Thursday, July 17, 2008

सोमनाथ जवाब दो... और कैसे रोका जा सकता है करार?

सोमनाथ चटर्जी ने फिर कहा है कि वो बीजेपी के साथ यूपीए सरकार के ख़िलाफ़ मतदान नहीं करेंगे और अपने पुराने रुख़ पर कायम हैं. ये बेहद बचकाना तर्क है. सोमनाथ चटर्जी से पूछा जाना चाहिये कि ऐटमी डील के ख़िलाफ़ हैं या पक्ष में। अगर वो पक्ष में हैं तब तो बहस की दिशा अलग होगी. अगर ख़िलाफ़ हैं तो उनसे ये पूछा जाना चाहिये कि सरकार को अमेरिका से ऐटमी करार से रोकने का क्या उपाय है? क्या सरकार गिराए बगैर ऐटमी डील रोकी जा सकती है? किसी भी औसत विवेक वाले शख़्स से भी ये पूछा जाए तो उसका सीधा जवाब होगा... नहीं. जब सरकार गिराए बगैर ऐटमी डील नहीं रोकी जा सकती तो फिर सोमनाथ से ये भी पूछा जाना चाहिये कि बिना बीजेपी के साथ मतदान किये वो सरकार कैसे गिराएंगे और ऐटमी डील को कैसे रोकेंगे?

यहां सोमनाथ ये भी बताएं कि विश्वास मत पर मतदान बराबरी पर छूटा तब वो क्या करेंगे? वैसी सूरत में लोकसभा अध्यक्ष को अपना मत देना होता है. तब क्या वो मत बीजेपी के ख़िलाफ़ और यूपीए के पक्ष में देंगे. दरअसल सोमनाथ चटर्जी की कोई भी दलील गले नहीं उतर रही. उनके जैसे सीपीएम के कुछ और सांसद यही राग अलाप रहे हैं. उन सांसदों की सोच पर ताज्जुब होता है. यहां उन तमाम सांसदों को यह भी याद दिलाना चाहिये कि इन्हीं सोमनाथ चटर्जी को जब लोकसभा का अध्यक्ष बनाया जा रहा था तब बीजेपी ने भी उनके नाम का विरोध नहीं किया था. तब क्यों नहीं सोमनाथ चटर्जी ने सामने आकर कहा कि उन्हें बीजेपी के समर्थन की कोई जरूरत नहीं. हालांकि तब बीजेपी के समर्थन या विरोध से उनके चुनाव पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता, फिर भी सोमनाथ को सांकेतिक तौर पर ही सही ये कहना चाहिये था कि उन्हें बीजेपी का समर्थन नहीं, विरोध चाहिये.

सिर्फ इन्हीं सवालों का जवाब क्यों, सोमनाथ को ये भी बताना होगा कि अगर वो सिर्फ एक सांसद होते और सदन में महिला विधेयक पेश किया जाता, बीजेपी उसके समर्थन में वोट देती तो क्या वो उसके ख़िलाफ़ खड़े होते? उन्हें ये भी बताना होगा कि अब तक के अपने संसदीय इतिहास में ऐसे कौन कौन से विधेयक हैं जिनमें उनकी पार्टी ने बीजेपी के साथ मतदान किया और उन्होंने उसके ख़िलाफ़.

सच यही है कि आज ये बुजुर्ग सियासतदान या तो पद का लोभी हो चुका है या फिर अमेरिका से ऐटमी करार के समर्थन में है. यही वजह है कि वो अपने बचाव में ऐसी बेतुका दलीलें गढ़ रहा हैं जिन्हें मंजूर नहीं किया जा सकता.

2 comments:

mahadev said...

परमाणु करार का परिणाम परनिर्भरता होगी । आज हमारी सरकार के आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक निर्णय मे अमेरिका और बिलायत सरिखे सम्राज्यवादी देशो का बहुत बडी भुमिका होती है । हमे अपने निर्णय उनके हित मे लेने पडते है । भारत को जल विद्युतिय बिजली मे ज्यादा निवेष करना चाहिए चाहिए । नही तो अमेरिका कभी कल-पुर्जे देने के नाम पर और कभी युरेनियम देने के नाम पर हमारी बाहेँ मोडता रहेगा । वामपंथी दलोँ को देश हित मे समर्थन वापस लेने के लिए धन्यवाद ।

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

दुखद बात तो यह है की आपके तर्क बचकाना हैं न की सोमनाथ जी के. उन्होंने अपने पद की लाज रखी है

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