Tuesday, June 12, 2007

नंगे ब्लेयर और नंगे बुश

ब्रिटेन की रॉयल अकादमी की कला प्रदर्शनी में वहां के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर और उनकी पत्नी शेरी की नग्न पेंटिंग टंगी है। एक चित्रकार ने इन दोनों का नग्न पेंटिंग तैयार की है। इसमें ब्लेयर दंपती ब्रिटेन के प्रधानमंत्री निवास 10, डाउनिंग स्ट्रीट की सीढ़ियों पर खड़े हैं और वो भी बिना कपड़ों के। चित्रकार का नाम है माइकल सैंडल और वो 71 साल के हैं। इस आपत्तिजनक चित्र के बारे में उनका अपना तर्क है। सैंडल का कहना है कि इराक युद्ध में ब्लेयर की भूमिका पर विरोध जताने के लिए उन्होंने ऐसा किया। समाचार पत्र गार्डियन से सैंडल ने कहा कि ''ब्लेयर ने इराक़ युद्ध को लेकर जो घालमेल किया था, उसे लेकर मुझे अचानक गुस्सा आ गया"। गुस्सा सिर्फ सैंडल को ही नहीं है बल्कि हर उस आदमी को है जो सोचने की ताकत रखता है।
दरअसल इराक को आज अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने ऐसे मुकाम पर ला खड़ा किया है, जहां हर रोज हिंसा का तांडव होता है। बुश के इस अपराध में टोनी ब्लेयर बराबर के हिस्सेदार हैं। आज इराक में 2-4 बम धमाके और 50-100 लोगों की मौत, खबरों के लिहाज से कोई अहमियत नहीं रखती है। वहां आए दिन इतने लोग मारे जाते हैं।

  • अकेले इसी साल जनवरी से 6 जून तक इराक में 11872 लोग मारे जा चुके हैं।
  • पिछले साल जनवरी से वहां 30527 नागरिक और इराकी सैनिक मारे जा चुके हैं।
  • 2003 से हुए जान के नुकसान का आंकड़ा एक लाख के करीब है।

इस लिहाज से इराक में नरसंहार चल रहा है। इस नरसंहार के लिए जिम्मेदार अमेरिका और ब्रिटेन हैं। ज्यादा खुल कर कहें तो जॉर्ज डब्ल्यू बुश और टोनी ब्लेयर हैं। दोनों ने ये सब किया है बहुत सोच समझ कर। सबसे पहले उन्होंने अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का नारा बुलंद किया। दुनिया को चीख चीख कर बताया कि सद्दाम हुसैन के शासन में इराक बेहद घातक हथियार बना रहा है। परमाणु बम बना रहा है। फिर संयुक्त राष्ट्र से नुमाइंदे भेजे। वो संयुक्त राष्ट्र जो अब अमेरिका का पिट्ठू बन कर रह गया है। लेकिन तमाम तलाशी के बाद भी इराक में कुछ हाथ नहीं लगा ... तो सद्दाम हुसैन पर जांच में असहयोग करने का आरोप लगाना शुरू कर दिया। झगड़ा बढ़ता गया। तनाव फैलता गया। फिर आखिर में अमेरिका की अगुवाई में मिलीजुली सेना ने हमला बोल दिया। सद्दाम को सत्ता से बेदखल कर दिया गया। फिर दोबारा तलाशी ली गई। लेकिन कहीं भी परमाणु बम या वैसा ही घातक कोई और हथियार नहीं मिला। ये अमेरिका और ब्रिटेन के मुंह पर तमाचा था। लेकिन वो उसके साथी बड़े बेशर्म हैं। अब उन्होंने नारा दिया कि इराक पर हमले से लोकतंत्र की आस्था मजबूत होगी। सद्दाम हुसैन एक तानाशाही नेता थे और उनके खात्मे से दुनिया के उन तमाम देशों में जहां तानाशाही शासक हैं, लोकतंत्र बहाली का रास्ता खुलेगा। लेकिन आज सब जानते हैं कि अमेरिका और उसके साथियों की ये दलीलें कितनी खोखली हैं। सच तो ये है कि इराक में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तेल का भंडार है। अमेरिका ने इराक पर हमला भी तेल के उसी खजाने की लालच में किया है। जाने माने राजनीतिक विशलेषक नोम चॉम्सकी ने इस साजिश का खुलासा साफ शब्दों में किया है। उनके मुताबिक अमेरिकी सलाहकार जॉर्ज केनन (केनन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका की विदेश नीति के दिशा निर्देशक माने जाते हैं)) ने 60 के दशक में कहा था कि ऊर्जा के स्रोतों पर कब्जा अमेरिका को उसके विरोधियों से काफी आगे पहुंचा देगा। तभी से अमेरिका की कोशिश रही है कि जहां कहीं भी ऊर्जा के स्रोत हों .. उन पर उसका नियंत्रण हो। अमेरिका की इस बुरी मंशा को कुछ समय पहले उसके ही उप राष्ट्रपति डिक चेनी ने साफ किया। चेनी ने कहा कि ऊर्जा के स्रोतों पर किसी और देश का कब्जा होगा तो वो ब्लैकमेल करेगा। जबकि अमेरिका का कब्जा होने पर वो उसका इस्तेमाल सबके भले के लिए करेगा। ये सिर्फ कहने की बात है। असलियत तो यही है कि अमेरिका ऊर्जा के तमाम स्रोत अपने कब्जे में लेना चाहता है ताकि विरोधियों के हौसले पस्त रहें। इराक पर हमला भी उसी मुहिम का हिस्सा है।
लेकिन अब इराक अमेरिका के लिए नासूर बन चुका है। उसे बड़े पैमाने पर कीमत चुकानी पड़ रही है। उसके चार हजार के करीब सैनिक वहां मारे जा चुके हैं। अमेरिका में सैनिकों को वापस बुलाने का दबाव बढ़ रहा है। लेकिन ये फैसला लेना उतना आसान नहीं है। नोम चॉम्सकी की माने तो इराक में 60 फीसदी आबादी शिया है और अब वो सत्ता में हैं। पड़ोस में है ईरान। वहां 89 फीसदी आबादी शिया है। साऊदी अरब के पूर्वी हिस्से में भी शिया आबादी ज्यादा है। ऐसे में अगर इराक सम्प्रभु राष्ट्र बना तो एक मजहब और एक पंथ के कारण ईरान से उसके रिश्ते सुधरेंगे। फिर एक ऐसी ताकत का जन्म होगा .. जो अमेरिका और उसके मित्र देशों के सामने बड़ी चुनौती पेश करेगा। ये बात अमेरिका के हुक्मरानों को मालूम है। यही वजह है कि वो इराक में लोकतंत्र बहाली का ढोंग तो करेंगे .. लेकिन लोकतंत्र बहाल नहीं होने देंगे। अमेरिका की पूरी कोशिश होगी कि वहां एक पिछलग्गू सरकार बनी रहे और पर्दे के पीछे से नियंत्रण उसके हाथ में रहे। इसी मकसद से वो इराक में दुनिया का सबसे बड़ा दूतावास बना रहा है। 104 एकड़ के क्षेत्रफल में फैले इस दूतावास में कर्मचारियों की संख्या 8000 होगी। दूतावास की सुरक्षा ऐसी कि परिंदा भी पर नहीं मार सके। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि अमेरिका की मंशा कितनी खतरनाक है। इराक में लोकतंत्र बहाली की आड़ में वो और उसकी कंपनियां राज करेंगी। अमेरिका की इस साजिश में ब्रिटेन ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया है। इसलिए इराक में होने वाले मुनाफे में उसकी कंपनियों को भी हिस्सा मिलेगा।

साफ है कि लोकतंत्र और मानवाधिकारों की सबसे ज्यादा वकालत करने वाले दोनों देश, अमेरिका और ब्रिटेन, असल में परभक्षी हैं। इन दोनों देशों में हुक्मरानों के चेहरे बदलते हैं ... लेकिन लहू की नदी बहा कर, दूसरे देशों को गुलाम बना कर मुनाफा कमाने की नीति नहीं। बिल क्लिंटन हों या फिर बुश, जॉन मेयर हों या फिर टोनी ब्लेयर ... सब चरित्र और व्यवहार के मामले में बेहद नंगे हैं। इसलिए आज के दौर में हर सचेत शख्स की जिम्मेदारी बनती है कि वो बुश और ब्लेयर के नंगेपन को दुनिया के सामने पेश करे। अपनी ताकत और क्षमता के हिसाब से ही सही ... उनकी साम्राज्यवादी सोच का विरोध करे। चित्रकार माइकल सैंडल ने अपने स्तर पर ये काम किया और इसलिए उनकी तारीफ की जानी चाहिये।

2 comments:

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छा लिखा है। बधाई!

Shrish said...

अमेरिका के सच को दर्शाता एक अच्छा लेख।

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