नहीं मानता और मानने की फिलहाल कोई वजह नज़र नहीं आती. ये मेरा यकीन है और मैं अपने इस यकीन के साथ जीना चाहता हूं कि आप किसी को साम्प्रदायिक ठहरा कर उसे महान नहीं बना सकते. जिस किसी पर ये धब्बा एक बार लग गया वो या तो उसके साथ जीने को अभिशप्त होता है या फिर उसे वो धब्बा धोना पड़ता है.

pol said...

समरेंद्र जी,
आप सहमत नहीं, लेकिन मैं अनुनाद जी की बात से सहमत हूं. ऐसे ही आरोपों ने एम एफ हुसैन को महान बना दिया. इस दौर में कई और पेंटर हुसैन से ज्यादा काबिल थे, लेकिन वो पिछड़ गए. जबकि साम्प्रदायिकता ने हुसैन को आसमान पर बिठा दिया.

भुवनेश शर्मा said...

अनुनादजी की बात से सौ फीसदी सहमत....अविनाश जैसे जहरीले नागों का यही काम है और इसीलिए उन्‍होंने अपना मो‍हल्‍ला नामक ब्‍लाग बनाया हुआ है...कमीनेपन की इस पराकाष्‍ठा के लिए अविनाश को बधाई

रही बात जैदी की तो उन जैसों को शह देने का काम तो ये लाल झंडे वाले ही करते हैं....जो भारतमाता की बजाय चीन को अपनी मां मानते हैं

अरुण said...

सही बात कही है अनुनाद जी ने . मोहल्ले और कस्बे का ये पुण्य कार्य शुरू दिन से रहा है . चाहे बात भैस के दूध की हो या फ़िर जाती की या धर्म की , हर चीज मे अल्पस्ख्यक वाद या अगडे पीछदे की कहानिया ढूढना और विद्वेश वै वैमनस्ता फ़ैलाना रहा है.

Ashok Pande said...

एक आदमी जिसका नाम असद है, सत्तर के दशक से उम्दा कविताएं कर रहा है.

बहुत से आदमी जिनके पास अपने कुल हासिल के नाम पर एक ईमेल आईडी भर है या सेर भर नफ़रत, उनसे कविता की बात करना व्यर्थ है. उनका बस चले तो बीसवीं सदी का सारा साहित्य आग में झोंक डालें. समरेन्द्र, आशा है आपने असद जी की कविताओं की तीनों किताबें पढ़ी होंगी. बाक़ी, निर्लज्ज और परले दर्ज़े की ढीठ टिप्पणियों से आपका मन बहलता हो ठीक है.

आशा है मेरी बात को सही परिप्रेक्ष्य में आंका जाएगा. असद ज़ैदी साहब के प्रकरण में मेरा यह अपना आख़िरी वक्तव्य है. इस पर थूकने वाले मुंह में क्विंटल भर बलगम भरे बैठे हैं तो भी आपके यहां आकर यह टिप्पणी करने की ज़ुर्रत कर रहा हूं.

अपना ख़याल करें और जम कर पढ़ें. यही समय की ज़रूरत है आप जैसे सतर्क युवाओं से.

शुभ हो!

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