Sunday, May 27, 2007

रिलायंस पर और तेज करो हमले






मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस फ्रेश के स्टोर पर हमले शुरू हो गए हैं। ये हमले रांची, इंदौर और मैंगलोर में हुए हैं। जबलपुर, ग्वालियर और भोपाल में भी इसका विरोध होने लगा है। हालांकि ये अभी ठोस तौर पर कहा नहीं जा सकता कि ये हमले अचानक पनपे आक्रोश का नतीजा है या फिर सोची समझी रणनीति का हिस्सा। लेकिन इससे ये तो साफ होता ही है कि रिलायंस समेत उन तमाम कंपनियों के लिए आने वाले दिन मुश्किल भरे होंगे, जो रिटेल सेक्टर में कूद रही हैं।
दरअसल ये प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनसे होशियार वित्त मंत्री पी चिदंबरम की नीतियों का नतीजा है कि आज रिटेल सेक्टर में बड़ी कंपनियों ने हाथ डाला है। वरना इस क्षेत्र को अब तक छोटे कारोबारियों के लिए मुक्त रखा गया था। बड़ी कंपनियों को इस सेक्टर में आने देने के पीछे दो अहम दलीलें दी जा रही हैं। पहली दलील ये है कि इससे किसानों को फायदा मिलेगा। बड़ी कंपनियां उन्हें अनाज की अच्छी कीमत देंगी। वो भी सीधे। दूसरी दलील ये है कि इससे रोजगार के अवसर पैदा होंगे। लाखों पढ़े लिखे नौजवानों को काम मिलेगा। ये दोनों ही दलीलें सतही तौर पर सही लगती हैं। लेकिन हकीकत में ये फैसला और इसके पीछे की मंशा बेहद खतरनाक है।
मंशा पर बात बाद में। सबसे पहले चर्चा किसानों के नफा नुकसान की। किसान इस देश का सबसे अधिक छला गया तबका है। सारे नेता किसानों की बेहतरी की दुहाई देते हैं, लेकिन सबसे अधिक धोखा भी उन्हीं को देते हैं। उदाहरण के तौर पर बैंकों की डूबत पूंजी (एनपीए) को ही लीजिये। किसानों के साथ इतनी तंगदिली जबकि कारोबारियों पर मेहरबानी की कोई हद नहीं है। देश में इस समय करीब साठ हजार करोड़ रुपये डूबत पूंजी है। ये बैंकों से लिया गया वो कर्ज है, जिसे कर्जदार चुकाने से मना कर देता है या फिर खुद को कंगाल घोषित कर सारा पैसा डकार जाता है। इसमें से किसानों पर सिर्फ १५ फीसदी बकाया है। यानी हर डूबते रुपये में पिचासी पैसा गैरकृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों या फिर कंपनियों का है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा बड़ी कंपनियों का है। रिलायंस फ्रेश के मालिक मुकेश अंबानी की कंपनी भी अरबों रुपये दबा कर बैठी है। देश की चंद बड़ी कंपनियों के द्वारा डकारी गई पूंजी ही समूचे कृषि व्यवसाय से जुड़ी डूबत पूंजी से ज्यादा हो जाती है। जब भी कृषि क्षेत्र की बेहतरी के लिए पैसा देने की बात की जाती है तो सरकार ये कहती है कि वहां दिया हुआ पैसा डूब जाता है। ये उसका दोहरा चरित्र है। सत्ता में बैठे लोगों को अमीरों की चोरी मंजूर है पर किसानों की मजबूरी मंजूर नहीं।
किसानों के साथ ये धोखा बहुत बड़ा है। इसे समझने के लिए कुछ और आंकड़ों पर नजर डालने की जरूरत है। १९८१ में करीब गांव में हर सौ में बीस परिवार कर्ज में डूबे थे। २००२ में ये आंकड़ा बढ़ कर छब्बीस हो गया है। इस समय गांववालों पर कुल १ लाख ११ हजार ४६८ करोड़ रुपये कर्ज है। इसमें एक बड़ा हिस्सा सूदखोर महाजनों से लिया गया है। १९९१ में जहां ग्रामीणों पर कुल कर्ज का १७ फीसदी हिस्सा सूदखोर महाजनों का था वो २००२ में बढ़ कर तीस फीसदी के करीब हो गया है। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किसानों पर सूदखोर महाजनों का जाल कितना घना हुआ है। यही वजह है कि वो आए दिन मौत को गले लगा रहे हैं और मनमोहन सिंह समेत देश के हुक्मरान बैठ कर तमाशा देख रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आंध्र प्रदेश में चार साल के भीतर २०४७ किसान खुदकुशी कर चुके हैं। महाराष्ट्र में तो पिछले ही साल २३२९ किसानों ने खुदकुशी की और इस साल के शुरुआती दो महीने के भीतर ही वहां २३९ किसान जान दे चुके हैं। पिछले चार साल में मौत का ये आंकड़ा ३९४० है। केरल में २००१ से इस साल जनवरी तक ८५४ किसान जान दे चुके हैं। पंजाब में भी तीन साल में तीस किसानों ने जान दी। गुजरात में भी चार साल में १८ किसान आत्महत्या कर चुके हैं। मौत का ये सिलसिला जारी है। खेतों में मौत और बेबसी की फसल लहलहा रही है और सरकार किसानों के साथ विश्वासघात करती जा रही है।
इसी से जुड़ा एक और पहलू भी है। बड़ी कंपनियां खेतों में खड़ी फसल सीधे खरीद रही हैं और मनमाने दामों पर शहरों में बेच रही हैं। इससे हो सकता है कि किसानों को थोड़े समय के लिए पचास सौ रुपये ज्यादा मिल जाएं। लेकिन बाद में यही कंपनियां उन्हें गुलाम बना लेंगी। ये बहुत कम लोग जानते हैं कि स्वयंसेवक प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपनी सत्ता के आखिरी दिनों में नेशनल कमोडोटी एक्सचेंज का गठन करा गए। जिसे हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने और मजबूत कर दिया है। ये ऐसा एक्सचेंज है जहां ५७ चीजों का कारोबार होता है। इनमें ४७ कृषि उत्पाद हैं। चावल, दाल, गेहूं और ऐसी तमाम चीजों की खरीद बिक्री यहां होती है। खरीद बिक्री एक श्रृंखला में होती है। मान लीजिये कि एक दलाल किसानों के पास जाकर १०००० क्विंटल गेहूं का सौदा आठ सौ रुपये क्विंटल के हिसाब से कर लेता है। यही दलाल एक्सचेंज पर आकर घोषणा करेगा कि उसके पास १०००० क्विंटल गेहूं है और अगर किसी को चाहिये तो वो उससे खरीद सकता है। अगला दलाल या कारोबारी उस पर बोली लगाता है। मान लीजिये कि उसने पचास पैसे अधिक बोली लगाई और सौदा तय हो गया। अब पहला दलाल दूसरे दलाल के गोदाम तक वो गेहूं पहुंचा देगा। लेकिन इसी बीच तीसरे दलाल ने दूसरे दलाल को पचास पैसे प्रति किलो के हिसाब से अधिक पैसे देकर वो गेहूं खरीद लिये। यहां गेहूं की कीमत अब नौ रुपये प्रति किलो या कहें कि नौ सौ रुपये प्रति बोरी हो चुकी है। उसी गेहूं का सौदा दो बार और हुआ तो कीमत एक रुपये और बढ़ जाएगी। इससे कालाबाजारी को बढ़ावा मिलता है और आखिर में इसके जाल में किसान भी फंसता है। क्योंकि कोई भी किसान जरूरत की सारी चीजें अपने खेत में नहीं उगा सकता। उसे कुछ चीजें बाजार से खरीदनी ही पड़ती हैं। ऐसे में उसे भी नुकसान उठाना ही पड़ता है।
यहां एक बात और ध्यान देने की है। भारत में ज्यादातर किसान छोटे और मंझोले हैं। वो अपनी जरूरत को ध्यान में रख कर फसल उगाते हैं। उनका पहला मकसद मुनाफा कमाना नहीं बल्कि घर की जरूरत के हिसाब से अनाज पैदा करना है। लेकिन जब भी किसान जरूरत का दामन छोड़ कर मुनाफे के पीछे भागा है नतीजे खतरनाक हुए हैं। उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र को ही लीजिये। यहां मुनाफा कमाने के लिए किसानों ने बड़े पैमाने पर कर्ज लेकर बीटी कॉटन की खेती की। लेकिन कभी मौसम ने धोखा दे दिया तो कभी बीज खराब निकल गए। एक दो बार किस्मत ने साथ दिया और फसल अच्छी हुई तो बेरहम बाजार ने साथ नहीं दिया। कीमतें बेतहाशा गिर गईं। किसानों की बदहाली की ये वजहें सरकार द्वारा गठित राष्ट्रीय किसान आयोग ने गिनाई हैं लेकिन सरकार आंख मूंदे बैठी है। यही वजह है मेहनत से पूरे देश का पेट भरने वाले किसान मौत चुन रहे हैं।
अब बात रोजगार की। इस समय मोटे तौर पर रिटेल सेक्टर से करीब साठ लाख लोग जुड़े हुए हैं। अगर इसमें उनके परिवार के सदस्यों की संख्या जोड़ दे तो करीब साढ़े तीन करोड़ लोगों की जिंदगी रिटेल सेक्टर से जुड़ी है। आपके हर गली नुक्कड़ पर एक दो दुकान मिल जाते हैं और फेरी वाले भी घूमते नजर आ जाते हैं। इन दुकानों में एक मालिक होता है और एक-दो मजदूर। ये मजदूर कौन हैं। कोई पांचवी पास तो कोई दसवीं पास। हो सकता है कि कोई कभी स्कूल ही नहीं गया हो। रिटेल सेक्टर में ऐसे मजदूरों की संख्या सैकड़ों हजारों में नहीं है बल्कि लाखों करोड़ों में हैं। क्या इन लोगों को जीने का हक नहीं है? अगर सब जगह शॉपिंग मॉल और बिग बाजार बनेंगे और वहां ग्रैजुएट लड़के काम करेंगे तो फिर कम पढ़े लिखे लोग कहां जाएंगे? वो अपने परिवार का पेट कैसे पालेंगे? अगर बड़ी कंपनियां एक लाख पढ़े लिखे लोगों को रोजगार देंगी तो यकीन मानिये उसकी तुलना में एक करोड़ लोगों के पेट पर लात भी मारेंगी। यही नहीं इन बड़ी कंपनियों में काम करने वाले भी हमेशा के लिए सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे। ये कंपनियां हायर ऐंड फायर की तर्ज पर काम करती हैं। एक दो साल बाद जब कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ने लगती है तो उन्हें हटा कर नए कर्मचारी बहाल किये जाते हैं। अभी हाल ही में बिग बाजार ने मुंबई में ज्यादातर कर्मचारियों की छंटनी की। जिसके बाद उन्हें आंदोलन पर उतरना पड़ा। इस लिहाज से देखिये तो रोजगार की दलील तो सीधे तौर पर खारिज हो जाती है।
यहां एक और अहम बात है। घर के करीब दुकानों से लोगों का एक आत्मीय रिश्ता होता है। दुकानदारों से कॉलोनी के बच्चे अंकल आंटी कह कर बात करते हैं तो बड़े लोग भाई साहब, बहन जी कह कर। आप जब भी इन दुकानों पर पहुंचते हैं तो वहां का मालिक या कर्मचारी आपको पहचाना सा लगता है। कभी कभार जेब में पैसे नहीं हुए तो वो आपको सामान दे देगा और कहेगा कि भाई पैसे अगली बार दे दीजियेगा। गांवों में तो ये रिश्ता और गहरा होता है। मुझे याद है कि झगड़ा होने के बाद भी लतीफ चचा के यहां से मैंने कई बार सामान खरीदा है और पैसे बाद में दिये हैं। बचपन में तो ये भी होता था कि झोली भरकर गेहूं ले गए और कहा कि इसकी कीमत का दूसरा सामान दे दीजिये। ये रिश्ता काफी गहरा रिश्ता है। लेकिन जब बड़ी कंपनियां आती हैं तो सीधे इस रिश्ते पर चोट करती हैं। वहां आपकी जेब में नोट नहीं हैं तो क्रैडिट या डेबिट कार्ड होना चाहिये। अगर वो भी नहीं है तो आप सामान देख तो सकते हैं लेकिन खरीद नहीं सकते।
अब आप सोच रहे होंगे कि इतने नुकसान पर भी सरकारें बड़ी कंपनियों को रिटेल में आने क्यों दे रही हैं? इसकी वजह साफ है। दरअसल सत्ता में बैठे लोगों में बड़ा तबका बिका हुआ है। ज्यादातर मंत्री किसी न किसी कंपनी का दलाल है। इस चीज को समझने के लिए यहां एक उदाहरण देना जरूरी है। ये उदाहरण भी दो बड़ी कंपनियों से जुड़ा है। आप सब जानते हैं कि रिलायंस रिटेल में उतर चुकी है। लेकिन वॉलमार्ट के साथ बाजार में उतरने की भारती की योजना अब भी उहापोह में है। वजह साफ है। वालमार्ट के साथ जैसे ही भारती का करार हुआ, सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी। उसमें कहा कि रिटेल सेक्टर के छोटे कारोबारियों के हितों का ख्याल रखना चाहिये। उसके बाद वालमार्ट की योजना खटाई में पड़ गई। क्या सोनिया गांधी इस चिट्ठी से ये कहना चाहती हैं कि रिलायंस ठीक है, लेकिन वालमार्ट नहीं? क्या सोनिया गांधी ये कहना चाहती हैं कि रिलायंस छोटे कारोबारियों की दोस्त है और वालमार्ट दुश्मन? अगर आप ऐसा समझ रहे हैं तो ये बिल्कुल गलत है। दरअसल ये सारा खेल पैसे का है। कांग्रेस में रिलायंस के बड़े एजेंट हैं और ये एजेंट दस जनपथ तक यानी सोनिया के घर तक गहरी पैठ रखते हैं। वालमार्ट से सबसे अधिक खतरा रिलायंस को है। यही वजह है कि जब भी उसके आने की चर्चा चलती है तो रिलायंस के एजेंट सक्रिय हो जाते हैं और सोनिया गांधी को समझा बुझा कर एक चिट्ठी लिखवा दी जाती है। हो सकता है कि इस समझाने बुझाने के क्रम में अरबों रुपये के वारे न्यारे भी हुए हों। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि वालमार्ट भारत में आएगा नहीं। रिटेल सेक्टर का वो सबसे बड़ा खिलाड़ी है। उसने अमेरिका में लाखों घर उजाड़े हैं। ये शैतान कंपनी सत्ता में बैठे दलालों की जेब गरम करना बखूबी जानती है। जिस दिन वालमार्ट के अधिकारियों ने ये काम कर दिया उसी दिन उसकी भी भारत में एंट्री हो जाएगी।
ऐसे में लोगों को कंपनियों और नेताओं की इस सोची समझी साजिश का सिर्फ और सिर्फ विरोध करना चाहिये। वो भी पुरजोर विरोध। खुदरा कारोबारी, मजदूर, रेड़ी खोमचे वाले सबको एकजुट होकर अभियान चलाना चाहिये। सरकार पर दबाव बनाना चाहिये कि वो इस फैसले को बदले। दबाव बनाने के लिए हर हथकंडा जायज है। इस मुहिम का किसानों और मध्य वर्ग को भी चाहिये कि समर्थन करे। दबे सुर में नहीं बल्कि मुखर होकर। क्योंकि अभी ये साजिश भले ही खुदरा कारोबारियों के खिलाफ क्यों न हो। बाद में इसके निशाने पर किसान भी होंगे और मध्य वर्ग भी।

6 comments:

कहकशां.. said...

सब तरफ से किसानों की मुसिबत बढ़ा कर आखिर हम देश को कहां ले जा रहे हैं क्या गांवो का देश कहा जाने वाला भारत औद्योगिकरण की अंधी दौड़ में अपनी इस विरासत को खो देगा। कहां तो हमें अपनी कृषि संपदा को बढ़ाने और बेहतर बनाने के लिए कोशिशे करनी चाहिए थी लेकिन हम तो मानो खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के लिए उतावले हो रहे हैं। हम उस चीज के पीछे भाग रहे है जिसमें हम माहिर नहीं हैं और उस अनमोल निधी को मिटते देख रहे हैं जो सदियों से हमारी पहचान रही है तब क्या होगा जब इस देश के खेत यहां के नागिरकों का पेट नहीं पाल सकेंगे. इतने किसानों की आत्महत्या भी हमारी आंखें नहीं खोल सकी है, जब तक हम सब खुद को किसानों की समस्याओं से नहीं जोड़ेंगे तब तक कुछ हो पाना मुश्किल है क्योंकि मैं मानता हूं कि इसके लिए हम सिर्फ सरकार और कंपनियों को दोषी ठहराकर ही कर्तव्यों की इतिश्री नहीं कर सकते। रिलायंस की मंशा और समस्या के मूल पर प्रहार के लिए आपको धन्यवाद

गिरिजेश said...

जब किसी देश को प्राइवेट कंपनी की तरह चलाया जाने लगे तो ऐसी ही त्रासदी देखने को मिलती है। (कारोबार की भाषा में वैसे भी हम इसे India Inc. ही कहते हैं)यही वजह है कि ग्रोथ के नाम पर सरकार नफा-नुकसान के टर्म में सोचती है। ये कर देंगे तो इतने का घाटा होगा, ये करेंगे तो इतना रेवेन्यू आएगा...। इस क्रम में जिस तरह किसी कंपनी, किसी सर्विस प्रोवाइडर या किसी टीवी चैनल के अपने टारगेट कंज्यूमर/ऑडिएंस होते हैं, उसी तरह सरकार की नीतियां भी एक टारगेट ऑडिएंस को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं। और ये ऑडिएंस है महानगरों और उप महानगरों में रहनेवाला कंज्यूमर या कस्टमर जिसके पास खर्च करने को नोट है। कंज्यूमर इज द किंग। मजदूर-किसान यहां कहीं नहीं है क्योंकि वो कंज्यूमर नहीं है। सरकार चाहती है कि देश अमेरिका और ब्रिटेन की तरह स्मार्ट, ग्लॉसी, खाता-पीता और खुशहाल दिखाई दे।
बड़ी-बड़ी कंपनियां किस तरह छोटे कामगारों, किसानों और मजदूरों के पेट पर लात मार रही हैं ये हम अपने आस-पास भी देख सकते हैं। किसी सोसाइटी के सामने सब्जी बेचनेवाला खड़ा रह जाता है और लोग फूड बाजार और रिलायंस फ्रेश से सब्जी खरीद लाते हैं। आस-पड़ोस के इलेक्ट्रिशियन, पेंटर, प्लंबर और कारपेंटर घूमते रह जाते हैं और लोग बिग बाजार के होम टाउन से संपर्क करके अपना काम करा लेते हैं। इसी मॉडल पर छोटी छोटी सोसाइटियों में ऐसे ग्रुप बनने लगे जो कहते हैं 365 रुपए की मेंबरशिप लीजिए और साल भर अपने फ्लैट की मेंटेनेंस मुफ्त कराइए। जाहिर है ऐसे ग्रुप्स हर किसी अनपढ़-गंवार कारीगर को काम नहीं देते।
ये महामारी तेजी से फैल रही है। और इसका इलाज शायद हमले ही हैं। और ताकतवर, और बड़े हमले।

Abhishek said...

Thanks for writing such a hard hitting blog. It aptly summarises the implications of opening up retail sector which would be disasterous for various segments of our society. IT also brings out the prevalent corruption in the political system which dictates the economic growth of India.
It seems that the idea of opening up retail sector is guided by 'blind economic growth' and at the cost of unorganised retail sector. Similar to previous economic policies, this decision has also been promoted as something which will bring more money, jobs and help farmers in getting better prices. But it clearly is a misguided policy where the policy makers have decided deliberately to ignore the costs involved. New jobs, more money in the economy but what will happen to the people who are part of this sector. It definitely is an exclusive policy for it aims to promote growth and wealth but will end up adding numbers to the poverty rate. On the one hand, our PM keep harping on the need to include every section of the society in the process of growth whereas on the other such mutually exclusive policies are being implemented. Its time when people should come out in open and protest against such partial policies in whatever way possible as they did at Nandigram.

Anonymous said...

मीडिया सेक्टर में जुड़े सचेत लोगों के लिए दो शब्द

बड़े बड़ों को बांध रखा है गधा बनाके..
तोसक चादर चितवन सब दुंगा
मुझे बचाने की सेवाएं तुझसे लुंगा
बड़े बड़ों को बांध रखा है गधा बनाके...
-नागार्जुन

Valley of Truth said...

फल सब्ज़ी बेचने के बहाने रिलायंस जैसी कंपनियों ने बड़ा खेल रचा है। किसान और मंडी के बीच की परंपरागत रुट को काट कर रख दिया है। इससे बाज़ार में किल्लत पैदा हो गई है। दाम आसमान छू रहे हैं। ऐसे में उच्चतम बाज़ार मूल्य से आठ आना-एक रुपया सस्ता बेच कर ये ग्राहकों का हमदर्द बन रही है। ये इतना मार्जिन लेकर चलते हैं कि इन्हें तो न्यूनतम बाज़ार मूल्य से भी सस्ता बेचना चाहिए। पर सरकार को अपना हिस्सा मिल चुका है... मीडिया का इस पर फोकस नहीं है... लिहाज़ा सब्ज़ीभाजी वाले मर रहे हैं और ख़रीदार माॅलनुमा दूकानों में सब्ज़ी ख़रीद कर खुश हो रही है।

हमले लगातार और कलम से भी होने चाहिए।

Amarendra said...

अगर व्यवस्था को पूरी तरह बदलने का इरादा हो तो हमले एक उपाय हो सकते हैं। तब बदलाव हर तरफ से होगा, सिर्फ रिटेल ही नहीं हर इंडस्ट्री में होगा। अगर नहीं तो सिर्फ रिलायंस और उस जैसे किसी भी बड़े रिटेलर पर हमले इस समस्या का सिर्फ तात्कालिक हल ही निकालेंगे। असल में किसानों और छोटे दुकानदारों की समस्या कहीं बहुत गहरी हैं।

पिछले दिनों वाम मोर्चे ने छोटे दुकानदारों की समस्या का बहुत सतही हल निकलने का प्रयास किया। इन्होंने बड़े दुकानदारों के लिए लाइसेंस व्यवस्था शुरू करने की बात कही और ये लाइसेंस नगरपालिका और छोटे दुकानदारों की यूनियन मिलकर देंगी। हम सब जानते हैं कि जब व्यवस्था में ही खोट हो तो लाइसेंस प्रणाली कारगर नहीं होती। अगर ऐसा संभव होता तो रिलायंस का कद कभी इतना बड़ा नहीं होता। आज ये कंपनी दैत्याकार रूप ले चुकी है तो इसकी सबसे बड़ी वजह लाइसेंस प्रणाली ही है। जो बिजनेसमैन इसकी काट निकाल लेता है वो रातोंरात मालामाल हो जाता है। जब पूरी व्यवस्था ही रिश्वतखोर हो तो लाइसेंस लेने में कितनी मुश्किल होगी?

ये प्रयास छोटे दुकानदारों को बचाने का नहीं, बल्कि उनमें पनपते विरोध के स्वर को धीमा करने का है। इस तरह के स्टंट कांग्रेस और भाजपा अपनाती हैं, मगर कांग्रेस को समर्थन देते-देते वाम मोर्चा भी काफी हद तक उनके रंग में ही रंगता जा रहा है।

मौजूदा व्यवस्था में मॉडर्न रिटेलिंग का नारा है कम से कम दाम और ऐसे में जब कोई रिटेलर ये दावा करता है कि वो दूसरे की तुलना में कम भाव पर सामान बेच रहा है तो वो निश्चत रूप से किसी सप्लायर से उससे भी कम दाम पर सामान खरीदता होगा और वो सप्लायर उन सामानों को बनाने के लिए मजदूरों से कम से कम पारिश्रमिक पर काम लेता होगा। ये शोषण का ऐसा चक्र है जो पूरी दुनिया में पैठ जमा चुका है। भारत ही नहीं चीन जैसे देशों में स्मॉल स्केल इंडस्ट्री में काम करने वालों की स्थिति अच्छी नहीं है। मॉडर्न रिटेलिंग से निपटने का एक ही उपाय है इस पर पूरी तरह कानूनी रोक लगे। छोटे दुकानदारों की बात करने वाले वाममोर्चे को भी इसी दिशा में प्रयास करना चाहिए।
अमरेंद्र

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