Thursday, July 24, 2008

लो अब चलेगा देश बेचने का खुला खेल

लेफ़्ट ने समर्थन वापस ले लिया फिर भी सरकार बच गई. तीन पार्टियों बीजेपी, शिवसेना, बीजेपी और टीडीपी के जयचंदों ने मिल कर सरकार बचा दी. मनमोहन की बांछें खिल गई हैं. उनकी आका सोनिया और कांग्रेस के सारे पंटर भी जश्न मना रहे हैं. जश्न मुंबई में भी मनाया जा रहा है. शेयर बाज़ार के सारे दलाल सक्रिय हो गए हैं. निफ़्टी और सेंसेक्स छलांगे लगा रहा है. एक झटके में अमेरिका की मंदी का असर ख़त्म हो गया है. पहले ही दिन सेंसेक्स ने साढ़े आठ सौ अंकों की छलांग लगाई और निफ़्टी ने करीब ढाई सौ अंक. ये छलांग बताती है अब देश में आर्थिक सुधारों के नाम पर खुला खेल चलेगा. लेफ़्ट की लगाम हट गई है और अब दलालों का राज है. सरकारी कंपनियां बेची जाएंगी, निजी कंपनियों को कई तरह की रियायतें दी जाएंगी. उन रियायतों के लिए चिदंबरम एंड कंपनी को भी तोहफा मिलेगा. अरे हां, अमर सिंह को मत भूलियेगा... वो इस वक़्त का सबसे बड़ा दलाल है, बिल्डरों के हाथ उत्तर प्रदेश के कई शहर बेच चुका है और अब देश बेचने की तैयारी है.

इसको विस्तार से समझने के लिए ज़्यादा जोर देने की ज़रूरत नहीं है. आज जिन कंपनियों के भाव चढ़े हैं उनमें सबसे ऊपर जूनियर अंबानी की कंपनियां हैं. अमर सिंह के दोस्त अनिल अंबानी की कंपनियां. आरएनआरएल जैसी कमजोर कंपनी के भाव सबसे अधिक २२ फ़ीसदी चढ़े. यही नहीं पिछले छह महीने से मार झेल रही रियेलिटी सेक्टर की कंपनियां अब बूम-बूम कर रही हैं. किसी शेयर का भाव नौ फ़ीसदी बढ़ा है तो किसी का दस फ़ीसदी. सेल जैसी सरकारी कंपनी भी नौ फ़ीसदी ऊपर है. ये संकेत है कि अब देश में क्या होने जा रहा है.

कुछ पढ़े लिखे लोग तर्क दे रहे हैं कि लेफ़्ट की समर्थन वापसी से देश के विकास में तेजी आएगी, जैसे लेफ़्ट ने विकास की रफ़्तार रोक रखी थी. उनके मुताबिक लेफ़्ट फ्रंट ने बीते चार साल में देश को गर्त में मिला दिया. अरे भाई जरा दिमाग पर जोर दीजिये और बताइये कि आखिर लेफ़्ट फ्रंट ने ऐसे कौन से गुनाह किये जो देश गर्त में मिल गया. सरकारी कंपनियों को बेचने से रोका तो क्या ग़लत किया? पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने पर हंगामा काटा तो क्या ग़लत हुआ? क्या किसानों को दी जा रही सब्सिडी में कटौती का विरोध ग़लत था? क्या गरीबों को सुविधाएं देने की वकालत करना गुनाह है? क्या रोजगार गारंटी योजना के लिए दबाव गुनाह है? आखिर लेफ़्ट ने ऐसा क्या किया जिससे उस पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं?

देश की सत्ता के शीर्ष पर बैठे सबसे बड़े पंटर मनमोहन सिंह की माने तो लेफ़्ट ने उनकी सरकार को बंधुआ बना कर रखा था. ये एक बेहद बेहूदा टिप्पणी है. खासकर तब जब आपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम को तोड़ा हो ना कि आपको समर्थन दे रहे लेफ़्ट ने. वैसे मनमोहन के उस बयान पर मैं हैरान नहीं हुआ. ये सिर्फ मनमोहन नहीं बल्कि पूरे कांग्रेस का चरित्र है. ये वही पार्टी है जिसने एक बार नहीं कई कई बार गठबंधन सरकार को सिर्फ अपनी शर्तें नहीं मानने के कारण एक साल के भीतर गिरा दिया. चरण सिंह, देवेगौड़ा, आई के गुजराल और चंद्रशेखर इसके गवाह हैं. आज़ादी बाद के कांग्रेस के इतिहास को देख कर और कांग्रेसी नेताओं के बयान को सुन कर तो यही लगता है कि ऐसी दोगली पार्टी और उसके सबसे बड़े पंटर मनमोहन सिंह की सरकार को चार साल तक समर्थन देते रहने ही लेफ़्ट का सबसे बड़ा गुनाह है.

इसलिए आज यूपीए की जीत पर जो भी जश्न मना रहे हैं वो कल पछताने के लिए तैयार रहे हैं. क्योंकि ऐसा ही जश्न तब मनाया गया था जब देश में बेरोक-टोक आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई. तब से अब तक विकास तो बहुत हुआ है, लेकिन देश का नहीं अंबानी और टाटा जैसे घरानों का. देश का तो काफी कुछ बिक चुका है और बाकी जो भी बचा है... उसमें से बहुत कुछ अगले छह महीने में बिक जाएगा. तो सोनिया एंड कंपनी तुम देश बेचने का खुला खेल शुरू करो... आज जो तुम्हारी जीत का जश्न मना रहे हैं... कल तो उन्हें पछताना ही है.

3 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप से सौ फीसदी सहमत, अब दलालों का खुला खेल चलना ही है।

Pramod Singh said...

बहुत सही, बंधु. मगर हम जितना हल्‍ला मचा सकते हैं, मचाते रहें.
चोर-दलाल भाय-भाय, यूपीए सरकार हाय-हाय!

pol said...

आपकी बात सही है. लेकिन हम कर ही क्या सकते हैं. हम चाहे कितना भी लिखते रहें... शोर मचाते रहे... इससे उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. दलाल का काम है बेचना और वो बेचेंगे ही... उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि किसी औरत का जिस्म बेच रहे हैं या फिर देश. अफसोस यही है कि अब दलालों का ही राज है.

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