Tuesday, June 26, 2007

राजनीति के दंगल में राष्ट्रपति

राष्ट्रपति को लेकर उठापटक जारी है। सबसे चौंकाने वाली पलटी शिवसेना ने मारी है। मराठी अस्मिता का नारा देते हुए ठाकरे कांग्रेस की गोद में जा बैठे हैं। इससे प्रतिभा पाटील की दावेदारी और मजबूत हो गई हैं। ऐसे में सवाल यही है कि क्या इस देश को एक रीढ़विहीन प्रधानमंत्री के बाद एक वैसा ही राष्ट्रपति भी मिलेगा ? इसी अहम सवाल पर रोशनी डाल रहे हैं हमारे साथी विचित्र मणि
वही हुआ, जो होना था। पहले शक था, लेकिन एक झटके में उसके यकीन में बदलते देर नहीं लगी। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने दो टूक कह दिया कि राष्ट्रपति पद के चुनाव में वह भैरों सिंह शेखावत के साथ नहीं बल्कि प्रतिभा पाटील के पक्ष में खड़े हैं। शिवसेना के इस रवैये पर बीजेपी ने छाती कूटना शुरु किया कि ठाकरे ने तो पीठ में छूरा घोंपा है। ये तो विश्वासघात है। पता नहीं, बीजेपी को शिवसेना पर कितना विश्वास था लेकिन शिवसेना का इतिहास तो यही बताता है कि बड़ी ताकतों के आगे झुक जाना उसकी फितरत है। ठाकरे ने वही किया, जो उनसे अपेक्षित था।

लेकिन राजनीति ऐसे ही मौकों पर दुर्गम इम्तिहान लेती है। 25 जून को निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उप राष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत ने राष्ट्रपति पद के लिए पर्चा दाखिल किया। और शाम होते होते बाल ठाकरे ने कह दिया कि मराठा सम्मान के लिए वो पाटील को वोट देंगे, शेखावत को नहीं। दोनों घटनाएं जिस तारीख को हुईं, उसकी बड़ी अहमियत है। आखिर 32 साल पहले वो 25 जून की ही काली रात थी, जब सत्ता के नशे में चूर श्रीमति इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया था। तब जय प्रकाश नारायण समेत विपक्ष के तमाम नेता एक झटके में काल कोठऱी में ठूंस दिये गए। विपक्ष तो छोड़िये, कांग्रेस के कद्दावर नेता चंद्रशेखर को भी रातो रात गिरफ्तार कर लिया गया। जिसने भी इंदिराशाही के खिलाफ और लोकशाही के पक्ष में आवाज उठायी, उसकी नियति उसे सलाखों के पीछे ले गयी। शेखावत भी उन्हीं लोगों में से थे, जिन्होंने लोकतंत्र के पक्ष में जेल जाने का रास्ता चुना। लेकिन जानते हैं, हिंदू तन मन जीवन की बात करने वाले बाल ठाकरे ने क्या किया था? इंदिरा गांधी के आतंक और अपने स्वार्थ और सुविधा के लिए ठाकरे ने इंदिरा गांधी से माफी मांग ली थी और उस जमात में शामिल हो गये, जो जम्हूरियत का जनाजा निकालने में जुटा था।

32 साल बाद इतिहास ने खुद को कमोबेश वैसे ही दुहराया। बल्कि और विद्रूप तरीके से। भले नाम मराठी अस्मिता का दिया गया हो लेकिन ठाकरे तो कांग्रेस की झोली में जा गिरे। और कांग्रेस ने क्या किया। धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने वाली कांग्रेस को शिवसेना से वोट मांगने में हिचक नहीं हुई, जिसे वो सांप्रदायिक और देश की सबसे बड़ी सांप्रदायिक पार्टी मानती है। बीजेपी से भी ज्यादा। उस हाल में अगर प्रतिभा पाटील चुनाव जीत जाती हैं तो कांग्रेस शिवसेना की मदद का दाग कैसे धोएगी। लेकिन सच कहिये तो ये सवाल उठाना ही बेमानी है, क्योंकि ऐसे सवाल उनकी आत्मा को कचोटते हैं, जिनके लिए सिद्धांत हर हाल में स्वार्थों से बड़े होते हैं। उनके लिए नहीं, जिनकी सियासत की तराजू पर स्वार्थ और सुविधा का पलड़ा सिद्धातों पर भारी पड़ जाता है। कांग्रेस ने वही किया और पहली बार नहीं किया। और शिवसेना? आज वह मराठा हित की बात करती है लेकिन पिछली बार उप राष्ट्रपति के चुनाव में उसका मराठा प्रेम कहां चला गया था, जब उसने सुशील कुमार शिंदे को वोट नहीं दिया था। जबकि शिंदे तो महाराष्ट्र से ही हैं। तो क्या ये माना जाए कि शिंदे का दलित होना ठाकरे को रास नहीं आया था या अवसरपरस्ती शिवसेना का मूल मंत्र है?

तो ये तो तय माना जा रहा है कि प्रतिभा पाटील ही अगली राष्ट्रपति होंगी क्योंकि वोटों का मौजूदा समीकरण साफ साफ उनके पक्ष में जाता है। यूपीए उनके साथ है, वामपंथियों को उनमें महिला सशक्तिकरण का आभास मिलता है और सेकुलर नीतियों की खुशबू, बहन मायावती को केंद्र से बनाकर रखना है, लिहाजा उनके लिए भी प्रतिभा ताई से बेहतर कोई और नहीं। और आखिरकार शिवसेना भी साथ खड़ी हो गयी। दूसरी तरफ निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में डटे शेखावत के पक्ष में पूरा एनडीए भी नहीं है। जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष शरद यादव तो साथ हैं लेकिन नीतीश को शेखावत रास नहीं आते। रही बात नवजात तीसरे मोर्चे की, तो उसमें भी कई अगर मगर हैं। धर्मनिरपेक्षता के बहाने कई पार्टियां शेखावत से दूर खड़ी हैं। बावजूद इसके शेखावत खम ठोंककर मैदान में डटे हैं। हो सकता है कि वो हार जाएं लेकिन कई बार हार का संघर्ष जीत की बधाइयों से ज्यादा सुहाना होता है। पिछले चुनाव को याद कीजिए। बीजेपी ने पहले तो तत्कालीन उप राष्ट्रपति कृष्णकांत को उम्मीदवार बनाने का ऐलान किया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तो फोन करते अपने जमाने के युवातुर्क को बधाई भी दे दी थी। लेकिन ऐन मौके पर बीजेपी ने पलटी मार दी और मैदान में ला खड़ा किया एपीजे अब्दुल कलाम को। क्या कांग्रेस, क्या समाजवादी पार्टी, सबने कलाम की जयजयकार शुरू कर दी। क्या इसकी वजह कलाम की योग्यता थी। बेशक कलाम जितने बड़े वैज्ञानिक हैं, कहीं उससे बड़े इंसान हैं। और याद रखिए, विद्वान मिल जाते हैं, इंसान नहीं मिलते। लेकिन राष्ट्रपति के तौर पर अपने कार्यों से जो अमिट छाप के आर नारायणन ने छोड़ी है, उस स्तर पर दूसरा कोई राष्ट्रपति नहीं टिकता।

वो नारायणन ही थे, जो पहली बार कतार में खड़ा होकर आम लोगों की तरह वोट डालने पहुंचे थे और इस मिथक को तोड़ा था कि राष्ट्रपति वोट नहीं डालता। वो नारायणन ही थे, जिन्होंने गुजराल सरकार के कहने पर यूपी में और वाजपेयी के कहने पर बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू करने के सिफारिश को पहली बार सिरे से खारिज कर दिया था। वो नारायणन ही थे, जिन्होंने वाजपेयी सरकार की तरफ से संविधान समीक्षा के प्रस्ताव पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करके जता दिया था कि हमारे संविधान में कोई खोट नहीं है। वो नारायणन ही थे, जिन्होंने दुनिया के बाहुबली बने फिरने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की आंखों में आंखे डालकर ये कहने का साहस दिखा सके कि कश्मीर दुनिया का सबसे खतरनाक जगह नहीं है और हां, अगर दुनिया ग्लोबल विलेज में बदल रही है तो उस गांव को सारे पंच मिल कर चलाएंगे, कोई चौधरी नहीं। कहते हैं कि ये बात अमेरिका की पिछलग्गू वाजपेयी सरकार को अच्छी नहीं लगी थी। लेकिन इससे अपने नारायणन का क्या बिगड़ता है? उनके लिए राष्ट्रीय अस्मिता बड़ी थी, अपना स्वार्थ नहीं। और हां, जब गुजरात में मोदी सरकार ने नरसंहार शुरू कराया तो नारायणन ने प्रधानमंत्री वाजपेयी को चिट्ठी लिखकर कहा कि ये सब रोको। लेकिन भाषणवीर वाजपेयी और पाखंड की पुजारन बीजेपी से आप समरस समाज बनाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। वही हुआ, पहले गुजरात जला और उसके बाद जब राष्ट्रपति चुनाव का समय आया और कुछ लोगों ने नारायणन का नाम दोबारा राष्ट्रपति के लिए सामने लाया तो बीजेपी का कलेजा जलने लगा। लेकिन मजे देखिये कि बीजेपी ही नहीं, कांग्रेस और मुलायम सिंह जैसे दलितों-पिछड़ों-उपेक्षितों-वंचितों के आलमबरदारों को भी नारायणन सुहाते नहीं थे। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को छोड़ दें तो किसी बड़े नेता ने नारायणन के पक्ष में एक बयान तक देना गवारा नहीं समझा। लेकिन जब इतने विरोध थे, तो नारायणन ने ही खुद को इस दांवपेंच से अलग कर लिया।

अतीत के आंगन में झांकने का आशय ये नहीं था कि पुरानी यादों को ताजा किया जाए बल्कि कहने का मतलब ये है कि मौजूदा राजनीति में असरदार राष्ट्रपति किसी को नहीं चाहिए। मौजूदा राष्ट्रपति डॉक्टर अब्दुल कलाम के प्रति बिना किसी किस्म का अनादर भाव प्रकट किये ये तो कहा ही जा सकता है कि राष्ट्रपति के तौर पर बच्चों में जरूर उन्होंने बडा भाव जगाया लेकिन राष्ट्र प्रमुख के तौर पर उनका कार्यकाल सतही ही रहा। उस हाल में नया राष्ट्रपति जाति-लिंग-धर्म के दायरे से बाहर एक सुलझा हुआ राजनेता होना चाहिए जो नीर-क्षीर विवेक का इस्तेमाल करके सही फैसला सुना सके। शेखावत का इतिहास भले ही बीजेपी से जुड़ा रहा है लेकिन पिछले पांच साल में बतौर उपराष्ट्रपति उन्होंने साबित कर दिया है कि वो दलगत राजनीति की परिधि से बाहर निकल चुके एक ईमानदार और साफगोई पसंद बड़े दिल के राजनेता हैं। तो क्या कभी बीजेपी से उनका साथ ही उनकी राह में रोड़ा होना चाहिए। रत्नाकर तो डाकू था लेकिन राम नाम की ताकत ने उसे महर्षि बाल्मीकि बना दिया।

और फिर ये कैसे कहा जा सकता है कि शेखावत जीत नहीं सकते। 1969 में सबको यही लग रहा था कि कांग्रेस के उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी चुनाव जीत जाएंगे लेकिन वराह वेंकट गिरि ने उन्हें धूल चटा दिया था। करिश्मे बार बार नहीं होते लेकिन कई बार इतिहास खुद को दोहराता तो जरूर है। लिहाजा, मन साध कर देखते रहिए कि देश के पहले नागरिक के चुनाव में होता क्या है।

3 comments:

अभय तिवारी said...

बहुत ही बढ़िया लिखा मित्र.. आपके लेखन में बड़ी धार है..

bhuvnesh said...

लेख अच्छा लगा. पढ़वाने के लिये बधाई..

Viplav said...
This comment has been removed by a blog administrator.

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